Monday, June 5, 2017

गोलमेज



            
                       
         ''ओ खसकेल..भाग जल्दी वरना तेरको भूत ले जायेगा.उड़ाके..उप्पर...आसमान में.  चल रे भूतालिया आ गया.''चौथे को अनसुना कर पहला गोल गोल घूमती हुई हवा देखता रहा  जिसमें कागज, पोलीथिन ,कचरा,धूल और बहुत सा कुछ उड़ रहा है.तभी उसे लगा वह भी उड़कर देखे.उड़ने की ख्वाहिश में उस तरफ भागा और घुमती हुई हवा में घुसने की कोशिश करने लगा लेकिन भवरे की तरह घूमती हवा गोलाकार होती हुई तेजी से दाई तरफ बढ़ने लगी .उसके पीछे पीछे पहला भागने लगा. धूल के साथ साथ कंकड भाग रहे है.पहला, धूल हवा कंकड़ की मार खा रहा है.उसे लगने लगा उसकी जिंदगी में कंकड़ इस तरह न आये तो वह उड़ लेगा दूर आसमान में,नीले आकाश में,उड़ते बादलों में, पतंग की तरह.उसे देखकर चौथा फिर चिल्लाया, ’’पगलेट...मरेगा क्या?’’अभी भी पहला रोमांचित है.नहीं सुनता. उसका मन उड़ान यात्रा में है.हवा तेज गति से दोनों तरफ से आई थी.आकर कसकर आलिंगन किया.पलभर में ही सम्पूर्णता का अहसास कर दोनों दिशाओं की हवा मिलकर उड़ने लगी.जहाँ जाती वहां पर जो होता,उससे मिलती और ले जाती.जिसे अपने साथ ले जाना संभव नहीं होता उसे अहसास करा देती कि हम तो चले है, चल सको तो साथ हमारे चलो.यही पर ऐसा ही कुछ सुन रहा है  पहला.कोई सपना कभी दिमाग  में रखा था उसे हकीकत में बदलने के लिए वह गोल गोल नृत्य करती हवा आकाश की तरफ जा रही है, में,घुसने के लिए भागने लगा.हवा गोल आकार को विस्तार देने लगी. धूप खाने के लिए लटके हुए कपडे भी उड़ने लगे.किधर जाऊ क्या करू? सूझ नहीं पड रहा है,फैलती और लम्बी होती आकाश की तरफ बढ़ने लगी हवा. सफ़ेद कपड़ों में लिपटी औरत इसी तरह उडती हुई समुन्दर के किनारे पहुच गई थी,तेरे इश्क में हय..तेरे इश्क में.... तेरे इश्क...
       चौथा उसकी कॉलर पकड़कर खींचता हुआ ले जाने लगा.पहला हवा के साथ दौड़ते हुए  आसमान में जाने की चाह में था लेकिन अब हवा दूर होती जा रही है और उसके साथ आसमां में जा रहे है धूल,कागज ,पोलीथिन,कुछ कपडे. उडनेवाले ओझल होने लगे तो पहला अब पेड़ों को देख रहा है.उसे पूरी तरह से सुनाई दे रहा है पेड़ों के गाने.आपस में पेड़ों को चिल्लाते हुए नाचते हुए महसूस कर रहा है .भूतालिया चला गया लेकिन हवा तेज चल रही है. पहला चल रहा है जैसे सफ़ेद बादल.सीमेंटेड सडक बेहद चौड़ी है. इतनी कि क्रिकेट,सितोलिया जैसे खेल खेले जा सकते है.उसे सडक आसमान की तरह विशाल लगी.सड़क किनारे मकानों के सामने और भीतर कार ही कार है.किनारे खड़ी कार के पास फुटपाथ के बीच में पेड़ ही पेड़ है.कोई भी बच्चा नहीं जान पाया उन पेड़ों के नाम.पत्ते है उनमें,लेकिन न फल है न फूल. किसी पेड़ के पत्ते ही ऐसे है कि उन्हें फूलों की जरुरत नहीं.जब फूल का काम पत्तियां करे तो फूल के पेड़ को क्यों रखे? पहला पेड़ों को और चौथा दूसरे और तीसरे को देख रहा है, बोल रहा है,चिल्ला रहा है.दूसरा और तीसरा,कोने में खड़े हो गए है.
        वे चार है,नौ से उप्पर और बारह तक की उम्र के. घर मोहल्ले की रेंज से बाहर के एरिया में उछलते कूदते हुए अपना मन का किया करते है.सभी की हाईट कमोबेश एक जैसी ही है.घरवालों को फुरसत न मिली कि उनकी उंचाई नापते या देखकर अंदाजा लगाते.स्कूल से तो खैर उम्मीद ही नहीं है.पहला और तीसरा पढने में तेज है,ऐसा दूसरे और चौथे को सुनाया जाता था.डरा डराकर नसीहत दी जाती थी कि उनके जैसा पढ़.पहले और तीसरे को उन दोनों से दूर रहकर मन लगाकर पढ़ने की हिदायत उनके घर के भीतर घूमती रहती.चारों ने घरवालों की हिदायतों को कभी नहीं माना. अपने मन की मानी.आज जब निकले तो दिमाग के भीतर कोई प्लान या टारगेट नहीं था,हमेशा की तरह.न ही चलते हुए गा रहे थे.तीखी धूप को गाली देकर सफ़ेद बादल आकाश को कैद करने लगे तब चौथे ने चिल्लाकर कहा,’’भागो रे...कौन सबसे आगे जाता है...भागों ...’’पहला वाला बादलों में खोया था.वह कैद करने का  तरीका समझने में लगा था.वह अक्सर इसी तरह सोचता और उसमें खो जाता.वह हवा को भी समझने में कई घंटे लगा देता.चेहरे से, नाक से अपने भीतर के फेफड़े से अंदाजा लगाता.सवाल अपने से करता.वो अँधेरा, यह हवा किस तरह आती है,धूल क्यों फटाक से उठकर हवा के संग संग जाती है.कई चीजें,कई बातों में खो जाना,उसकी फितरत बन गई.
        ''अबे रुक...देख आम का पेड़.''पहला खुश होकर बोला गोया की प्यारा दोस्त दिखा हो.सडक किनारे फुटपाथ के पास में है आम का पेड़. दीगर पेड़ की लाइन इससे दूर है.फुटपाथ पर मकानों की जालियों,गेट और उससे आगे पेड़ों की लाइन है.’’तो .’’चौथा बोला और उसने आम के पेड़ में लटके हुए बहुत सारे कच्चे आम देखे. बढ़ते हुए आम.उन्हें अपनी उम्र की दहलीज पर खड़े दिखे.तीसरा बोला,गद्दर है. चौथा बोला कच्ची कैरी और जमीन से लगभग उछला जबकि पहले वाला आम का पेड़ है, यही सोचकर आल्हादित हुआ.उसने अपने साथ पत्तियों का होना महसूस किया जो उस वक्त हवा के साथ मस्ती कर रही है.चौथे ने दूसरे को जल्दी आने के लिए आवाज लगाईं और पेड़ पर सरपट चढने लगा.दूसरा भागकर आया और जैसे तैसे पेड़ पर चढ़ गया. 
       किसी बंगले का कोई खुला हुआ दरवाजा हवा के कारण बज रहा है.किसी बंगले में फ़र्श रगड़ते हुए धोने की आवाज आ रही है.बंगले से बच्चों-बड़ों की न आवाज आ रही है न ही उनकी परछाई दिख रही है.सब बंद है.पाश कालोनी है.इसी वक्त किसी लोहे के दरवाजे से एक बड़ा कुत्ता निकला.कुत्ते को  देखते ही डर गया पहला.पहले के अलावा किसी का ध्यान इस तरफ नहीं है.दोनों उप्पर है और तीसरा उन्हें देख रहा है. तीसरे को पहले ने कुत्ता दिखाया.कुत्ते को देखते ही तीसरा बुरी तरह से डर गया.हो न हो उन्हें भगाने लिए कुत्ते को भेजा हो.उसकी आवाज बंद हो गई.पहले ने आवाज लगाईं.’’नीचे उतर..चल बे.''दरवाजे को बंद कर लड़की निकली.उसने कुत्ते के गले में बंधी चेन पकड़ी हुई है.तीसरे ने झट से लडकी को पहचान लिया,अरे ये तो अपने मोहल्ले की है. पांचवी गली में रहती है.तभी तीसरे को लगा वह तो चारों में सबसे बड़ा है.उसके इस दावे को खारिज किया जाता था हर बार.बड़ा नहीं माना गया उसे लेकिन फिर भी वह खुद को सरकारी कागज के आंकड़ों के आधार पर बड़ा मानता रहा.इसी तर्क के आंकड़े ने लड़की को देखा और देखता रहा.लड़की के हाथ में मोबाइल है दूसरे हाथ में कुत्ते को कंट्रोल करने वाली चेन.लड़की का नहीं है मोबाइल. मालकिन ने दिया है.इतने महंगे कुत्ते को लेकर लड़की कहाँ पर  है?यह मालकिन घर के भीतर लडकी को देखे बिना जानती है.मोबाइल में जीपीएस सेट है.लडकी जहाँ जहाँ जायेगी उस जगह को मालकिन  अपने मोबाइल में देख सकती है.वह कुत्ते को घर से बाहर ही करवाती है.कुत्ता चार पांच चक्कर लगाने के बाद अपनी तयशुदा जगह पर करता है.करने का यही वक्त है लेकिन कुत्ता बच्चों को देखकर असहज हो गया.कुत्ता भौंका नहीं जैसे कि दोनों बच्चों को आशंका थी. अपनी बाउंड्री से बाहर अजनबी को देखकर नहीं भौंका करते है, बड़े मकानों के कुत्ते.क्या लेना देना पडौसियों से?मालिक का अनुसरण कर रहा है कुत्ता या कुत्ते का अनुपालन मालिक?
       कुत्ता इधर उधर जाता है,सूंघता है.लड़की को अच्छा लगा कि सुनसान रहने वाली गली में कोई आया है.सड़क पर है एक उम्मीद.तीसरा उसे देखता जा रहा है.पहले ने सोचा, दुबली पतली लड़की ने इतने खतरनाक  कुत्ते को कंट्रोल में कैसे रखा?उसकी कोई बत्ती जली, लडकियां कितनी जल्दी सीख जाती है कुत्तों को कंट्रोल में रखना..और पहला,तीसरे को देखकर मुस्कुराया.
             टहनियों से चिपके हुए दोनों बच्चे मौज मस्ती कर झूमते पेड़ के साथ झूम रहे है.पेड़ पर इस तरह झूमने का यह अलग अनुभव रोमांच दे रहा है.आम को देखते ही पकड़ते,तोड़ते और नीचे कैच करवाने के लिए फेंक देते.पेड़ पर कई आम को वे पकड नहीं पाते.एक हल्का सा स्पर्श होता और टहनी आम को दूर ले जाती.एक स्पर्श की चाह में ताकता हुआ तीसरा मन ही मन बोला,गद्दर है.पहले ने उप्पर देखते हुए कहा,''उतर बे. भोत हो गए.चल बे चल.''पेड़ पर चढ़े  दोनों सारे आम तोड़ने के सपने को हकीकत करने में लगे है.वे जवाब तक नहीं दे रहे है.चौथा आम तोड़कर बोला,’’ ले पकड़...’’तीसरा उस लड़की से बात करना चाहता है. लडकी हायर सेकेंडरी में पढती है.
       खिडकियों को बंद करने की खडखडाहट के साथ किसी की तेज भागती  घालमेल होती भुनभुनाती आवाज है,जो सूखाने के लिए डाले हुए कपड़ों  को उतारने के साथ आ रही है. कामवाली बाई से उम्मीद करती हुई कि उसे तो पता होना ही चाहिए. तेज हवा का सीजन है,तो कपडे ऐसी जगह न डाले...इसी उम्मीद में बडबडाती स्वर लहरियों के बीच इस मकान के मालिक की नजर नुकीले लोहे की जालियों में से बच्चों पर पड़ी.पहले ने आगाह किया,’’भोत टेम हो गया.चल.अबे इत्ते सारे आम कैसे ले जायेंगे?’’
      ''तेरी बुशट उतार...तू तो छोड़ बे.ओ तेरी बनियान हाँ हाँ टीशट उतार.उसका मु बंद कर.फिर सारे आम उसमें डाल देंगे...अबे तू सुन रिया क्या #$%^.''ऊपर से तीखेपन से तीसरे पर चौथा चिल्लाया जिसमें उम्मीद थी.घर था.मां थी.भाई बहन थे.शाम थी. रोटी के साथ अचार था,टेस्टी वाला.पहले वाले के पास चिंता थी.फ़िक्र थी दोस्तों की.तीसरे का मन नहीं है इस आदेश को मानने का.कई कारण इकठ्ठा हो गए उसके पास.लड़की का होना,फिर बड़ा होकर भी छोटे की बात मानना,टीशर्ट का नया होना. कल ही नंदा नगर से टीशर्ट खरीदी थी उसकी माँ ने.जामुनी रंग के आधे हिस्से के बाद फीका हरा रंग और जो डिजाईन है वह ‘’क्रास‘’जैसी है.लड़के को टी शर्ट के ख़राब होने और फटने का भी डर सताने लगा.उसने कहा,मै नी देता ..जा.’’
     ’’ठीक है मत दे,कल से अपना थोबड़ा भी मत दिखाना.भाग स्साले..चल तू ही शट उतार.’’चौथा कड़का.निशाना सीधा लगा.तीसरे ने गाली देते हुए अपनी टी शर्ट देखी. उतारे या नहीं..उसने लड़की को देखा और सलमान खान की याद आते ही टीशर्ट उतारकर उप्पर उछाला ..ले ..लेले.’’
         पहला टीशर्ट की गरदन दोनों बाहों से बांधकर आम डालने लगा.‘’उतर उतर,वो देख.’’धीमी सतर्क आवाज में कातरता है.लड़की के चेहरे पर परिचित से लडको के प्रति सहजता है लेकिन उसके साथ वाला कुत्ता अभी भी असहज है.पहला कुछ आम भरकर टीशर्ट का मुँह बंद करने की जदोजेहद में लग गया.रस्सी बांधने से ही मुँह बंद होगा लेकिन रस्सी नजर नहीं आ रही.रस्सी जैसा कुछ दिख जाए मिल जाए...सोचते हुए उसकी नजर सड़क किनारे के कचरे में चली गई.
    लोहे का दरवाजा खुलते वक्त चुप है कि चप्पल भी बेजुबान हो गई.पहले वाले को इस खामोशी पर ताज्जुब हुआ. उसके घर की गली में इंसान के चलने की आवाज घरों के भीतर,गली के मोड़ पर बाआसानी सुनी जाती है.इनके घर,दरवाजा और चप्पल की तरह ये भी चुप ही रहेंगे, यह सोचकर पहले की आवाज का वाल्यूम बढ़ गया.’’मकान वाली..उतर बे.’’बंगले के दरवाजे से बेहद धीमी आती हुई महिला,क्रीम रंग पर निचुडा हुआ बैंगनी रंग के फूलों से भरा गाउन को हल्का सा उठाती हुई आ रही.पैर उठाने का संघर्ष कर रही है.पैरों में गाउन उलझ न जाये,चलते हुए फिसलने का भय है या बाहर बच्चों की शक्ल में चोर लुटेरे होने की आशंका जो वृद्ध की हत्या के पुराने समाचार से गाढ़ी और ताज़ी हो गई.ठीक ठीक समझ नहीं पाया पहला. उसे लगा,जितने जल्दी हो निकल जाए लेकिन न रस्सी मिली न इतनी ताकत जो आमों को लेकर भाग सके.तीसरा आ गया पास में. कही हताशा थी कि खामोश होकर लड़की को ही देखता जा रहा है.रेंज से बाहर ही है लड़की.कुत्ता सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक जगह पर मल विसर्जित नहीं कर पा रहा है और लड़की को देर हो रही है.लड़की ने सलवार सूट पहना है,जिसका रंग डार्क होने से समझ नही आ रहा है.सूट गंदा नहीं है लेकिन इस तरह के रंगों के बारे में लोग सोचते है ये गन्दा होने पर भी गंदा नहीं दिखता. कुछ चीजें बाते ऐसी ही होती है,जिसके बारे में बहुत कुछ ऐसा ही सोचा जाता है,जैसा वह होता ही नहीं.
         पहले वाले ने देखा इसी लोहे के दरवाजे के पास काले रंग के चमकीले पत्थर पर सुनहरे रंग से लिखा है,गोदकर. बड़े अक्षर में, 
                                      ‘’मंगल मूर्ति
                                        मोहन माहेश्वरी
                                                                               ,डीबी स्कीम नं.५४
 इसी दरवाजे से बाहर आती हुई महिला को पीछे छोड़ते हुए लाठी के सहारे तेज क़दमों से वृद्ध आ रहा है.मतलब ये मोहन माहेश्वरी है.मतलब ये आगे आयेंगे मतलब इनसे बोलना होगा यानि क्या बोले?इस प्रक्रिया में लग गया पहला.पेड़ से उतरकर तोड़े हुए आम की हिफाजत करने के लिए चौथा आगे आया.किसी मकान के गंदे कपडें और झूठे बर्तन के साथ धूल को भगाकर तेजी से आती हुई महिला दिखी जो पिछली गली की है. जान पहचान वाली होने से तीसरे ने अपने भीतर साहस को देखा.पहले को अजनबी पेड़ों में आम का पेड़ अपना लगा था वैसे ही लगी महिला.बिना आवाज दिए बिना बुलावे के आ गई.महिला ने आते ही बिखरे हुए आम को इकट्ठा करना शुरू कर दिया. गजब की फुर्ती और तेज दिमाग की मालकिन को देखकर पहला आसपास के मकान देखने लगा, पडौस में दीवार पर टांगे हुए पतरे के बोर्ड पर है,ठा.दौलतसिंह शक्तावत,कुंडला हाउस.सामने है अग्निहोत्री भवन.उसके पास राधा कृष्ण मंदिर सडक के खत्म होने वाली जगह पर दिगम्बर जैन मंदिर है जो राधा कृष्ण मंदिर  से कई गुना ज्यादा भव्य है .तभी पास आ गया मकान से निकला हुआ आदमी.महिला ने साड़ी के पल्लु को पेट की तरफ खोंसकर बिखरे आम को डालना बंद किया बाकि आम टीशर्ट में डालती हुई बोली,’’चलो.. ऐसे ही दोनों मिलके उठाओं.’’ खुले हुए मुँह को पहले ने पकडा दूसरा छोर दुसरे ने पकड़कर उठाया.तभी वृद्ध ने कहा,’’येss.. ये ss..रख आम इधर.ओ तेरको ही बोला है..निकाल आम.’’ वृद्ध में भारी गुस्सा भरा हुआ है मगर मानने को कोई तैयार नहीं है.
    ’’ये आम कैसे तोड़ लिए है? अपना बाप का माल समझ रखा है?आम यहीं रखों.’’झुकी हुई कमर के साथ लाठी के इशारे से बोलते वृद्ध के सिकुडे हुए बदन पर कुर्ता है.एक बच्चे के एक धक्के से वृद्ध को गिराकर भाग सकते है,दूसरे ने सोचा और शरारत से भर गया.यह सब जानते है कि आम उठाकर ले जाए तो वृद्ध उन्हें रोक पाने में शारीरिक रूप से असमर्थ है.यह वृद्ध भी जानता है.बच्चे और महिला को लगा बोलबालके मामला निपटा देते है.
   ‘’उधर क्यों रखे आम?’’ चौथे ने आते ही बोला,उसके हाथ में टेलीफोन का काला तार है. उसे रस्सी बनाने का इरादा लेकर आया है.
  ’’सीधे तरीके से बोल रहा हूँ मान लो.आम यही रखके भागों यहाँ से.’’ ‘’नी जाते.अब  बोलो.’’चौथा बोला तो वृद्ध ने कहा,’’पुलिस को बताता हूँ,अभी. ‘’वृद्ध के चेहरे पर चमक बढ़ी कि डर के हथियार से बच्चों की हिम्मत काट रहा हूँ कि रीढ़ की हड्डी सीधी होने का अहसास होने लगा.‘’यही रख.’’लाठी से दिशा और जगह बताते हुए बोले वृद्ध.ये पिद्दी बच्चे मान क्यों नहीं रहे उसकी बात,सोचा और पेड़ को देखने लगे.
   ‘’नी रखना.’’चौथे ने काले तार को सीधा करते हुए कहा.
    ‘’रख..वरना?’’वृद्ध ने अपनी आवाज में धमकाहट लाते हुए कहा तो तत्काल चौथा बोला,‘’वरना क्या?’’चौथे की आवाज से निकली ध्वनि.आँखों के भीतर का ताप इतना तेज है कि वृद्ध को लगा अब बोलकर डराना आसान नहीं फिर भी पत्नी से कहा,’’अरे जरा मोबाइल देना मेरा.’’ जिसे सुनना था वह सुन नहीं पाई. तभी आम की तलाश में निगाह डालती महिला बोली,’’ बाबूजी जाने दो.आम तो हवा से गिरे है.हम नी ले जाते तो कोई भी ले जाता.आम ही तो है.’’
   ‘’आम है तभी तो.पत्तियां ले जाते तो कुछ नही बोलता.जानवरों को खिलाते तो पैसा और पुण्य  मिलता.’’वृद्ध बोला तो पहले ने कहा,’’आम के पत्ते जनावर नी खाते.’’
       ‘’तू चुप कर.अरे आम के पत्ते ले जाओ.घर के दरवाजे पर पत्तों की माला लटकाओ. बरकत बढ़ेगी.पैसा आएगा तो ऐसे भटकना नहीं पड़ेगा.जाओ मंदिर में प्रसाद लो.भगवान का आशीर्वाद लो.हाथ जोड़कर माफ़ी मांगों भगवान से कि अब चोरी नी करेंगे.भाग्य सुधर जाएगा.भाग्य.’’ वृद्ध असफल हो चुके थे.सम्मानजनक तरीका अपनाना चाह रहे है इसलिए उनकी आवाज में मृदलता आई.
      ‘’चोरी..? किसने की चोरी? हमने नी की चोरी.नी जाना मंदिर.नी लेना प्रसाद वरसाद. चलों रे.’’चौथा बोला तेजी से.
     ‘’चुप..अधर्मी.बुजुर्ग से ऐसा बोलते है?ये पाप है.पाप करे और माफ़ी न मांगे भगवान से.नरक मिलेगा नरक.’’गुस्सा आ गया फिर वृद्ध को.
     ‘’बच्चों से ऐसा बोलते है? वैसे भी अभी कौन से स्वर्ग में है?आप हमारी चिंता मत करों.’’पहले ने अपनी खामोशी को हटाकर गुस्से को पीते हुए कहा.
       ‘’अभी लगाता हूँ मोबाइल.चौराहे पर होगी पीसीआर.एक मिनिट में आएगी और ले जायेगी थाने.वही बताना चोरी की थी कि नहीं. ओ बाई तू समझा ले नादान को.इसके चक्कर में सब जायेंगे जेल.जेल से निकलना मुश्किल कर दूंगा.’’वृद्ध ने डराने के लिए आवाज में कडकपन और भरोसा भरकर कहा.डर के साथ भ्रम हावी होने लगा,पहले और चौथे को छोड़ बाकि पर.तभी महिला बोली,‘’कोई चोरी की?डाका डाला,जो इतना डरा रहे हो सेठजी?अरे आम ले जा रहे है.धरम मंदर परसाद की बात करते हो तो समझों तुमने पुन्य कर डाला.इतने  बडे मकान वाले को कायकी कमी?’’
    ‘’ये झाड तो तुम्हारा नी है,फिर ये आम तुम्हारे कैसे?’’महिला के बोलने के बाद तत्काल चौथा बोला तो वृद्ध के चेहरे की चमक उतरी लेकिन इतने आगे आ गए कि अपनी बात से पीछे जाना मुश्किल लगा इसलिए हार न मानते हुए कहा,’’ये पेड़ मेरा है.मैंने लगाया है मैंने मेहनत की है.जो लगायेंगा,वही खायेगा.जो खायेगा वही मालिक होगा.आई समझ में ?’’
    ‘’ये जगे सरकारी है.सरकारी जगे के झाड भी सरकारी है. सरकारी झाड के आम भी सबके है.’’चौथे ने कहा जबकि उसके दिमाग में चल रहा है कि कच्चे आम से वृद्ध का सिर फोड़ दे, अब सहन नहीं हो रहा है उसे.ये बातों से समझ नही रहा है. सरकार की तरफ से काटी गई कालोनी में सड़क के दोनों छोर पर जालीदार गेट लगाकर बोर्ड पर लिखा गया,यह आम रास्ता नहीं है. ये पूरी तरह से गलत है लेकिन कहे कौन.
    ‘’ये तो झूठ है.ये समझ लो तुम सब,मरते मर जाऊँगा लेकिन सारे आम तो नहीं दूंगा...अच्छा ठीक है,चलों ऐसा करते है,तुम्हारी जेब में जितने आम आ जाए उतने ले जाओं और बाई तू भी तेरे पास जितने है,उतने ले जा.बाकि बचे हुए आम यहाँ इधर रख.‘’वृद्ध मान चुका है ये आम नहीं देंगे इसलिए समझौता करना ही पड़ेगा.जितने भी आम मिलेंगे वह समझौते से ही मिलेंगे,यही सोचकर समझौते में महिला को ज्यादा फायदा देकर इस गठजोड़ को तोड़ने में विरासत से प्राप्त ज्ञान का सदुपयोग कर वृद्ध ने ख़ुशी हासिल की.
   ‘’हाँ हाँ ठीक है.चलो बे चलते है.’’आम तोड़ने ,भरने या बोलने में जिसका कोई लेना देना नहीं है उस तीसरे ने कहा लेकिन सभी ने अनसुना किया तो हताशा से भरी उपस्थिति दर्ज करवाकर तीसरे ने कहा,’’मैंने तो पहले ही रख लिए आम अपनी जेब में.और नी चीये आम.मै तो चला.मेरी टीशट दे ..चल शाम को मेरको दे देना.’’तीसरा जाने लगा लड़की को देखते देखते.
    ‘’तेरको जाना है तो तू जा लेकिन हम तो सारे आम ले जायेंगे.पुलिस को बुलाना है तो बुला लो.’’चौथा बोला.तीसरा रुका नहीं.चला गया.लड़की सब सुन रही है.वह कुत्ते का मल विसर्जन न होने के कारण दूर खड़ी थी.
    लड़की ने इसी साल स्कूल में पढ़ा था,गोलमेज सम्मेलन,पूना पैक्ट.सर की बात याद आने लगी थी.पूना पैक्ट को डिटेल में बताने की बात पर सर ने कहा था कोई मतलब नही ज्यादा समझने का.परीक्षा में दो नम्बर से ज्यादा का सवाल कभी नही पूछा जाता है.तुम लोग तो इतना सा याद रखों कि येरवडा जेल में डॉ.अम्बेडकर और गांधी जी में एक समझौता हुआ था जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है.ये गोलमेज सम्मेलन की असहमति के बाद का है.इसके बाद लडकी को घर में अपने कम पढ़े लिखे पिता ने पुरे विस्तार के साथ पूना पैक्ट बताया था.गांधीजी के आमरण अनशन में मरने की नौबत आई और कैसे दबाव में ये सब हुआ.लड़की की आँखों में पिता का चेहरा दिखने लगा.पिता बताते बताते चुप हो गए कि हमारे साथ धोखा किया गया.
   आम वाले इस मामले को सुनकर न जाने कैसे गोलमेज सम्मेलन याद आया. कुत्ते का शौच हो जाने के बाद लड़की को लगा, अब उसे इन लोगों के पास आ जाना चाहिए.
     वृद्ध ने चौथे को नजरअंदाज कर तीसरे को सुनाते हुए कहा,’’ये है समझदार..’’फिर दूसरे और महिला को देखते हुए कहा,’’चलो सब की बात छोड़कर ऐसा करते है.ये मेरा पेड़ है. जमीन मेरी है फिर भी आधे आम तुम सबको देता हूँ और बाकि आधे मै रख लेता हूँ. बस आधे...ठीक है.मैं तो तुम सब लोगों की भलाई चाहता हूँ.हमारे घर में झाड़ू पोंछा वाली बाई से पूछ लेना,वो बर्तन साफ़ करने आती है.वो बता देगी कितने दयालु है हम.हम बचा हुआ खाना फेंकते नहीं ,उसी दे देते है.अन्न का अपमान नहीं करते और तो और वो सड़क गटर साफ़ करनेवाले से पूछना उसे तो हर महीने पचास रूपये देते है. मैंने सबका भला कर उद्धार किया है.’’वृद्ध ने असफलता ढंकने के लिए साधू की तरह कहा.  
      ‘’पचास रूपये देकर कौन सा उद्धार किया है? कोई उद्धार नहीं किया है.आपकी जरुरत थी इसलिए ये सब किया है.’’लड़की के भीतर का गुस्सा अचानक ही निकला वो आते से बोली.लडकी को अनसुना किया वृद्ध ने और कहने लगे, ‘’सुबे सुबे झाड़ू लगाकर वो झाडूवाला गिरे हुए आम ले जाता है लेकिन कभी भी मना नहीं किया उसे ...अरे इतना उदार रदय है हमारा और ये छोकरी पता नहीं क्या क्या बोल रही है?चलो...न तेरी न मेरी.और अब अगर मेरी बात नहीं मानोंगे तो मजबूर होकर पुलिस को पडौसियों को गार्ड को सबको बुलाकर तुम सबको जेल में डलवा दूंगा. तेरको चोरी चकारी के अलावा आता क्या है?’’ नम्रता समझाइश से भरे समझौते का असर नहीं होता देख भय दिखाया.वृद्ध जानता है ये एक मोहल्ले के होकर भी सब अलग अलग गलियों के है,ये एक नहीं हो पायेंगे इसलिए फिर बोले,’’ये गली तुम्हारी है?ये मोहल्ला तुम्हारा है,आये कैसे इधर?’’
    ‘’ये आसमान तुम्हारा है?ये हवा तुम्हारी है? भूतालिया जैसी बात कर रहो हो.गोल गोल?’’पहला बोला तो जवाब ही नहीं सूझ पड़ा वृद्ध को.इसी बंगले की मालकिन अभी भी खड़ी है समझने के लिए कि सुनाई नहीं देता है बिमारी की वजह से लेकिन दरवाजे से आगे जाए या न जाए यह फैसला नहीं कर पा रही है.घर की दहलीज लांघकर कभी नहीं बोली मालकिन.अब इस उम्र में आकर पति से बोलना चाहती है, आ जाओं..जाने दो लेकिन जबान निकलने से पहले इजाजत चाह रही है.तभी लड़की ने कहा,‘’बाबूजी ये आम का पेड़ आपने नहीं लगवाया.मेरी माँ इस्सी गली में काम करती थी बरसो से.वो बताती है,यहाँ पे जब कोई मकान नहीं बना था तभी से है आम का झाड.अपने आप उगा था. इसलिए पेड़ पर न तो आपका हक़ है न जमीन आपकी है.आप याद करोगे तो सब याद आ जायेगा.’’ लड़की ने इधर उधर होते कुत्ते को कंट्रोल करते हुए कहा.
      लडकी की बात सुनकर  वृद्ध तैश में आकर बोले,‘’तू कौन होती है बीच में बोलने वाली?तू तो हमारे बीच बोल ही मत.’’इस सड़क पर जैसे आम जन आ नहीं सकता वैसा ही दो के लफड़े में तीसरा नी टपके,यही सोचा वृद्ध ने लेकिन लड़की उतने ही अधिकार से बोली,’’बाबूजी ये मेरे मोहल्ले के है. मेरे है.’’ 
    ‘’तू तो चुप कर.पढ़ और पढ़ा ले लेकिन सड़क पर बोलेगी तो काम से निकलवा दूंगा.आई समझ में.’’आगबबूला हो गया वृद्ध.
     ‘’आपमें दम होगा तो निकलवा देना. डराना वराना मत.यह पूना नहीं  है कि बोलोगे मर रहा..मर रहा हु...बोलबोलकर समझौता करवा लोगे.ये जेल नहीं गली है गली..वह भी खुली हुई.लोहे के गेट लगाने भर से,गार्ड बैठाने से गली न तो बंद होती है न जेल बन जाती है.’’लड़की निर्भयता से बोली.उसके दिमाग में पिता की बातें थी.चेहरा था.दुबली पतली लड़की आम का मजबूत पेड़ लगी पहले को.वह देखता ही रह गया मगर वृद्ध लड़की की मजबूती से अनजान बनते हुए कहा,‘’पूना? फ़ालतू बात मत कर.चार क्लास क्या पढ़ ली, लगी चपर चपर करने.तू तो हट.चलो तुम लोग मान रहे हो या बुलाऊ पुलिस को?’’ वृद्ध ने आक्रमकता से डराना चाहा लेकिन उनका चेहरा बता रहा है, निराशा ही मिली लेकिन अब वापस जा नहीं सकते. चुप रह नहीं सकते.क्या करे?
   ‘’चार नहीं हायर सेकेंडरी में हूँ.जानती हु सब.सब आप जानते है.तब दया की थी हमारे बाबा ने और आपने धोखा.तब आपने बेजा जिद न की होती तो आज हम यहाँ खड़े नहीं होते. अपने घर में पढ़ रहे होते...यही बता दो ,अब कौन ले जाता है आम?ये पडौसी..इनको तो आप कुछ नहीं बोलते. बड़े लोगों को आप बोल ही नहीं सकते है और हमें ही ज्ञान दे रहे हो.पेड़ सबका है.आम सबके है. जो चाहे वो आम ले जाए.’’लड़की के मोबाइल की घंटी बजी. मालकिन बुला रही है.लडकी रिसीव नही करती कॉल.चौथा लड़का बोलता है,’’ये सच्ची बोलती है.तुम्हारा झाड है ही नी तो देने वाले तुम कौन? हम तो सब ले जायेंगे फिर जो चाहे वो कर लो.’’कि बजते हुए मोबाइल पर उभरते आंकड़ों की अकड निकालती हुई लड़की कहती है,चमकती स्क्रीन को देखते हुए,‘’ये कोई गोल टेबल नहीं है कि बात ही बात करते रहेगे.हो गई बात.अब ये बापूजी कुछ नी कर पायेंगे.तुम लोग तो ले जाओ.’’लड़की ने कहा फिर मोबाइल पर बोली,’’जी मैडम, दरवाजा खोल दिया है.आ रही हूँ.’’
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Thursday, August 7, 2014

थू करने के लिए नही है मेरी जबान पर थूक

बकवास करते है आप ,जाति कहाँ है ?

बीच बाजार में घसीटते हुए ले जाकर
लटका दिया उल्टा
वही जहाँ है फव्वारे और ढेर सारे फूल खिलने की प्रतीक्षा में
ठीक उसी सड़क पर जो हवाई अड्डे से औधोगिक केंद्र को खींचती है
जिसका दूसरा हाथ बिग बाजार के माल के नीचे रखा हुआ है
वही पर
उसकी गरदन को धड से अलग करने के लिए
तलवार से काटा गया
खून निकला और वही जिसे कली कहकर हँसते हो
उसके भीतर चला गया
किसी को पता ही नहीं चला
काले शीशे से लाल रंग तो दिखता नहीं लाल
और हीरो होंडा बजाज से निगाह आगे की तरफ होती है
उसकी नजर में भी घुस न सका खून
फुटपाथ को तो घेरकर शर्मा स्वीट सेंटर ने कंजूमर के हवाले कर दिया
राहगीर नहीं है कोई उसकी राह खा गया वह
उसी वक्त सुपारी के कारखाने में जल रहा है कुछ तो भी
भट्टी के नीचे
सुपारी को सेंकने के लिए और फ़ैल रहा है उसका धुआँ
जो जाता है सीधे आँखों में
मसलते है और आगे बढ़ जाते है कि उनके पास नहीं है वक्त
गाली देने के लिए भी
तभी किसी आवाज से कोई समाचार आता है
दिमाग के भीतर भट्टी में
पहाड़ियों में गड्डों से जाता नहीं हर कोई डही
जहाँ फरमान हुआ है

तस्दीक करनी है उसी जाति के तो हो लेकिन ये काम करते हो ?
विकास बहुत हुआ
बहुत कर ली कोटे वालों ने तरक्की हक़ मारकर .
गाँव ,पटवारी,पंचायत ,स्कूल के प्रमाण के बाद भी जरुरी है
संतुष्टि के लिए फोटो .
भरोसा ही नहीं होता मनुष्य को देखकर
कागज़ पंचनामा रिकार्ड शपथपत्र
सब हो सकते है फर्जी

बनाया जा सकता है आदमी को भी फर्जी
जाति प्रमाण पत्र तो सदियों से बनाए जाते रहे है
सदियों से करते आ रहे है यही कामधंधा हमारे पुरखे
तब शिवाजी की जाति के लिए बनारस से बनवाये गया था रिकार्ड

अब कलयुग में ऊँची जात का नहीं चाहिए प्रमाण
वो तो रोटी बेटी से कर लेते है
बार बार हजार बार सरेआम कहते है
कभी अपने गरीब होने के पुछले को जोड़कर तो कभी मूंछ पर ताव देकर
कहते हो ही ही करते हुए बनिया आदमी हूँ

तय कर देते हो और सामने वाला भूल गया हो तो याद कर ले अपनी जाति

कोटा ,आरक्षण रिजर्वेशन मेरिट प्रतिभा पलायन देश दुनिया
राजनीती वोटबैंक गंदगी कचरा फिल्म हिरोइन एसएमएस एमएमएस वाट्स अप नीली फिलिम गाने ....बाय करते हो
कि भोत काम बाकि है
ये जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है
ये देश भी कोई देश है ...

उस बच्चे से जिसे भगवान का रूप बोलते हुए किसी को शर्म नहीं आती
कहते हो पाना हो स्कालरशिप तो ले आओं मरे हुए जानवर के साथ
अपना फोटो...

ढाई सौ किलोमीटर दूर जब सुनता हूँ
तो अपने को किसी आदिम गुफा में पाता हु
सन्न हु
कि कितने कुत्सित विचार है तुम्हारे
कि मानसिकता की सडन के बाद भी तुम अभी भी हो
उसी गटर के कीड़े जो रेंगता है गंदगी छोड़ता है और सड़ जाता है
थू करने के लिए नही है मेरी जबान पर थूक

बस बचे है मेरे पास शब्द जिन्हें वापरता हूँ
कि चूल्हा जलाने के काम आ जाए
कि कक्षा नौ के पाठ की तरह अपने बेटे को पढ़ा सकूँ
जब कोई मांगे तुमसे इस तरह का प्रमाण
तो मेरी तरह खुद का क़त्ल मत होने देना
मेरे बेटे उससे कहना अंकल जी मेरे पास है एट्रोसिटी का कागज
घर में है संविधान .
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शनिवार, 12 अक्टूबर 2013...
janpaksh blog me..
http://jantakapaksh.blogspot.in/2013/10/blog-post_12.html

Monday, August 4, 2014

समझ गये ना


कुछ ऐसा ही ख़याल आया था लेकर लाउडस्पीकर
कहूँ
तुम इसे चिल्लाना कहोंगे
कहोंगे
जो भी कहना है शालीनता से कहो
कहो सुर में
न हो सुर तो कर्णप्रिय लगे
कर्णप्रिय के साथ लय हो ताल तो जरुरी ही है
और सबसे बड़ी बात तुम चुप नहीं बैठ सकते हो
अपना काम करों ये क्या लिखते हो ?
हम है न लिखने के लिए
हम तुम्हारी आवाज बनेंगे तुम्हारे दर्द को उकेरेंगे

हिदायत है सलाह या चेतावनी

दीवार पर टंगी हुई किल के बारे में ,चलो देखते है कौन बेहतर लिख सकता है
बेहतर ...डराता है शब्द .
बेहतर लिखना  ही लिखना होता  है


लिखने के बाजार में फैला रखे है
सजाये है ढेर सारे  विषय
उन्हीं पर हमारे जैसा या फिर पूर्वजों जैसा लिखों
लिखों जो मानदंड स्वीकृत है उस तरह से .

हम नाम देखेंगे
उस पर लिखेंगे
पढ़ने को वक्त नहीं है
हम तो नाम से ही समझ जाते है
बहुत हुआ तो एक लाइन ही काफी है
हांड़ी में चावल का एक दाना ..
विरासत है समझने की .

समझ गये ना ?
21 june 2012

Saturday, June 21, 2014

अरविंद सुरवाड़े,सत्यापन पर मराठी में

सखोल अंतर्दृष्टीचा कथाकार
'हंस' आणि 'कथादेश' ह्या हिंदीतील अग्रणी साहित्यिक पत्रिका आहेत. उत्तमोत्तम कथांसाठी त्या प्रसिद्ध आहेत. 'कथादेश' डिसेंबर २०१० च्या अंकातील कैलाश वानखेडे यांची 'कितने बुश कितने मनु' ही कथा वाचली आणि मी पुरता झपाटलो गेलो. असं काय होतं त्या कथेत झपाटून टाकण्यासारखं? बी.डी.ओ.ऑफिस मध्ये अनुकंपा तत्वावर चतुर्थश्रेणी कर्मचारी असलेल्या कमल ह्या दलित तरुणाच्या संघर्षमय जीवनाची ही कथा आहे .अतिशय प्रमाणिकपणे मेहनत करून तो आपली नोकरी इमाने-इतबारे करतो आहे.चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी असला तरी तो मूलतः हुशार आणि बुद्धिमान असल्याने आपल्या संगणकीय ज्ञानाचा वापर करून बी.डी.ओ.च्या कार्यालयाद्वारा राबवल्या जाणा-या सर्व सरकारी योजनांच्या जुन्या आकडेवारीच संकलन करून तिचं प्रोग्रामिंग करतो. परंतु जिल्हा नियोजन समितीच्या बैठकीत बी.डी.ओ.हे सगळं काम आपण स्वतः केल्याचं दाखवून मंत्री आणि उच्च पदस्थांची वाहवा मिळवतो.ज्याला श्रेय मिळायला हवे होते त्याला ते मिळत नाही. उलट माझं श्रेय का हिरावून घेतलं ह्याचा जाब विचारला म्हणून बडतर्फीला सामोरं जावं लागतं. अशा कथा तर मराठी आणि इतर भारतीय भाषांमध्ये खूपशा आहेत,मग ह्या कथेचं वेगळंपण ते काय? तर जागतिकीकरणाच्या पार्श्वभूमीवर अमेरिकेच्या मानसिकतेशी भारतीय मनुग्रस्त मानसिकतेचा सांधा जोडणं!
अमेरिका धार्जिणे जागतिकीकरण आणि दलित,आदिवासी, बौद्धांचे प्रश्न घेवून कथा विषयाची मांडणी करण्याचा प्रयत्न आंबेडकरवादी कथेत अजूनपर्यंत तरी कुणीही केलेला नाही.अंतर्गत सरंजामशाही आणि जातीयावादाला आपला कथा विषय बनवणा-या कुठल्याही भारतीय लेखकाचं ह्या अमेरिकन धार्जिण्या नवसरंजामदारी आणि नववसाहतवादी प्रवृत्तीकडे अजूनही लक्ष गेलेलं नाही.मात्र कैलाश वानखेडे यांनी आपल्या ह्या कथेच्या माध्यमातून अमेरिकन मानसिकता आणि भारतीय मनुग्रस्त मानसिकता ह्या एकाच नाण्याच्या दोन बाजू असल्याचं प्रतिपादन केलेलं आहे. खरंतर एक 'व्यवस्था' म्हणून ह्या जागतिकीकरणाकडे आंबेडकरवादी साहित्यिकांनी विशेषतः कथाकारांनी केलेलं दुर्लक्ष चिंतेचा विषय होता,ती चिंता कैलाश वानखेडे सारख्या कथालेखकांनी काहीशी दूर केलेली आहे.
अमेरिका ज्याप्रमाणे इतर अविकसित आणि विकसनशील देशांना वेळोवेळी त्यांची 'औकात' दाखवण्याचा प्रयत्न करते त्याच प्रमाणे दलित,बौद्ध समाज जेंव्हा केंव्हा ताठ मानेनं, स्वाभिमानानं जगण्याचा प्रयत्न करतो तेंव्हा तेंव्हा त्याला इथले मनुचे वारसदार 'धडा' शिकवण्याचा प्रयत्न करत असतात. जातीयवाद्यांनी खैरलांजीत केलेले अत्याचार आणि अमेरिकेने इराक मध्ये केलेले अत्याचार यामागचा हेतू एकच आहे आणि तो म्हणजे 'त्यांना धडा शिकवणं'! कथा नायकाला त्याच्या कार्यालयातील सहका-याकडून आणि बी.डी.ओ. कडून जे टोमणे ऐकावे लागतात, जी अपमानस्पद भाषा ऐकावी लागते ती भाषा आणि अमेरिकेची शस्त्रास्रांची भाषा ही एकच म्हणजे 'धडा शिकवण्याची' भाषा होय. स्थानिक आणि आंतरराष्ट्रीय प्रश्नांची अशी वैशिष्ट्यपूर्ण मांडणी ह्या कथेत करण्यात आलेली आहे.
सरकारी कार्यालयातील 'प्रशासकीय जातीयवाद' अनावृत्त करणारी ही कथा दलित आंबेडकरी समूहाच्या अनेक समकालीन ज्वलंत प्रश्नांचा उहापोह करते. एक दलित चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी कमल पासून ते खैरलांजीच्या प्रियंका पर्यंत दमन आणि शोषणाची जी शृंखला दृष्टीस पडते ती दलित उत्थानाच्या गावगप्पा मारणारांना तोंडघशी पाडते. मनु आणि बुश ह्यासारख्या राष्ट्रीय आणि आंतरराष्ट्रीय प्रतिमा वापरून कैलाश वानखेडे यांनी आंबेडकरवादी जाणिवांचा चपखल विस्तार केलेला आहे.अश्या विषयावरची ही भारतीय भाषांतील कदाचित पहिलीच कथा असेल असा महत्वपूर्ण अभिप्राय प्रसिद्ध हिंदी समीक्षक बजरंग बिहारी तिवारी ह्यांनी प्रस्तुत कथेबद्दल नोंदवलेला आहे त्यावरून कथा विषयाची निवड आणि सादरीकरण याचं महत्व अधोरेखित होतं.
कथादेश मासिकाच्या २००७ च्या अखिल भारतीय कथास्पर्धेत त्यांच्या 'अंतर्देशीय पत्र' ह्या कथेला तृतीय क्रमांकाच पारितोषिक मिळालेले असून ती कथादेश जानेवारी २००८ च्या अंकात प्रसिद्ध झालेली आहे. ही त्यांची पहिलीच कथा! पण नवखेपणाची कुठलीही छाया नसलेली. उण्यापु-या चार वर्षात 'कितने बुश कितने मनु', 'सत्यापित', 'घंटी', 'उसका आना', 'तुम्हारे लोग' आणि 'महू' अशा मोजक्याच कथा लिहिणारे कैलाश वानखेडे हे आंबेडकरवादी हिंदी कथा लेखक म्हणून अल्पावधीतच समीक्षकांच्या चर्चेचा विषय झालेले आहेत.
चांगल्या कथा लेखकाकडे गोष्टीवेल्हाळपणा बरोबरच ज्ञान आणि कल्पनाशक्ती ह्या दोन्ही गोष्टी असणेही अत्यंत आवश्यक आहे. कैलाश वानखेडे आपल्या कथांमध्ये ह्या सगळ्या गोष्टींचा बेमालूमपणे उपयोग करून घेतात. त्यांच्या ह्या सगळ्या कथांची कथानकं ही बहुप्रवाही आहेत. त्यातून त्यांनी सीमांत माणसांच्या जगण्यातील गुंतागुंत,अडसर आणि धडपड चित्रित केलेली आहे. कथेतील पात्र,प्रसंग आणि स्थळांचं अत्यंत तपशीलवार वर्णन ते करतात. मात्र हे वर्णन कुठेही रटाळ होवू न देण्याची खबरदारीही ते आवर्जून घेतात. अगोदर म्हटल्याप्रमाणे गोष्टीवेल्हाळपणा बरोबरच ज्ञान आणि कल्पनाशक्तीचा मेळ घालण्याच्या त्यांच्या कसबामुळे त्यांची कथा ही वाचकाच्या विचारविश्वाला सतत आव्हान देत राहते. आपल्या कथेतला संपूर्ण अवकाश ते चिंतनाने आणि विचारशीलतेने व्यापून राहतात. त्यामुळे 'कितने बुश कितने मनु' मध्ये येणा-या आंतरराष्ट्रीय संदर्भाबरोबरच खैरलांजी हत्याकांडा सारखे देशी संदर्भ किंवा 'महू' सारख्या कथेत येणारा 'तहरीर चौकाचा' संदर्भ वाचकाला माहित असावा लागतो.
कैलाश वानखेडे यांची 'कितने बुश कितने मनु' असो की 'सत्यापित'; 'घंटी' असो की 'तुम्हारे लोग'; 'उसका आना' असो की 'महू' ह्या सगळ्याच कथांमधून मनुने ज्यांना केवळ आणि केवळ "ताडन के अधिकारी" म्हटलेलं आहे त्या दलित शोषित आणि स्त्रीयांसारख्या सीमांत माणसांच्या अंतर्व्यथेची गंभीर आणि वेदनामय अभिव्यक्ती चित्रित केलेली आहे.आपल्या कथांमधून सामान्य माणसांच्या व्यथा-वेदना मांडणे हे एकूणच आंबेडकरवादी कथाकारांची भूमिका असली तरी कैलाश वानखेडे यांच्या कथांमधून येणा-या व्यथा-वेदना ह्या कुठल्याही अभिनिवेषाशिवाय येतात.'कितने बुश कितने मनु', 'सत्यापित' 'तुम्हारे लोग', 'घंटी',इत्यादी कथांच्या माध्यमातून आजच्या दमनकारी शासन व्यवस्थेतील माहोल आणि त्यात आपले हरवलेले वास्तव अस्तित्व शोधणारा 'आम आदमी' ते वाचकाला अवगत करून देतात.

मुळचे महाराष्ट्रीयन असलेले कैलाश वानखेडे हे मध्य प्रदेश प्रशासनाच्या महसूल विभागात उप विभागीय अधिकारी आहेत. त्यामुळे शासकीय यंत्रणेतील जातीयवाद, गरिबांसाठी असलेल्या विकासाच्या योजना राबवताना प्रशासकीय यंत्रणेची मानसिकता, इ. बद्दलच्या त्यांच्या सूक्ष्म निरीक्षणाचा प्रत्यय त्यांच्या कथांमधून येतो. 'कितने बुश कितने मनु','सत्यापित' 'घंटी' ह्या प्रशासकीय जातीयवादाचे चित्रण करणा-या कथा आहेत. सहस्राकोत्तर कालखंडात जागतिकीकरणानंतर निर्माण झालेल्या नवीन शोषण व्यवस्थेचे समग्र आकलन आणि परिदृश्य त्यांच्या कथांमधून चित्रित झालेलं दिसतं.
'उसका आना' ह्या कथेत वाचकाला तीन स्री पात्रं भेटतात.कचरा वेचणारी घुंघटधारी नवविवाहित दलित स्त्री, कॉलेज मध्ये येवून शिकण्याचं धाडस करणारी बांछडा जमातीची युवती,आणि गर्भश्रीमंत वर्गातील कवयत्री.ह्या तिन्ही स्त्रिया कथेत सक्रीय नाहीत. केवळ त्यांचे उल्लेख मात्र येतात. कविता लिहिल्यामुळे वाचकाला कवयत्रीच उषाकिरण हे नाव तरी अवगत होतं, इतर दोन स्त्री पात्रं तर नाम-रूप विहीन अशीच आहेत. वृत्तपत्रात छापुन आलेली उषा किरण ह्या कवयत्रीची एक कविता कथेतील नायक प्रकाश ह्याच्या वाचनात येते. ती कविता त्याला 'अपना ही बयान' वाटते. केवळ आठ ओळींची ही कविता प्रकाशला आपली वाटते, शक्ती प्रदान करते. त्याच्या जगण्याचा हौसला वाढवते. प्रकाश हा आंबेडकरी विचाराचा युवक ह्या तिन्ही स्त्रियांबद्दल अत्यंत संवेदनशील आहे. ह्या तिघींच दुःख, वेदना ह्या आपलेही दुःख, वेदना आहेत असेच त्याला वाटते. प्रकाश हे पात्रं असं 'जेन्डर सेन्सिटिव्ह' म्हणून उभं करण्यातच लेखाकामध्ये खरी बुद्ध आणि आंबेडकरी जाणीव आणि प्रेरणा दडलेली आहे. जातीव्यवस्थे इतकंच पुरुषीव्यवस्थेकडेही गांभीर्यानं पाहणायचा दृष्टीकोन ही कथा अधोरेखित करते.
कैलाश वानखेडे यांची अनुभूती, निरीक्षण शक्ती, विषयाची समज,विषय मांडण्याची हातोटी, तपशील देण्याची आणि तपशिलाचं विश्लेषण करण्याची पद्धती अतिशय अनोखी आहे. त्यांच्या कथेतील भाषा मध्यप्रदेशच्या निमाड प्रांतातील आणि महाराष्ट्राच्या व-हाडी आणि खानदेशी बोलींच्या मिश्रणातून तयार झालेली असल्यामुळे अत्यंत वैविध्यपूर्ण, रसाळ, मधाळ,जिवंत वाटते. भाषेवर आणि तिच्या लकबीवर लेखकाची स्पष्ट हुकुमत जाणवते.सर्वच भारतीय भाषेतील आंबेडकरवादी कथेला भूषण ठरावी अशी अशेष सर्जनात्मक भाषा शैली ते कथेसाठी वापरतात. त्यांची कथा वाचताना गद्य-काव्य वाचत असल्याचा प्रत्यय येतो. काव्यमय शैलीत कथेची रचना करण्याचा त्यांचा हातखंडा अवर्णनीय आहे.प्रत्येक कथेची शैली, मांडणी वेग वेगळी आहे.अनुकरण कुणाचे का असेना स्वतःचे जरी असले तरी,अनुकरण हे अनुकरणच असते.कैलाश वानखेडे यांच्या कथेत त्यांनी इतरांचंच काय पण त्यांच्या स्वतःच्या शैलीचंही अनुकरण टाळलेलं आहे. त्यांच्या ह्या सर्व कथा एकत्र जरी वाचल्या तरी त्या एकाच कथा लेखकाच्या आहेत असं वाटत नाही.
'विस्डम' ही आंबेडकरवादी साहित्याची पूर्वअट आहे. विस्डमचा शब्दाकोषीय अर्थ अनुभवयुक्त ज्ञान, विवेक, बुद्धिमत्ता, दूरदर्शित्व असं आहे. बुद्ध तत्वज्ञानानुसार करुणा भाव आणि प्रज्ञाजाणीव ह्या दोन्ही भावजाणिवा ज्या अनुभूतीत एकवटल्या आहेत त्या भाव- जाणीवेला 'विस्डम' म्हटले जाते. मराठीतील आंबेडकरवादी कथाकार योगीराज वाघमारे, गौतमीपुत्र कांबळे आणि दीपध्वज कोसोदे यांच्या प्रमाणे कैलाश वानखेड यांच्या कथा वाचताना ह्या 'विस्डम'चा प्रत्यय येतो.
'कितने बुश कितने मनु' ही कथा वाचण्यात आल्यामुळे आणि तिच्या मराठी अनुवादानिमित्ताने परिचित झालेला हा कथा लेखक त्याच्या कथांमधून जेवढा संवेदनशील आहे, प्रत्यक्षातही तो तेवढाच संवेदनशील आहे. 'कितने बुश कितने मनु' आणि 'सत्यापित' ह्या दोन कथांचा मी मराठी अनुवाद केलेला आहे.

B B C में सत्यापन

http://www.bbc.co.uk/hindi/indepth/2013/12/131230_editors_booklist_2013_rns.shtml




सत्यापन: कैलाश वानखेड़े (आधार प्रकाशन)
ये किताब एक बड़ी संभावना की और इशारा करती है- हिंदी अस्मितामूलक लेखन के एक नए दौर में प्रवेश करने की संभावना. शीर्षक कहानी एक मार्मिक रूपक ही नहीं निर्मित करती बल्कि इस बात की खोज करती है कि कैसे एक ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रिया मानवीय अस्तित्व को परिभाषित करने वाली दार्शनिक केटेगरी में बदल जाती है.----गिरिराज किराडू 

बजरंगबिहारी तिवारी,जनसंदेश टाइम्स और संवेद में

http://www.jansandeshtimes.com/Default.aspx?goto=hom


जनसंदेश टाइम्स, २६ जनवरी २०१४ ,पेज 18

समर पाण्डेय,दैनिक जागरण में

http://epaper.jagran.com/epaperimages/16032014/delhi/15ned-pg9-0.pdf
http://www.mofussilmusings.com/2014/03/blog-post_16.html



''सत्यापन'' की समीक्षा दैनिक जागरण में अविनाश पांडे समर की कलम से.
पेज 9 दिनांक 16 मार्च 2014 

झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड

                     जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को   भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...