Wednesday, January 29, 2014

बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर

गलती मेरी ही है 
माथा मेरा ही खराब है सुबे से 
जिसे उल्टा कहा जाता है उसका उत्तर 
मै तो बस सीधे सीधे बुलंद के बाद शहर ही लिखना चाह रहा था 
बायमिस्टेक शहर की बजाय भारत लिख गया 
विज्ञापन का कहे या बजाज का असर 
जैसा बनाया जाता है वैसे ही निकलता है 
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर ...प्रतिभा प्रतिभा मेरिट मेरिट 
चिल्लाते चिल्लाते खेत में लड़की के कपड़े फाड़े गए 
जबकि झंडा है मेरे देश का 
बोला ही गया और बोलनेवाले की जान लेने के लिए ही चली थी गोली
उसमें बारूद नहीं ग्रन्थ थे
आप देख पाए न देख पाए
आपकी मानसिकता और चश्मा जो भी देखे कहे
आपको तो मालूम ही नहीं
खेत सिर्फ बुलंदशहर में नहीं है
लड़की सिर्फ एक नहीं है करोड़ों में
चुप है कि लगता है आपको कि
व्यवस्था में चौथा वर्ण नहीं है
तभी तो बनाए रखने के लिए लोकतंत्र
वह चौथा खम्बा भी लापता हो गया खुद ही
बदन से कपडे तन से जान चली गई लेकिन
अभी भी है साबुत जबान और है गरिमा से जीने की चाह
जबकि नहीं गया बुलंदशहर
बुलंदशहर मेरे भीतर आकर चिल्ला रहा है
बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर
और लिख देता हु बुलंद शहर की बुलंद तस्वीर ....

Monday, December 30, 2013

मनोज पाण्डेय ,नया पथ में

धर्मेद्र सुशांत,दैनिक हिंदुस्तान में

धर्मेद्र सुशांत ने दैनिक हिंदुस्तान में 3 नवम्बर 2013 में लिखा है .......

ठोस सामाजिक संदर्भ

युवा कथाकार कैलाश वानखेड़े की कहानियां विशेष रूप से हमारे समाज की रगों में गहरे पैठी जातिवादी सोच और उसके हिंसक कारोबार का उद्घाटन करती हैं। इस तरह ये ठोस सामाजिक सच्चई को सामने लाती हैं और उसकी विद्रूपता पर सवाल उठाती हैं। इन कहानियों में अनुभव का बल तो है ही, विवेचना के विवेक की रोशनी भी है। शायद यही वजह है कि ये कहानियां शोषण करने या वर्चस्व जमाने वाली शक्तियों के प्रतिकार के लिए कोई बनावटी उपाय नहीं सुझतीं। इसकी बजाय ये उस सामाजिक ताने-बाने का रग-रेशा खोलकर पाठक के सामने रखती हैं, जिनके दम पर यह भेदभाव संभव होता है। वास्तव में वानखेड़े आग में तपते लोहे की लालिमा दिखाने से अधिक उसके आंतरिक ताप को महसूस कराना चाहते हैं। समकालीन हिंदी दलित लेखन की सशक्त बानगी इन कहानियों में दिखती है। सत्यापन, कैलाश वानखेड़े, आधार प्रकाशन, पंचकूला (हरियाणा),

Sunday, October 27, 2013

भाकर के भीतर की आग

तवे से बहुत छोटी सी दिखती है आग ...
लहराती हुई लगाकर पूरी ताकत ,पकाती है भाकर को
मोड़कर भी दो हिस्से नहीं होती
उसकी परत टूट नहीं पाती
जिसे कटोरी के पानी से बारबार चिकना बनाया जाता था
कि न चिपके हाथ में
न चिपक बच्चे गोद में
कि पकना ही है ज्वार की भाकर की तरह
जिसमें रहती है आग तवे से बिछड़ने के बाद भी
आग बनी रहे अपने भीतर ,माँ यही चाहती थी .




(संजीव तिवारी की वाल से साभार फोटो.इसे देखकर लिखा है ,कुछ तो भी )

Monday, October 14, 2013

एक गुमशुदा लफ्ज

उस नगर में वफ़ा एक गुमशुदा लफ्ज है
मिलना ,शब्दकोष से सजायाफ्ता होकर बेदखल हो चुका है
वक्त ,नहीं है लेकिन वक्त के नाम से दहशतजदा है वह
दिमाग के भीतर से हूक लगातार  उठती है
बेसबब
बेवजह
कहकर उसे डस्टबिन के कीटाणुओं के हवाले किया जाता है .
सड जाए
गल जाए
हो जाए गायब
ऐसी कोई ख्वाहिश नहीं होती
लेकिन उसीके लिए चली जाती है याद .
याद
याद ''का जो अर्थ बताया नहीं गया
न समझाया गया
और तो और कभी भी शब्दकोष में उसकी तलाश नहीं की गई
वही हरदम आगे आगे रहता है
..
वक्त बदला नहीं है
कैलेण्डर ,दिल बहलाने के लिए फडफडाता है
पिंजरे में बंद लव बर्ड्स की तरह
उसे कितना भी उडाओ नही उडती
उड़ने की कोशिश में मारी जाती है
,जिस तरह समय को ..

अभी कल ही बात है
गिने गए अठावन
जो मारे गए थे अँधेरी रात में अपने घरों से निकालकर
 उनकी लाश थी
जलाया गया था
समाचार के साथ फोटो भी थे

लेकिन हत्यारा कोई नहीं

यह तो शुक्र है कि लाशों की लक्षमनपुर बाथे में गिनती हो गई
खैरलांजी में कितने मरे ?
तुम्हें नहीं पता

खैर जैसे तुम तय नहीं कर पाती हो
वैसे ही समझ नहीं पाता हूँ कि
कितना बदल गया वक्त
कितना हुआ विकास
वर्णव्यवस्था से समझ नहीं पाते अब भेद को
जैसे समझना मुश्किल होता है कि
आखिर प्यार क्या होता है

जिस वक्त तुम प्यार को परिभाषित कर लोगी
उसी दिन वर्ण व्यवस्था के मायने
समझ में आ जायेंगे
जैसे मिट्टी का रंग
हवा में घुली खुशबू
तलवे में कंकड़ की चुभन
तवे पर गर्म रोटी के पकने का अहसास
पेट के साथ मन भरने की बात ....

Friday, September 20, 2013

शब्द प्रभुनों ---कवि वामन निम्बाळकर

शब्द प्रभुनों .

शब्दों  से जलते है घर ,दार ,देश और इंसान भी /
शब्द बुझाते है शब्दों से जले हुए इंसानों को /
शब्द न होते तो आँखों से गिरे न होते आग के गोले /
न बहता आंसुओं का महापुर /
आता न कोई करीब /
जाता न दूर ,,
शब्द न होते तो ...
---कवि  वामन निम्बाळकर
--अनुवाद -कैलाश वानखेड़े
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 ''शब्द '' 
  'शब्‍दांनीच पेटतात घरे, दारे, देश /
आणि माणसेसुद्धा /
शब्‍द विझवतात आगही /
शब्‍दांनी पेटलेल्‍या माणसांची .शब्‍द नसते तर पडल्‍या नसत्‍या/ 
डोळ्यांतून आगीच्‍या ठिणग्‍या/ 
वाहिले नसते आसवांचे महापूर /आले नसते जवळ कुणी, /
गेले नसते दूर /
शब्‍द नसते तर''
 - कवी वामन निंबाळकर

झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड

                     जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को   भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...