Monday, January 14, 2013

तू इतकी निरागस वाटलीस की तुझ्यात बुद्ध दिसले मला..


पीर बाबाच्या मजारीवर ,दुव्यांच्या  रांगानं मधे , मेंढरू  बनण्या  पेक्षा तू  फिरत राहिलीस
सुंदर नकली दागिने  आकर्षित करू  शकले नाही तुला
बंद शाळत गुलाबी कपड्यां मधे खेळल्या गेलेल्या शेवटच्या दिवसाच्या आठवणी
कुणाच्या शोधात गेली  गुल मकई  पीर बाबाच्या मजारी वर ?
खरं -खरं सांग कि काय आपल्या शालेवर तालिबान वार करेल ?

Saturday, January 12, 2013

कविता : लाठी

बहुत ही अजीबोगरीब सपने देखता हू
उसी तरह नहीं सोचता हूँ
दिमाग के भीतर किल ठोंक दी है हुक्मरान ने
किल के गले में तानकर स्प्रिंगनुमा तार अटका दिया है
उसपर लगातार डाला जा रहा है कुछ तो भी
जबकि उसी स्प्रिंगनुमा तार की जरुरत है माँ को ताकि
दरवाजे के दोनों सिरों पर उसे खीचकर
डाल सके पर्देनुमा कपडा लेकिन ये हो न सका तो
सफ़ेद नाड़े को जिम्मेदारी सौंप दी गई कि वह पर्देनुमा कपड़े को उठाकर खड़ा रहे

Thursday, January 10, 2013

खापा

   कहानी : कैलाश वानखेड़े 


सभीको दिखती है दूर से अमराई.गांव वाले हो या शहर के बाशिन्‍दे  किसी से भी पूछा जाये तो वह इसे शहर की सीमा से बाहर बतायेगा लेकिन अमराई शहर की सीमा के भीतर है. मोटी किताबों के रखवाले कहते है,लोगों का क्‍या हैउन्हें कुछ आता जाता नहीं इसलिए उन्हें मालूम नहीं.मालूम नहीं ,इस बात को इतनी बार बोला-लिखा गया कि मालूम नहीं .अमराई के पास आने के बाद दूर-दूर तक विरान जमीन दिखती है जिसे  खेत कहा जाता है.विरान खेतों को खरीद लिया गया हैखरीदी हुई विरान होती है.खेत विरान करने के बाद कॉलोनी आबाद होती है.अमराई से लगा सडक के पास खडा दिखता है आम का ठेलाठेलें के साथ होता है एक बुढा.जब नहीं दिखता बुढा तो दिखतीहै बुढिया तब होती है साथ में एक लडकी आठ-दस साल कीजो बकरियों के साथखेलती दिखती है.दिखतें है ढेर सारे आम के अलावा जामुन से आधी भरी टोकरी.खाली हिस्‍से के जामुन को जामुनों का शिखर बनाने के लिए जमाये हैएक के उपर ताकि दिखे दूर से ही कि ये जामुन है.शिखर दिखाने के लिए ही बनाये जाते है .जामुन पहचान लेऔर जबान खराब होने के डर को छोडकर खरीद ले. यहॉ जामुन के पेड़ नहीं है. पेड़ है आम केहर पेड़ पर आम.अमराई की तरह होता होगा प्राइवेट स्कूल जहाँ घनी ठंडी छाया तले खूब खेलने -पढने के बाद पेड़ पर चढ़कर आम जामुन खाने को मिलता होगा.समर के दिमाग में स्कूल के साथ साथ आम चला आया .

Wednesday, January 2, 2013

सावित्री-जिजाऊ जन्मोत्सव {3जनवरी से 12जनवरी }

सावित्रीबाई फुले के जन्मदिन से जिजाऊ माता (शिवाजी महाराज की मां )के जन्मदिन तक दस दिवसीय जन्मोत्सव का आयोजन किया जाता है . नारे लगाते हुए ,नुक्कड़ नाटक के माध्यम से जोर शोर से कार्यक्रम की शुरुआत अपने अपने तरीके से की जाती है .बोरखेडी व मोताला{बुलडाना } में विगत पन्द्रह वर्ष से जन्मोत्सव का आयोजन  लेखिका ,कवयित्री व प्राचार्य के नेतृत्व में किया जाता है .इस बार का आयोजान दामिनी को समर्पित किया गया है .दामिनी की जीवटता ,जीने के भरपूर हौसले और बलात्कारियों से जी-जान से लड़ने के जज्बे को स्त्री ताकत का प्रतीक माना गया .वह मरते दम तक जीना चाहती थी ,उस चाहत को सलाम .
सावित्रीबाई ने पढ़ना लिखना सिखा और लड़कियों की पहली शाला खुलवाने में पति की सहयोगी बनकर पहली महिला शिक्षिका बनी .

Saturday, October 27, 2012

कहानी 'घंटी' पर मिथिलेश वामनकर जी के विचार



                     आपकी लिखी कहानी ‘घंटी’ पढ़ी, एक स्तरीय कहानी है | विशेष यह कि एक अधिकारी के भीतर बैठे सृजनशील लेखन ने उस अंतिम पंक्ति में बैठे व्यक्ति ‘चपरासी’ को कहानी का महानायक बना दिया जिससे कहानी का स्वरुप अनायास ही विराट बन पड़ा | कहानी के नायक काका उर्फ मांगीलाल चौहान के किरदार का हँसमुख, काम के प्रति सजग होना, मेहनती और तनिक मर्यादित भीरुता का होना वाकई ऐसे किरदारों को सामने ले आता है जो आज हमारे आसपास दिखाई दे जाते है लेकिन उनमे हम नायकत्व की खोज नहीं कर पाते है | और कार्यालयीन माहौल का बाजरिया मिश्रा साहब अच्छा वर्णन है | झूठ कैसे इतिहास बन जाता है ये पंक्तियाँ प्रभावशाली है-

Monday, October 15, 2012

कविता "कहाँ जाओगी, दुर्गा" का मराठी अनुवाद

कुठे जाणार, दुर्गा 

जळत आहेत डोळे आता कि अजुन वाचला नाही मी पूर्ण पेपर
फेसबुक चे सारे अपडेट्स सुद्धा पाहू-वाचू शकलो नाही
बस्स दिसली फोटो दुर्गा ची
संदीपच्या वाल-वरून उदयप्रकाशच्या कविते पर्यंत येता-येता माझ्या डोळयात धुंदी आली
नकारत आहे कोणी माझ्या आतून
चल गोळी खा, झोपी जा

Sunday, October 7, 2012

चूल्हा.....कविता

कैलाश  वानखेड़े

बुरी तरह से थका हुआ अँधेरा करता है इंकार
अभी नहीं जाऊँगा और सो जाता है बडबडाते हुए
सुकून से दो पल भी सोने नहीं देते है.

उसी वक्त दिमाग के भीतर का अलार्म सोने नहीं देता उसे
पैरों के गले में पड़ी उम्मीद जगा देती है
कि चूल्हा सुलगाने के लिए आग धुएं के साथ
छिपमछई खेलती है
आँखों में धुंआं चढ़कर लिपटता है
कि राजमार्ग को जोडनेवाला फ्लाईओवर का पुल
छीन लेता है धुएं को और डरा देता है
आज अगर कहा कम है दाम तो दम निकाल लेंगे
बोल कहाँ जायेगी
दाम में से निकालकर दम को जान देने
पता है उसका पत्ता ...

झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड

                     जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को   भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...