..................................................................................... कैलाश वानखेड़े
Monday, December 30, 2013
धर्मेद्र सुशांत,दैनिक हिंदुस्तान में
धर्मेद्र सुशांत ने दैनिक हिंदुस्तान में 3 नवम्बर 2013 में लिखा है .......
ठोस सामाजिक संदर्भ
युवा कथाकार कैलाश वानखेड़े की कहानियां विशेष रूप से हमारे समाज की रगों में गहरे पैठी जातिवादी सोच और उसके हिंसक कारोबार का उद्घाटन करती हैं। इस तरह ये ठोस सामाजिक सच्चई को सामने लाती हैं और उसकी विद्रूपता पर सवाल उठाती हैं। इन कहानियों में अनुभव का बल तो है ही, विवेचना के विवेक की रोशनी भी है। शायद यही वजह है कि ये कहानियां शोषण करने या वर्चस्व जमाने वाली शक्तियों के प्रतिकार के लिए कोई बनावटी उपाय नहीं सुझतीं। इसकी बजाय ये उस सामाजिक ताने-बाने का रग-रेशा खोलकर पाठक के सामने रखती हैं, जिनके दम पर यह भेदभाव संभव होता है। वास्तव में वानखेड़े आग में तपते लोहे की लालिमा दिखाने से अधिक उसके आंतरिक ताप को महसूस कराना चाहते हैं। समकालीन हिंदी दलित लेखन की सशक्त बानगी इन कहानियों में दिखती है। सत्यापन, कैलाश वानखेड़े, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा),
ठोस सामाजिक संदर्भ
युवा कथाकार कैलाश वानखेड़े की कहानियां विशेष रूप से हमारे समाज की रगों में गहरे पैठी जातिवादी सोच और उसके हिंसक कारोबार का उद्घाटन करती हैं। इस तरह ये ठोस सामाजिक सच्चई को सामने लाती हैं और उसकी विद्रूपता पर सवाल उठाती हैं। इन कहानियों में अनुभव का बल तो है ही, विवेचना के विवेक की रोशनी भी है। शायद यही वजह है कि ये कहानियां शोषण करने या वर्चस्व जमाने वाली शक्तियों के प्रतिकार के लिए कोई बनावटी उपाय नहीं सुझतीं। इसकी बजाय ये उस सामाजिक ताने-बाने का रग-रेशा खोलकर पाठक के सामने रखती हैं, जिनके दम पर यह भेदभाव संभव होता है। वास्तव में वानखेड़े आग में तपते लोहे की लालिमा दिखाने से अधिक उसके आंतरिक ताप को महसूस कराना चाहते हैं। समकालीन हिंदी दलित लेखन की सशक्त बानगी इन कहानियों में दिखती है। सत्यापन, कैलाश वानखेड़े, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा),
Sunday, October 27, 2013
भाकर के भीतर की आग
तवे से बहुत छोटी सी दिखती है आग ...
लहराती हुई लगाकर पूरी ताकत ,पकाती है भाकर को
मोड़कर भी दो हिस्से नहीं होती
उसकी परत टूट नहीं पाती
जिसे कटोरी के पानी से बारबार चिकना बनाया जाता था
कि न चिपके हाथ में
न चिपक बच्चे गोद में
कि पकना ही है ज्वार की भाकर की तरह
जिसमें रहती है आग तवे से बिछड़ने के बाद भी
आग बनी रहे अपने भीतर ,माँ यही चाहती थी .
(संजीव तिवारी की वाल से साभार फोटो.इसे देखकर लिखा है ,कुछ तो भी )
लहराती हुई लगाकर पूरी ताकत ,पकाती है भाकर को
मोड़कर भी दो हिस्से नहीं होती
उसकी परत टूट नहीं पाती
जिसे कटोरी के पानी से बारबार चिकना बनाया जाता था
कि न चिपके हाथ में
न चिपक बच्चे गोद में
कि पकना ही है ज्वार की भाकर की तरह
जिसमें रहती है आग तवे से बिछड़ने के बाद भी
आग बनी रहे अपने भीतर ,माँ यही चाहती थी .
(संजीव तिवारी की वाल से साभार फोटो.इसे देखकर लिखा है ,कुछ तो भी )
Monday, October 14, 2013
एक गुमशुदा लफ्ज
उस नगर में वफ़ा एक गुमशुदा लफ्ज है
मिलना ,शब्दकोष से सजायाफ्ता होकर बेदखल हो चुका है
वक्त ,नहीं है लेकिन वक्त के नाम से दहशतजदा है वह
दिमाग के भीतर से हूक लगातार उठती है
बेसबब
बेवजह
कहकर उसे डस्टबिन के कीटाणुओं के हवाले किया जाता है .
सड जाए
गल जाए
हो जाए गायब
ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं होती
लेकिन उसीके लिए चली जाती है याद .
याद
याद ''का जो अर्थ बताया नहीं गया
न समझाया गया
और तो और कभी भी शब्दकोष में उसकी तलाश नहीं की गई
वही हरदम आगे आगे रहता है
..
वक्त बदला नहीं है
कैलेण्डर ,दिल बहलाने के लिए फडफडाता है
पिंजरे में बंद लव बर्ड्स की तरह
उसे कितना भी उडाओ नही उडती
उड़ने की कोशिश में मारी जाती है
,जिस तरह समय को ..
अभी कल ही बात है
गिने गए अठावन
जो मारे गए थे अँधेरी रात में अपने घरों से निकालकर
उनकी लाश थी
जलाया गया था
समाचार के साथ फोटो भी थे
लेकिन हत्यारा कोई नहीं
यह तो शुक्र है कि लाशों की लक्षमनपुर बाथे में गिनती हो गई
खैरलांजी में कितने मरे ?
तुम्हें नहीं पता
खैर जैसे तुम तय नहीं कर पाती हो
वैसे ही समझ नहीं पाता हूँ कि
कितना बदल गया वक्त
कितना हुआ विकास
वर्णव्यवस्था से समझ नहीं पाते अब भेद को
जैसे समझना मुश्किल होता है कि
आखिर प्यार क्या होता है
जिस वक्त तुम प्यार को परिभाषित कर लोगी
उसी दिन वर्ण व्यवस्था के मायने
समझ में आ जायेंगे
जैसे मिट्टी का रंग
हवा में घुली खुशबू
तलवे में कंकड़ की चुभन
तवे पर गर्म रोटी के पकने का अहसास
पेट के साथ मन भरने की बात ....
मिलना ,शब्दकोष से सजायाफ्ता होकर बेदखल हो चुका है
वक्त ,नहीं है लेकिन वक्त के नाम से दहशतजदा है वह
दिमाग के भीतर से हूक लगातार उठती है
बेसबब
बेवजह
कहकर उसे डस्टबिन के कीटाणुओं के हवाले किया जाता है .
सड जाए
गल जाए
हो जाए गायब
ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं होती
लेकिन उसीके लिए चली जाती है याद .
याद
याद ''का जो अर्थ बताया नहीं गया
न समझाया गया
और तो और कभी भी शब्दकोष में उसकी तलाश नहीं की गई
वही हरदम आगे आगे रहता है
..
वक्त बदला नहीं है
कैलेण्डर ,दिल बहलाने के लिए फडफडाता है
पिंजरे में बंद लव बर्ड्स की तरह
उसे कितना भी उडाओ नही उडती
उड़ने की कोशिश में मारी जाती है
,जिस तरह समय को ..
अभी कल ही बात है
गिने गए अठावन
जो मारे गए थे अँधेरी रात में अपने घरों से निकालकर
उनकी लाश थी
जलाया गया था
समाचार के साथ फोटो भी थे
लेकिन हत्यारा कोई नहीं
यह तो शुक्र है कि लाशों की लक्षमनपुर बाथे में गिनती हो गई
खैरलांजी में कितने मरे ?
तुम्हें नहीं पता
खैर जैसे तुम तय नहीं कर पाती हो
वैसे ही समझ नहीं पाता हूँ कि
कितना बदल गया वक्त
कितना हुआ विकास
वर्णव्यवस्था से समझ नहीं पाते अब भेद को
जैसे समझना मुश्किल होता है कि
आखिर प्यार क्या होता है
जिस वक्त तुम प्यार को परिभाषित कर लोगी
उसी दिन वर्ण व्यवस्था के मायने
समझ में आ जायेंगे
जैसे मिट्टी का रंग
हवा में घुली खुशबू
तलवे में कंकड़ की चुभन
तवे पर गर्म रोटी के पकने का अहसास
पेट के साथ मन भरने की बात ....
Friday, September 20, 2013
शब्द प्रभुनों ---कवि वामन निम्बाळकर
शब्द प्रभुनों .
शब्दों से जलते है घर ,दार ,देश और इंसान भी /
शब्द बुझाते है शब्दों से जले हुए इंसानों को /
शब्द न होते तो आँखों से गिरे न होते आग के गोले /
न बहता आंसुओं का महापुर /
आता न कोई करीब /
जाता न दूर ,,
शब्द न होते तो ...
---कवि वामन निम्बाळकर
--अनुवाद -कैलाश वानखेड़े
======================
================
========
''शब्द ''
'शब्दांनीच पेटतात घरे, दारे, देश /
आणि माणसेसुद्धा /
शब्द विझवतात आगही /
शब्दांनी पेटलेल्या माणसांची .शब्द नसते तर पडल्या नसत्या/
डोळ्यांतून आगीच्या ठिणग्या/
वाहिले नसते आसवांचे महापूर /आले नसते जवळ कुणी, /
गेले नसते दूर /
शब्द नसते तर''
- कवी वामन निंबाळकर
शब्दों से जलते है घर ,दार ,देश और इंसान भी /
शब्द बुझाते है शब्दों से जले हुए इंसानों को /
शब्द न होते तो आँखों से गिरे न होते आग के गोले /
न बहता आंसुओं का महापुर /
आता न कोई करीब /
जाता न दूर ,,
शब्द न होते तो ...
---कवि वामन निम्बाळकर
--अनुवाद -कैलाश वानखेड़े
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''शब्द ''
'शब्दांनीच पेटतात घरे, दारे, देश /
आणि माणसेसुद्धा /
शब्द विझवतात आगही /
शब्दांनी पेटलेल्या माणसांची .शब्द नसते तर पडल्या नसत्या/
डोळ्यांतून आगीच्या ठिणग्या/
वाहिले नसते आसवांचे महापूर /आले नसते जवळ कुणी, /
गेले नसते दूर /
शब्द नसते तर''
- कवी वामन निंबाळकर
Tuesday, March 12, 2013
सत्यापित
कहानी ''सत्यापित ''को सुना जा सकता है ,रेडियों की दुनिया के सरताज ,युनूस खान की आवाज में .यहाँ क्लिक कीजिये .....http://katha-paath.blogspot.in/2014/02/blog-post_9.html
-कैलाश वानखेड़े
-कैलाश वानखेड़े
अभी इंतजार में हूँ कि मेरी बारी आये और मैं अपने आपको सत्यापित करवाऊ .मुझे सत्यापित करवाना है अपना फोटो. कोई भी मेरे चेहरे को पढ़कर
अंदाज लगा सकता है कि मैं अभी परेशानी में हूँ, अब और इंतजार नहीं कर सकता. मेरे पास धैर्य था, मेरे पास समय था, मेरे पास सपने थे, मेरे पास मैं था, अब मेरे पास आवेदन पत्र पर वह फोटो है जिसे दुःख-सुख का अनुभव नहीं होता. फोटो पर पड़ने वाली सील और होने वाले हस्ताक्षर से प्रमाणित होने वाला था मेरा वजूद. सत्यापन करने वाली सील अक्सर चेहरा बिगाड़ देती है और
रही-सही कसर लम्बे चौड़े हस्ताक्षर पूरे कर देते. चेहरा पहचानना मुश्किल हो
जाता है.उसी को प्रमाणित मानते है.टहलना नहीं चाहता हूँ .थक गया हूँ बुरी तरह. भूख-प्यास मेरे दिमाग से रुखसत
हो चुकी और अब गुस्सा सवार हो रहा. गर्म लोहा, जब तक आग पर रहता लाल दिखता, आग के हटते ही काला दिखने लगता जिसने लोहे को तपते हुए नहीं देखा वह नहीं जान सकता कि अपने मूल रंग में लौटता लोहा कितना गर्म होता होगा. अपनी उम्मीद को उसी में तपाये हुए इंतजार में हूं .
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झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड
जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...
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कहानी ''सत्यापित ''को सुना जा सकता है ,रेडियों की दुनिया के सरताज ,युनूस खान की आवाज में .यहाँ क्लिक कीजिये ..... http:...
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मेरे माथे पर नहीं लिखा है लेकिन मेरा चेहरा बोलता है बोलते है घुसर फुसुर करते हुए सैकड़ों मुहँ धारी पढ़ लेते है कागजात पता लगा लेते है ...
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शब्द प्रभुनों . शब्दों से जलते है घर ,दार ,देश और इंसान भी / शब्द बुझाते है शब्दों से जले हुए इंसानों को / शब्द न होते तो आँखों से ग...
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