- कैलाश वानखेड़े
घर के भीतर चूल्हे
के अंदर कसमसाती है आग. कागज पर सवार होकर आग गीली लकड़ियों के उपर चढ़ती है और दम तोड़ने
लगती है. कागज जलाने से पहले पढ़ती है उन पर लिखी हुई इबारत को. उनमें लिखे हुए इतिहास
को कि पोथी-पुराण ही जले, तभी कागज
खत्म हो जाते है. गीली लकड़िया
मुहं छिपाकर हंसती है कि कर ले जितना जतन करना हो, हम इन झूठो से राख नही होने वाले है. आग में इन्हें ही भसम हो
जाना है कि तभी उठाती है
घासलेट, रत्नप्रभा.मैं एकटक
देखता ही रहा रत्नप्रभा को कि कागज पढ-पढकर छांटने के बाद अब क्या करने वाली है. धुएं
की हलकी परत में लालपन उसकी सफेद आंखों के भीतर छा गया है . फूंक मारते-मारते थक गई
है कि अब आखरी रास्ता बस घासलेट है. आग बनाने वाली लडकियां जानती है, इस रास्ते को.वह घासलेट का पाँच लीटर का
केन उठाती है. कबाड़ी की दुकान से दस रुपये में खरीदा हुआ ये सनफ्लावर तेल का डिब्बा, घासलेट का बसेरा बना हुआ है. गीली लकड़ियों
के उपर डालती है घासलेट. घासलेट की बूंदों की गिनती मैनें बीवी के मुंह से सुनी. जब
मैं मटके से पानी निकालकर पी रहा हूं तब, यह ग्यारहवीं
बूंद थी और रत्नप्रभा की जबान ने कहा, ओह !

