Tuesday, February 11, 2014

कितनी दूर हो कि गुफा में हो

       गढ़े नहीं होंगे 
अक्षर 
शब्द के अर्थ बनाये नहीं होंगे 
जबान अभ्यस्त नहीं हुई होगी बोलने के लिए 
सुनते वक्त जो सुना उसे दिल वैसा माने यह रिवाज नहीं होगा 

पर थी आँखे आँखों के पास

आँखों के भीतर देख मिलने 
गुफा में बनाता पत्थरों पर सपने 
ब्रश बनकर जो रौशनी फैलाते होंगेवही पत्ती जो एक डंडी पर खिल रही है आज भी 



भैसा ,हाथी,कछुआ
मछली और बनाकर उस लुप्त हो चुके जानवर को ,
उसकी सवारी कर कहाँ जाने का खयाल आता होगा
पैतीस हजार साल पहले उस प्रेमिका को ..

हाथ में लेकर हाथ कर समूह नृत्य
किस सुर लय साज और बिन गीत
उमंगती हुई तड़फ के साथ कदमताल करता होगा
जानता था वह और उस गुफा के बाशिंदे
अपराध नहीं है प्रेम


दूर कही प्रेमिका बनाती तीर बनकर हिरणी
अपने आपको अपने प्रेम की तरह अमिट रंग से
भेजती होगी फूल अनकहे ,मनचाहे
बनाती होगी मु
तब दिल का आकार तय नहीं हुआ होगा तो
किसे बनाती होगी दिल हरे पान के पत्ते की बजाय

गहरा लाल रंग जब पत्थर पर चित्र में तब्दिल हो जाता होगा
तब क्या तुम्हारे लिए शुद्ध रक्त का लेशमात्र भी खयाल आता होगा ?

कत्थई रंग जमाने की तमाम धूल के बाद भी बना हुआ है अपने मूल में
तुम अब भी वैसे ही हो प्रेमी गहरे लाल रंग से भरे हुए अमिट
तभी तो रची जाती है प्रेम कविता
प्रेम कहानी

तू यह बता

कविता रच रहे थे कि लिख रहे थे कहानी
सूरज को विदा करने के बाद लिखते होंगे डायरी
जिसे कहते है अब शैल चित्र ...



आँख मारना तब आया होगा ?
धडकती होगी ?उसके खयाल मात्र से


आज तुम्हारी धड़कन तुम्हें बेजुबान कर देती है
जबकि तय कर दिया गया है शब्द के मायने और उसके अर्थ
तब भी नहीं है तुम्हारे पास शब्द

कैसे कहे क्या कहे ?में उलझ गए हो
कि

अजन्ता में बोधिसत्व अपने हाथ में फूल लेकर खड़े है

---कैलाश वानखेड़े .
11 फरवरी 2014
====================google से चित्र -साभार .

Sunday, February 2, 2014

नामदेव ढसाल की कविता

नामदेव ढसाल की कविता का अनुवाद 


रोशनी और अँधेरे के दरम्यान 
प्रेम और दुःख के बीच 
वेदना के बाद की जगह दे दी कविता को 
मैने ऐसा साक्षात 
खुद को ही बो दिया खेत में 
और मेड़ पर खड़े होकर 
इंतजार करता रहा 
खुद के उगने का 
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मूल कवितांश ....

प्रकाश आणि काळोखाच्या दरम्यान

प्रेम आणि दुःखाच्या दरम्यान

मी वेदनेनंतरची जागा कवितेला दिली

मी असे साक्षात

स्वतःला पेरून टाकले जमिनीत

आणि बांधावर उभे राहून

वाट बघत राहिलो

स्वतःच्या उगवण्याची

Wednesday, January 29, 2014

बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर

गलती मेरी ही है 
माथा मेरा ही खराब है सुबे से 
जिसे उल्टा कहा जाता है उसका उत्तर 
मै तो बस सीधे सीधे बुलंद के बाद शहर ही लिखना चाह रहा था 
बायमिस्टेक शहर की बजाय भारत लिख गया 
विज्ञापन का कहे या बजाज का असर 
जैसा बनाया जाता है वैसे ही निकलता है 
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ...प्रतिभा प्रतिभा मेरिट मेरिट 
चिल्लाते चिल्लाते खेत में लड़की के कपड़े फाड़े गए 
जबकि झंडा है मेरे देश का 
बोला ही गया और बोलनेवाले की जान लेने के लिए ही चली थी गोली
उसमें बारूद नहीं ग्रन्थ थे
आप देख पाए न देख पाए
आपकी मानसिकता और चश्मा जो भी देखे कहे
आपको तो मालूम ही नहीं
खेत सिर्फ बुलंदशहर में नहीं है
लड़की सिर्फ एक नहीं है करोड़ों में
चुप है कि लगता है आपको कि
व्यवस्था में चौथा वर्ण नहीं है
तभी तो बनाए रखने के लिए लोकतंत्र
वह चौथा खम्बा भी लापता हो गया खुद ही
बदन से कपडे तन से जान चली गई लेकिन
अभी भी है साबुत जबान और है गरिमा से जीने की चाह
जबकि नहीं गया बुलंदशहर
बुलंदशहर मेरे भीतर आकर चिल्ला रहा है
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर
और लिख देता हु बुलंद शहर की बुलंद तस्वीर ....

Monday, December 30, 2013

मनोज पाण्डेय ,नया पथ में

धर्मेद्र सुशांत,दैनिक हिंदुस्तान में

धर्मेद्र सुशांत ने दैनिक हिंदुस्तान में 3 नवम्बर 2013 में लिखा है .......

ठोस सामाजिक संदर्भ

युवा कथाकार कैलाश वानखेड़े की कहानियां विशेष रूप से हमारे समाज की रगों में गहरे पैठी जातिवादी सोच और उसके हिंसक कारोबार का उद्घाटन करती हैं। इस तरह ये ठोस सामाजिक सच्चई को सामने लाती हैं और उसकी विद्रूपता पर सवाल उठाती हैं। इन कहानियों में अनुभव का बल तो है ही, विवेचना के विवेक की रोशनी भी है। शायद यही वजह है कि ये कहानियां शोषण करने या वर्चस्व जमाने वाली शक्तियों के प्रतिकार के लिए कोई बनावटी उपाय नहीं सुझतीं। इसकी बजाय ये उस सामाजिक ताने-बाने का रग-रेशा खोलकर पाठक के सामने रखती हैं, जिनके दम पर यह भेदभाव संभव होता है। वास्तव में वानखेड़े आग में तपते लोहे की लालिमा दिखाने से अधिक उसके आंतरिक ताप को महसूस कराना चाहते हैं। समकालीन हिंदी दलित लेखन की सशक्त बानगी इन कहानियों में दिखती है। सत्यापन, कैलाश वानखेड़े, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा),

Sunday, October 27, 2013

भाकर के भीतर की आग

तवे से बहुत छोटी सी दिखती है आग ...
लहराती हुई लगाकर पूरी ताकत ,पकाती है भाकर को
मोड़कर भी दो हिस्से नहीं होती
उसकी परत टूट नहीं पाती
जिसे कटोरी के पानी से बारबार चिकना बनाया जाता था
कि न चिपके हाथ में
न चिपक बच्चे गोद में
कि पकना ही है ज्वार की भाकर की तरह
जिसमें रहती है आग तवे से बिछड़ने के बाद भी
आग बनी रहे अपने भीतर ,माँ यही चाहती थी .




(संजीव तिवारी की वाल से साभार फोटो.इसे देखकर लिखा है ,कुछ तो भी )

झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड

                     जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को   भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...