Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Thursday, August 7, 2014

थू करने के लिए नही है मेरी जबान पर थूक

बकवास करते है आप ,जाति कहाँ है ?

बीच बाजार में घसीटते हुए ले जाकर
लटका दिया उल्टा
वही जहाँ है फव्वारे और ढेर सारे फूल खिलने की प्रतीक्षा में
ठीक उसी सड़क पर जो हवाई अड्डे से औधोगिक केंद्र को खींचती है
जिसका दूसरा हाथ बिग बाजार के माल के नीचे रखा हुआ है
वही पर
उसकी गरदन को धड से अलग करने के लिए
तलवार से काटा गया
खून निकला और वही जिसे कली कहकर हँसते हो
उसके भीतर चला गया
किसी को पता ही नहीं चला
काले शीशे से लाल रंग तो दिखता नहीं लाल
और हीरो होंडा बजाज से निगाह आगे की तरफ होती है
उसकी नजर में भी घुस न सका खून
फुटपाथ को तो घेरकर शर्मा स्वीट सेंटर ने कंजूमर के हवाले कर दिया
राहगीर नहीं है कोई उसकी राह खा गया वह
उसी वक्त सुपारी के कारखाने में जल रहा है कुछ तो भी
भट्टी के नीचे
सुपारी को सेंकने के लिए और फ़ैल रहा है उसका धुआँ
जो जाता है सीधे आँखों में
मसलते है और आगे बढ़ जाते है कि उनके पास नहीं है वक्त
गाली देने के लिए भी
तभी किसी आवाज से कोई समाचार आता है
दिमाग के भीतर भट्टी में
पहाड़ियों में गड्डों से जाता नहीं हर कोई डही
जहाँ फरमान हुआ है

तस्दीक करनी है उसी जाति के तो हो लेकिन ये काम करते हो ?
विकास बहुत हुआ
बहुत कर ली कोटे वालों ने तरक्की हक़ मारकर .
गाँव ,पटवारी,पंचायत ,स्कूल के प्रमाण के बाद भी जरुरी है
संतुष्टि के लिए फोटो .
भरोसा ही नहीं होता मनुष्य को देखकर
कागज़ पंचनामा रिकार्ड शपथपत्र
सब हो सकते है फर्जी

बनाया जा सकता है आदमी को भी फर्जी
जाति प्रमाण पत्र तो सदियों से बनाए जाते रहे है
सदियों से करते आ रहे है यही कामधंधा हमारे पुरखे
तब शिवाजी की जाति के लिए बनारस से बनवाये गया था रिकार्ड

अब कलयुग में ऊँची जात का नहीं चाहिए प्रमाण
वो तो रोटी बेटी से कर लेते है
बार बार हजार बार सरेआम कहते है
कभी अपने गरीब होने के पुछले को जोड़कर तो कभी मूंछ पर ताव देकर
कहते हो ही ही करते हुए बनिया आदमी हूँ

तय कर देते हो और सामने वाला भूल गया हो तो याद कर ले अपनी जाति

कोटा ,आरक्षण रिजर्वेशन मेरिट प्रतिभा पलायन देश दुनिया
राजनीती वोटबैंक गंदगी कचरा फिल्म हिरोइन एसएमएस एमएमएस वाट्स अप नीली फिलिम गाने ....बाय करते हो
कि भोत काम बाकि है
ये जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है
ये देश भी कोई देश है ...

उस बच्चे से जिसे भगवान का रूप बोलते हुए किसी को शर्म नहीं आती
कहते हो पाना हो स्कालरशिप तो ले आओं मरे हुए जानवर के साथ
अपना फोटो...

ढाई सौ किलोमीटर दूर जब सुनता हूँ
तो अपने को किसी आदिम गुफा में पाता हु
सन्न हु
कि कितने कुत्सित विचार है तुम्हारे
कि मानसिकता की सडन के बाद भी तुम अभी भी हो
उसी गटर के कीड़े जो रेंगता है गंदगी छोड़ता है और सड़ जाता है
थू करने के लिए नही है मेरी जबान पर थूक

बस बचे है मेरे पास शब्द जिन्हें वापरता हूँ
कि चूल्हा जलाने के काम आ जाए
कि कक्षा नौ के पाठ की तरह अपने बेटे को पढ़ा सकूँ
जब कोई मांगे तुमसे इस तरह का प्रमाण
तो मेरी तरह खुद का क़त्ल मत होने देना
मेरे बेटे उससे कहना अंकल जी मेरे पास है एट्रोसिटी का कागज
घर में है संविधान .
///////8888////
शनिवार, 12 अक्टूबर 2013...
janpaksh blog me..
http://jantakapaksh.blogspot.in/2013/10/blog-post_12.html

Monday, August 4, 2014

समझ गये ना


कुछ ऐसा ही ख़याल आया था लेकर लाउडस्पीकर
कहूँ
तुम इसे चिल्लाना कहोंगे
कहोंगे
जो भी कहना है शालीनता से कहो
कहो सुर में
न हो सुर तो कर्णप्रिय लगे
कर्णप्रिय के साथ लय हो ताल तो जरुरी ही है
और सबसे बड़ी बात तुम चुप नहीं बैठ सकते हो
अपना काम करों ये क्या लिखते हो ?
हम है न लिखने के लिए
हम तुम्हारी आवाज बनेंगे तुम्हारे दर्द को उकेरेंगे

हिदायत है सलाह या चेतावनी

दीवार पर टंगी हुई किल के बारे में ,चलो देखते है कौन बेहतर लिख सकता है
बेहतर ...डराता है शब्द .
बेहतर लिखना  ही लिखना होता  है


लिखने के बाजार में फैला रखे है
सजाये है ढेर सारे  विषय
उन्हीं पर हमारे जैसा या फिर पूर्वजों जैसा लिखों
लिखों जो मानदंड स्वीकृत है उस तरह से .

हम नाम देखेंगे
उस पर लिखेंगे
पढ़ने को वक्त नहीं है
हम तो नाम से ही समझ जाते है
बहुत हुआ तो एक लाइन ही काफी है
हांड़ी में चावल का एक दाना ..
विरासत है समझने की .

समझ गये ना ?
21 june 2012

Tuesday, February 11, 2014

कितनी दूर हो कि गुफा में हो

       गढ़े नहीं होंगे 
अक्षर 
शब्द के अर्थ बनाये नहीं होंगे 
जबान अभ्यस्त नहीं हुई होगी बोलने के लिए 
सुनते वक्त जो सुना उसे दिल वैसा माने यह रिवाज नहीं होगा 

पर थी आँखे आँखों के पास

आँखों के भीतर देख मिलने 
गुफा में बनाता पत्थरों पर सपने 
ब्रश बनकर जो रौशनी फैलाते होंगेवही पत्ती जो एक डंडी पर खिल रही है आज भी 



भैसा ,हाथी,कछुआ
मछली और बनाकर उस लुप्त हो चुके जानवर को ,
उसकी सवारी कर कहाँ जाने का खयाल आता होगा
पैतीस हजार साल पहले उस प्रेमिका को ..

हाथ में लेकर हाथ कर समूह नृत्य
किस सुर लय साज और बिन गीत
उमंगती हुई तड़फ के साथ कदमताल करता होगा
जानता था वह और उस गुफा के बाशिंदे
अपराध नहीं है प्रेम


दूर कही प्रेमिका बनाती तीर बनकर हिरणी
अपने आपको अपने प्रेम की तरह अमिट रंग से
भेजती होगी फूल अनकहे ,मनचाहे
बनाती होगी मु
तब दिल का आकार तय नहीं हुआ होगा तो
किसे बनाती होगी दिल हरे पान के पत्ते की बजाय

गहरा लाल रंग जब पत्थर पर चित्र में तब्दिल हो जाता होगा
तब क्या तुम्हारे लिए शुद्ध रक्त का लेशमात्र भी खयाल आता होगा ?

कत्थई रंग जमाने की तमाम धूल के बाद भी बना हुआ है अपने मूल में
तुम अब भी वैसे ही हो प्रेमी गहरे लाल रंग से भरे हुए अमिट
तभी तो रची जाती है प्रेम कविता
प्रेम कहानी

तू यह बता

कविता रच रहे थे कि लिख रहे थे कहानी
सूरज को विदा करने के बाद लिखते होंगे डायरी
जिसे कहते है अब शैल चित्र ...



आँख मारना तब आया होगा ?
धडकती होगी ?उसके खयाल मात्र से


आज तुम्हारी धड़कन तुम्हें बेजुबान कर देती है
जबकि तय कर दिया गया है शब्द के मायने और उसके अर्थ
तब भी नहीं है तुम्हारे पास शब्द

कैसे कहे क्या कहे ?में उलझ गए हो
कि

अजन्ता में बोधिसत्व अपने हाथ में फूल लेकर खड़े है

---कैलाश वानखेड़े .
11 फरवरी 2014
====================google से चित्र -साभार .

Wednesday, January 29, 2014

बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर

गलती मेरी ही है 
माथा मेरा ही खराब है सुबे से 
जिसे उल्टा कहा जाता है उसका उत्तर 
मै तो बस सीधे सीधे बुलंद के बाद शहर ही लिखना चाह रहा था 
बायमिस्टेक शहर की बजाय भारत लिख गया 
विज्ञापन का कहे या बजाज का असर 
जैसा बनाया जाता है वैसे ही निकलता है 
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ...प्रतिभा प्रतिभा मेरिट मेरिट 
चिल्लाते चिल्लाते खेत में लड़की के कपड़े फाड़े गए 
जबकि झंडा है मेरे देश का 
बोला ही गया और बोलनेवाले की जान लेने के लिए ही चली थी गोली
उसमें बारूद नहीं ग्रन्थ थे
आप देख पाए न देख पाए
आपकी मानसिकता और चश्मा जो भी देखे कहे
आपको तो मालूम ही नहीं
खेत सिर्फ बुलंदशहर में नहीं है
लड़की सिर्फ एक नहीं है करोड़ों में
चुप है कि लगता है आपको कि
व्यवस्था में चौथा वर्ण नहीं है
तभी तो बनाए रखने के लिए लोकतंत्र
वह चौथा खम्बा भी लापता हो गया खुद ही
बदन से कपडे तन से जान चली गई लेकिन
अभी भी है साबुत जबान और है गरिमा से जीने की चाह
जबकि नहीं गया बुलंदशहर
बुलंदशहर मेरे भीतर आकर चिल्ला रहा है
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर
और लिख देता हु बुलंद शहर की बुलंद तस्वीर ....

Sunday, October 27, 2013

भाकर के भीतर की आग

तवे से बहुत छोटी सी दिखती है आग ...
लहराती हुई लगाकर पूरी ताकत ,पकाती है भाकर को
मोड़कर भी दो हिस्से नहीं होती
उसकी परत टूट नहीं पाती
जिसे कटोरी के पानी से बारबार चिकना बनाया जाता था
कि न चिपके हाथ में
न चिपक बच्चे गोद में
कि पकना ही है ज्वार की भाकर की तरह
जिसमें रहती है आग तवे से बिछड़ने के बाद भी
आग बनी रहे अपने भीतर ,माँ यही चाहती थी .




(संजीव तिवारी की वाल से साभार फोटो.इसे देखकर लिखा है ,कुछ तो भी )

Monday, October 14, 2013

एक गुमशुदा लफ्ज

उस नगर में वफ़ा एक गुमशुदा लफ्ज है
मिलना ,शब्दकोष से सजायाफ्ता होकर बेदखल हो चुका है
वक्त ,नहीं है लेकिन वक्त के नाम से दहशतजदा है वह
दिमाग के भीतर से हूक लगातार  उठती है
बेसबब
बेवजह
कहकर उसे डस्टबिन के कीटाणुओं के हवाले किया जाता है .
सड जाए
गल जाए
हो जाए गायब
ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं होती
लेकिन उसीके लिए चली जाती है याद .
याद
याद ''का जो अर्थ बताया नहीं गया
न समझाया गया
और तो और कभी भी शब्दकोष में उसकी तलाश नहीं की गई
वही हरदम आगे आगे रहता है
..
वक्त बदला नहीं है
कैलेण्डर ,दिल बहलाने के लिए फडफडाता है
पिंजरे में बंद लव बर्ड्स की तरह
उसे कितना भी उडाओ नही उडती
उड़ने की कोशिश में मारी जाती है
,जिस तरह समय को ..

अभी कल ही बात है
गिने गए अठावन
जो मारे गए थे अँधेरी रात में अपने घरों से निकालकर
 उनकी लाश थी
जलाया गया था
समाचार के साथ फोटो भी थे

लेकिन हत्यारा कोई नहीं

यह तो शुक्र है कि लाशों की लक्षमनपुर बाथे में गिनती हो गई
खैरलांजी में कितने मरे ?
तुम्हें नहीं पता

खैर जैसे तुम तय नहीं कर पाती हो
वैसे ही समझ नहीं पाता हूँ कि
कितना बदल गया वक्त
कितना हुआ विकास
वर्णव्यवस्था से समझ नहीं पाते अब भेद को
जैसे समझना मुश्किल होता है कि
आखिर प्यार क्या होता है

जिस वक्त तुम प्यार को परिभाषित कर लोगी
उसी दिन वर्ण व्यवस्था के मायने
समझ में आ जायेंगे
जैसे मिट्टी का रंग
हवा में घुली खुशबू
तलवे में कंकड़ की चुभन
तवे पर गर्म रोटी के पकने का अहसास
पेट के साथ मन भरने की बात ....

Sunday, January 20, 2013

कविता -तुम इतनी मासूम लगी मुझे कि तुम्हारे भीतर बुद्ध दिखते है


तुम इतनी मासूम लगी मुझे कि तुम्हारे भीतर  बुद्ध दिखते है
                                                         --- कैलाश वानखेड़े  

पीर बाबा की मजार पर दुआओं की कतार में भेड़ बनने की बजाय तुम घूमती रही
 आकर्षक नकली जेवर लुभा न सकें तुम्हें
बंद स्कूल में गुलाबी कपड़ों में खेला गया आखरी दिन की यादें
सहेली ,वह टीचर जिसे कर्फ्यू के बाद आना था ..
किसकी तलाश में गई थी गुल मकई,पीर बाबा की मजार पर  ?

Saturday, January 19, 2013

कहाँ जाओगी ,दुर्गा ... कविता

                                                         ---- कैलाश वानखेड़े 

जल रही है  आँख अभी जबकि पढ़ नहीं पाया पूरा अखबार
कि फेसबुक के सारे अपडेट पढ़ देख नहीं पाया
बस दिखी तस्वीर दुर्गा की
संदीप की वाल से उदय प्रकाश की  कविता तक आते आते मेरी आँखों में
धुंधलका आ गया
इनकार कर रहा है कोई भीतर से
चल गोली खा और सो जा .

Wednesday, January 16, 2013

हाँ मै दलित हूँ

मेरे माथे पर नहीं लिखा है
लेकिन मेरा चेहरा बोलता है
बोलते है घुसर फुसुर करते हुए
सैकड़ों मुहँ धारी
पढ़ लेते है कागजात
पता लगा लेते है इधर-उधर से.
जब मालूम न पड़े तो
पूछ लेते है
मराठा हो
बामन ..
रुकता है
बुलवाने के लिए मेरे मुहँ से मेरी जाति
क्या है आप ..

Saturday, January 12, 2013

कविता : लाठी

बहुत ही अजीबोगरीब सपने देखता हू
उसी तरह नहीं सोचता हूँ
दिमाग के भीतर किल ठोंक दी है हुक्मरान ने
किल के गले में तानकर स्प्रिंगनुमा तार अटका दिया है
उसपर लगातार डाला जा रहा है कुछ तो भी
जबकि उसी स्प्रिंगनुमा तार की जरुरत है माँ को ताकि
दरवाजे के दोनों सिरों पर उसे खीचकर
डाल सके पर्देनुमा कपडा लेकिन ये हो न सका तो
सफ़ेद नाड़े को जिम्मेदारी सौंप दी गई कि वह पर्देनुमा कपड़े को उठाकर खड़ा रहे

Sunday, October 7, 2012

चूल्हा.....कविता

कैलाश  वानखेड़े

बुरी तरह से थका हुआ अँधेरा करता है इंकार
अभी नहीं जाऊँगा और सो जाता है बडबडाते हुए
सुकून से दो पल भी सोने नहीं देते है.

उसी वक्त दिमाग के भीतर का अलार्म सोने नहीं देता उसे
पैरों के गले में पड़ी उम्मीद जगा देती है
कि चूल्हा सुलगाने के लिए आग धुएं के साथ
छिपमछई खेलती है
आँखों में धुंआं चढ़कर लिपटता है
कि राजमार्ग को जोडनेवाला फ्लाईओवर का पुल
छीन लेता है धुएं को और डरा देता है
आज अगर कहा कम है दाम तो दम निकाल लेंगे
बोल कहाँ जायेगी
दाम में से निकालकर दम को जान देने
पता है उसका पत्ता ...

Monday, June 25, 2012

अगली बार....कविता

अगली बार

कई बार हलफनामा लिखना चाहा ..
तय होने के बाद कई दफ़े पेन न मिल सका ..
तब तुम्हारी आँखें  पढ़ती रही मुझे
और स्थगित किया लिखना हलफनामा .
भूल गया कि पेन की तलाश मे था

तुम नहीं हो
तुम हो भी नहीं सकती
फिर कैसे आ जाती है तुम्हारी आँखे
तपते हुए मन की प्यास बुझाने, लेकर अजस्र स्रोत के कुएँ के साथ
यकिनन मै न चाहते हुए चुप हूँ
खामोशी मिजाजी में तब्दील हो गया हूँ
कि फूटा हुआ हंडा हो गया हूँ
लगातार भरती हो पानी
फिर भी खाली लगता हूँ खुद को
औरों को

यादों की ज्वालामुखी पर बैठा हू
कि ठंडा होता ही नहीं हू
कि सुनता हूँ  प्रेम का दण्ड देता है वह वर्णाश्रम की निर्धारित व्यवस्था मुताबिक
अभी अभी  मारा गया ईखारे शेगांव के गाँव मेँ
जहां खामगांव की बड़ी बड़ी फैक्ट्रियाँ का धुआँ भरा है
धुँआ  तय करता है कि सड़क कि तरह बढ़ गया विकास 
कि वहाँ  राष्ट्र का रोड सूरत से होकर गुजरता हुआ नागपूर में आता है
उसे दीक्षा भूमि  दिखती है
और  वह भागता हुआ रायपुर से सम्बलपुर की ओर जाता है कि
जो खंबात की खाड़ी में नर्मदा को गिराकर निकला है
पकड़ न ले कोई
उस पगले को कहाँ पता कि किसे फिक्र है
जो उसे पहचान सके

उस
 गाली की शक्ल की गन्दी नाली
जिसके कारण मारा गया इखारे
उसी हिसाब से लिखना चाहा था पीकर बकरी का दूध
कि इसी पर चलकर सभी को अपनी अपनी हद में अपने बाप दादाओं का काम संभाल लेना चाहिए
उसे सड़क पर बहा देना चाहता हूँ
उस सड़क पर चले  ट्रक ,ट्रेक्टर ,चप्पल और जूते
कि रिसाइकलिंग कर नए पौधों को मिले जीवन
उस पौधे के गेंदा फूल को देकर
कहना चाहता हूँ कि चाहता हूँ
कि एक अदद जबान भी रखता हूँ
तुम अपने कान सलामत रखना
अगली बार
जरुर कहूँगा

Wednesday, June 20, 2012

समझ गये ना.....कविता

समझ  गये ना


कुछ ऐसा ही ख़याल आया था लेकर लाउडस्पीकर
कहूँ
तुम इसे चिल्लाना कहोंगे
कहोंगे
जो भी कहना है शालीनता से कहो
कहो सुर में
न हो सुर तो कर्णप्रिय लगे
कर्णप्रिय के साथ लय हो ताल तो जरुरी ही है
और सबसे बड़ी बात तुम चुप नहीं बैठ सकते हो
अपना काम करों ये क्या लिखते हो ?
हम है न लिखने के लिए
हम तुम्हारी आवाज बनेंगे तुम्हारे दर्द को उकेरेंगे

हिदायत है सलाह या चेतावनी

दीवार पर टंगी हुई किल के बारे में ,चलो देखते है कौन बेहतर लिख सकता है
बेहतर ...डराता है शब्द .
बेहतर लिखना  ही लिखना होता  है


लिखने के बाजार में फैला रखे है
सजाये है ढेर सारे  विषय
उन्हीं पर हमारे जैसा या फिर पूर्वजों जैसा लिखों
लिखों जो मानदंड स्वीकृत है उस तरह से .

हम नाम देखेंगे
उस पर लिखेंगे
पढ़ने को वक्त नहीं है
हम तो नाम से ही समझ जाते है
बहुत हुआ तो एक लाइन ही काफी है
हांड़ी में चावल का एक दाना ..
विरासत है समझने की .

समझ गये ना ?
21 june 2012

Friday, June 1, 2012

...लेकिन मैं नहीं हूँ


........लेकिन मैं नहीं हूँ 

                                                     -कैलाश वानखेड़े 


सोलह बरस की बाली उमर को सलाम ,ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम ...
गुनगुना रहा था दिमाग में बज रहा था
रात के बारह के बाद  गा नहीं सकता चाहकर भी
इंतज़ार करता रहा.
इंतजार
तब नहीं करना था.
इंतजार तो एक सतत चलती हुई धडकन है
अब गाने मे संशोधन कर लूँगा ..अठारह बरस की बाली ...
और फाड़ लूँगा एक पन्ना
किसी को पता भी नहीं चलेगा
किसी को कहाँ पता चलता है कि २१ के हत्यारे बरी हो गए
कोई जुलुस नहीं ...
मोमबत्ती की छोडो यहाँ भी घना अँधेरा है
मुझे न जाने क्यों बहुतेरे चेहरे नहीं उम्मीद दिखती है
और मैं इंतजार करता हूँ
प्रिये
तुम्हे खत भेजना था
वह बहुत बड़ा हो गया
तुम्हारा पता नहीं
तुम्हारा अपना घर नहीं
...सच तो यह है हजारो -लाखों खत है मेरे पास अनलिखें
खत से  तुम्हें समझ पाता  तो महामहिम के नाम लिखता
पगली तुम्हें कहाँ समझा पाता हूँ  ..

लेकिन कुरियर वाले नहीं पहुचाते ,उन्हें पैदा ही इसलिए किया कि वे मनमानी करे
खत्म कर दे पोस्ट मैन को .
कहना है लेकिन डरता हूँ कि जानता हूँ अभिव्यक्ति की आजादी के मायने .
वह जिसके मु के भीतर पान मसाले की लेयर से जीभ बदरंग हो गई
वह थूकता है
कहता है ,ये जबान किसकी है
मैं उसे देखता हूँ वह मुझे सदियों की सड़े हुए दांतों की गुफा में ले जाता है
वह लगातार हारा हुआ ,पीटा हुआ चेहरा है फिर भी मुछं पर ताव देने का भाव है
जानता हूँ कितना गिरा हुआ है लेकिन अभी भी उसका भाव ऊँचा   है .
ऊँचे लोगों की ऊँची पसंद , गर्व से कहता है
समझ में नहीं आता है मुझे मैं कहाँ खड़ा हूँ ..
और अभिव्यक्ति ..अभिव्यक्ति...
चिल्लाना चाहता हूँ कि
सरेआम कहना चाहता हूँ ,तुझसे मुहब्बत करता है
उस जगह जहाँ  ..
शादी के पहले देखा जाता है कि  किसके घर पैदा हुआ
किसकी औलाद है ,कितना शुद्ध है रक्त
 तब उलझन नहीं है होती उन्हें .
तुम्हे भगवान तिवारी की खून की दो बूंद याद आ रही है
और मुझे डी एन  ए करवाना है तमाम भगवान का जो तिवारी है
जो मेहसाना है
जो अमर हिरा त्रिपाठी है
जो ......
मैंने तो सुना है हर नर में नारायण है
नारायण
इसलिए तो डर नहीं लगता है तुम्हें
नारायण न बन जाऊ
जानता हूँ इतना कि मैं नर हूँ
नारायण बनना नहीं चाहता
नारायणों की भीड़ में शामिल नहीं होना चाहता हूँ
तुमसे मुहब्बत करता हूँ .
डरता हूँ
जमाने से
जो जज है
जिनके फैसले मे तुम पर यकीं नहीं किया जायेगा
तुम हो ही ऐसी ..
दोषी तुम्हे ही माना जायेगा
और बरी हो जायेंगे वे
कि उनके बाप के नाम दर्ज है तिवारी ,मेहसाना ,त्रिपाठी ...
वो जोर जबरदस्ती कर ही नहीं सकते है ,कहता है और मुस्कुराता है
कि ये तो हमारी परम्परा है .
परम्परा कभी बुरी होती है ?
सती कर जला देते थे अब भी होते ही विधवा काशी भेज देते है .
काशी तो घर के भीतर ही होती है
तभी तो भ्रूण के क़त्ल  करते वक्त कांपते नहीं हाथ
तब भी आज भी
खून बहा देना ,बाएँ हाथ का काम है
लगातार हारते .पिटते चेहरों का
अभ्यस्त हो गए लोग
कत्ल की खबर आई पी एल  के सामने कोई औकात नहीं रखती
औकात ,नाक का हरामी बाप है .

एक समय पर एक बात नहीं सोच पाता हूँ
एक समय पर एक बात नहीं होती है
प्रिये
न जाने क्यों एक चुम्बन की ख्वाहिश  चली आई
जबकि तुम नहीं हो यहाँ
यहाँ पर कलम है कागज़ है
दिल है दिमाग है
लेकिन मैं नहीं हूँ .

 नोट ;; वह जानती है वह मेरी प्रेमिका है .प्रेमी हूँ यह पता है मुझे लेकिन हम दोनों को नहीं पता कि हम प्रेमी -प्रेमिका है .उस प्रेमिका के नाम लिखी जा रही कविता ...हाँ ,कविता का एक टुकड़ा भर है .
१६ मई २०१२

झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड

                     जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को   भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...