http://srujankranti.blogspot.in/2014/05/blog-post_25.html
..................................................................................... कैलाश वानखेड़े
Saturday, June 21, 2014
Tuesday, February 11, 2014
कितनी दूर हो कि गुफा में हो
गढ़े नहीं होंगे
अक्षर
शब्द के अर्थ बनाये नहीं होंगे
जबान अभ्यस्त नहीं हुई होगी बोलने के लिए
सुनते वक्त जो सुना उसे दिल वैसा माने यह रिवाज नहीं होगा
पर थी आँखे आँखों के पास
आँखों के भीतर देख मिलने
गुफा में बनाता पत्थरों पर सपने
ब्रश बनकर जो रौशनी फैलाते होंगेवही पत्ती जो एक डंडी पर खिल रही है आज भी भैसा ,हाथी,कछुआ
मछली और बनाकर उस लुप्त हो चुके जानवर को ,
उसकी सवारी कर कहाँ जाने का खयाल आता होगा
पैतीस हजार साल पहले उस प्रेमिका को ..
हाथ में लेकर हाथ कर समूह नृत्य
किस सुर लय साज और बिन गीत
उमंगती हुई तड़फ के साथ कदमताल करता होगा
जानता था वह और उस गुफा के बाशिंदे
अपराध नहीं है प्रेम
दूर कही प्रेमिका बनाती तीर बनकर हिरणी
अपने आपको अपने प्रेम की तरह अमिट रंग से
भेजती होगी फूल अनकहे ,मनचाहे
बनाती होगी मु
तब दिल का आकार तय नहीं हुआ होगा तो
किसे बनाती होगी दिल हरे पान के पत्ते की बजाय
गहरा लाल रंग जब पत्थर पर चित्र में तब्दिल हो जाता होगा
तब क्या तुम्हारे लिए शुद्ध रक्त का लेशमात्र भी खयाल आता होगा ?
कत्थई रंग जमाने की तमाम धूल के बाद भी बना हुआ है अपने मूल में
तुम अब भी वैसे ही हो प्रेमी गहरे लाल रंग से भरे हुए अमिट
तभी तो रची जाती है प्रेम कविता
प्रेम कहानी
तू यह बता
कविता रच रहे थे कि लिख रहे थे कहानी
सूरज को विदा करने के बाद लिखते होंगे डायरी
जिसे कहते है अब शैल चित्र ...
आँख मारना तब आया होगा ?
धडकती होगी ?उसके खयाल मात्र से
आज तुम्हारी धड़कन तुम्हें बेजुबान कर देती है
जबकि तय कर दिया गया है शब्द के मायने और उसके अर्थ
तब भी नहीं है तुम्हारे पास शब्द
कैसे कहे क्या कहे ?में उलझ गए हो
कि
अजन्ता में बोधिसत्व अपने हाथ में फूल लेकर खड़े है
---कैलाश वानखेड़े .
11 फरवरी 2014
====================google से चित्र -साभार .
Sunday, February 2, 2014
नामदेव ढसाल की कविता
नामदेव ढसाल की कविता का अनुवाद
रोशनी और अँधेरे के दरम्यान
प्रेम और दुःख के बीच
वेदना के बाद की जगह दे दी कविता को
मैने ऐसा साक्षात
खुद को ही बो दिया खेत में
और मेड़ पर खड़े होकर
इंतजार करता रहा
खुद के उगने का
------------------------
.
मूल कवितांश ....
प्रकाश आणि काळोखाच्या दरम्यान
प्रेम आणि दुःखाच्या दरम्यान
मी वेदनेनंतरची जागा कवितेला दिली
मी असे साक्षात
स्वतःला पेरून टाकले जमिनीत
आणि बांधावर उभे राहून
वाट बघत राहिलो
स्वतःच्या उगवण्याची
रोशनी और अँधेरे के दरम्यान
प्रेम और दुःख के बीच
वेदना के बाद की जगह दे दी कविता को
मैने ऐसा साक्षात
खुद को ही बो दिया खेत में
और मेड़ पर खड़े होकर
इंतजार करता रहा
खुद के उगने का
------------------------
.
मूल कवितांश ....
प्रकाश आणि काळोखाच्या दरम्यान
प्रेम आणि दुःखाच्या दरम्यान
मी वेदनेनंतरची जागा कवितेला दिली
मी असे साक्षात
स्वतःला पेरून टाकले जमिनीत
आणि बांधावर उभे राहून
वाट बघत राहिलो
स्वतःच्या उगवण्याची
Wednesday, January 29, 2014
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर
गलती मेरी ही है
माथा मेरा ही खराब है सुबे से
जिसे उल्टा कहा जाता है उसका उत्तर
मै तो बस सीधे सीधे बुलंद के बाद शहर ही लिखना चाह रहा था
बायमिस्टेक शहर की बजाय भारत लिख गया
विज्ञापन का कहे या बजाज का असर
जैसा बनाया जाता है वैसे ही निकलता है
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ...प्रतिभा प्रतिभा मेरिट मेरिट
चिल्लाते चिल्लाते खेत में लड़की के कपड़े फाड़े गए
जबकि झंडा है मेरे देश का
बोला ही गया और बोलनेवाले की जान लेने के लिए ही चली थी गोली
उसमें बारूद नहीं ग्रन्थ थे
आप देख पाए न देख पाए
आपकी मानसिकता और चश्मा जो भी देखे कहे
आपको तो मालूम ही नहीं
खेत सिर्फ बुलंदशहर में नहीं है
लड़की सिर्फ एक नहीं है करोड़ों में
चुप है कि लगता है आपको कि
व्यवस्था में चौथा वर्ण नहीं है
तभी तो बनाए रखने के लिए लोकतंत्र
वह चौथा खम्बा भी लापता हो गया खुद ही
बदन से कपडे तन से जान चली गई लेकिन
अभी भी है साबुत जबान और है गरिमा से जीने की चाह
जबकि नहीं गया बुलंदशहर
बुलंदशहर मेरे भीतर आकर चिल्ला रहा है
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर
और लिख देता हु बुलंद शहर की बुलंद तस्वीर ....
माथा मेरा ही खराब है सुबे से
जिसे उल्टा कहा जाता है उसका उत्तर
मै तो बस सीधे सीधे बुलंद के बाद शहर ही लिखना चाह रहा था
बायमिस्टेक शहर की बजाय भारत लिख गया
विज्ञापन का कहे या बजाज का असर
जैसा बनाया जाता है वैसे ही निकलता है
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ...प्रतिभा प्रतिभा मेरिट मेरिट
चिल्लाते चिल्लाते खेत में लड़की के कपड़े फाड़े गए
जबकि झंडा है मेरे देश का
बोला ही गया और बोलनेवाले की जान लेने के लिए ही चली थी गोली
उसमें बारूद नहीं ग्रन्थ थे
आप देख पाए न देख पाए
आपकी मानसिकता और चश्मा जो भी देखे कहे
आपको तो मालूम ही नहीं
खेत सिर्फ बुलंदशहर में नहीं है
लड़की सिर्फ एक नहीं है करोड़ों में
चुप है कि लगता है आपको कि
व्यवस्था में चौथा वर्ण नहीं है
तभी तो बनाए रखने के लिए लोकतंत्र
वह चौथा खम्बा भी लापता हो गया खुद ही
बदन से कपडे तन से जान चली गई लेकिन
अभी भी है साबुत जबान और है गरिमा से जीने की चाह
जबकि नहीं गया बुलंदशहर
बुलंदशहर मेरे भीतर आकर चिल्ला रहा है
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर
और लिख देता हु बुलंद शहर की बुलंद तस्वीर ....
Monday, December 30, 2013
धर्मेद्र सुशांत,दैनिक हिंदुस्तान में
धर्मेद्र सुशांत ने दैनिक हिंदुस्तान में 3 नवम्बर 2013 में लिखा है .......
ठोस सामाजिक संदर्भ
युवा कथाकार कैलाश वानखेड़े की कहानियां विशेष रूप से हमारे समाज की रगों में गहरे पैठी जातिवादी सोच और उसके हिंसक कारोबार का उद्घाटन करती हैं। इस तरह ये ठोस सामाजिक सच्चई को सामने लाती हैं और उसकी विद्रूपता पर सवाल उठाती हैं। इन कहानियों में अनुभव का बल तो है ही, विवेचना के विवेक की रोशनी भी है। शायद यही वजह है कि ये कहानियां शोषण करने या वर्चस्व जमाने वाली शक्तियों के प्रतिकार के लिए कोई बनावटी उपाय नहीं सुझतीं। इसकी बजाय ये उस सामाजिक ताने-बाने का रग-रेशा खोलकर पाठक के सामने रखती हैं, जिनके दम पर यह भेदभाव संभव होता है। वास्तव में वानखेड़े आग में तपते लोहे की लालिमा दिखाने से अधिक उसके आंतरिक ताप को महसूस कराना चाहते हैं। समकालीन हिंदी दलित लेखन की सशक्त बानगी इन कहानियों में दिखती है। सत्यापन, कैलाश वानखेड़े, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा),
ठोस सामाजिक संदर्भ
युवा कथाकार कैलाश वानखेड़े की कहानियां विशेष रूप से हमारे समाज की रगों में गहरे पैठी जातिवादी सोच और उसके हिंसक कारोबार का उद्घाटन करती हैं। इस तरह ये ठोस सामाजिक सच्चई को सामने लाती हैं और उसकी विद्रूपता पर सवाल उठाती हैं। इन कहानियों में अनुभव का बल तो है ही, विवेचना के विवेक की रोशनी भी है। शायद यही वजह है कि ये कहानियां शोषण करने या वर्चस्व जमाने वाली शक्तियों के प्रतिकार के लिए कोई बनावटी उपाय नहीं सुझतीं। इसकी बजाय ये उस सामाजिक ताने-बाने का रग-रेशा खोलकर पाठक के सामने रखती हैं, जिनके दम पर यह भेदभाव संभव होता है। वास्तव में वानखेड़े आग में तपते लोहे की लालिमा दिखाने से अधिक उसके आंतरिक ताप को महसूस कराना चाहते हैं। समकालीन हिंदी दलित लेखन की सशक्त बानगी इन कहानियों में दिखती है। सत्यापन, कैलाश वानखेड़े, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा),
Subscribe to:
Posts (Atom)
झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड
जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...
-
कहानी ''सत्यापित ''को सुना जा सकता है ,रेडियों की दुनिया के सरताज ,युनूस खान की आवाज में .यहाँ क्लिक कीजिये ..... http:...
-
मेरे माथे पर नहीं लिखा है लेकिन मेरा चेहरा बोलता है बोलते है घुसर फुसुर करते हुए सैकड़ों मुहँ धारी पढ़ लेते है कागजात पता लगा लेते है ...
-
शब्द प्रभुनों . शब्दों से जलते है घर ,दार ,देश और इंसान भी / शब्द बुझाते है शब्दों से जले हुए इंसानों को / शब्द न होते तो आँखों से ग...




