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Sunday, February 2, 2014

नामदेव ढसाल की कविता

नामदेव ढसाल की कविता का अनुवाद 


रोशनी और अँधेरे के दरम्यान 
प्रेम और दुःख के बीच 
वेदना के बाद की जगह दे दी कविता को 
मैने ऐसा साक्षात 
खुद को ही बो दिया खेत में 
और मेड़ पर खड़े होकर 
इंतजार करता रहा 
खुद के उगने का 
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मूल कवितांश ....

प्रकाश आणि काळोखाच्या दरम्यान

प्रेम आणि दुःखाच्या दरम्यान

मी वेदनेनंतरची जागा कवितेला दिली

मी असे साक्षात

स्वतःला पेरून टाकले जमिनीत

आणि बांधावर उभे राहून

वाट बघत राहिलो

स्वतःच्या उगवण्याची

Friday, September 20, 2013

शब्द प्रभुनों ---कवि वामन निम्बाळकर

शब्द प्रभुनों .

शब्दों  से जलते है घर ,दार ,देश और इंसान भी /
शब्द बुझाते है शब्दों से जले हुए इंसानों को /
शब्द न होते तो आँखों से गिरे न होते आग के गोले /
न बहता आंसुओं का महापुर /
आता न कोई करीब /
जाता न दूर ,,
शब्द न होते तो ...
---कवि  वामन निम्बाळकर
--अनुवाद -कैलाश वानखेड़े
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 ''शब्द '' 
  'शब्‍दांनीच पेटतात घरे, दारे, देश /
आणि माणसेसुद्धा /
शब्‍द विझवतात आगही /
शब्‍दांनी पेटलेल्‍या माणसांची .शब्‍द नसते तर पडल्‍या नसत्‍या/ 
डोळ्यांतून आगीच्‍या ठिणग्‍या/ 
वाहिले नसते आसवांचे महापूर /आले नसते जवळ कुणी, /
गेले नसते दूर /
शब्‍द नसते तर''
 - कवी वामन निंबाळकर

झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड

                     जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को   भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...