Saturday, July 1, 2017

जस्ट डांस


जस्‍ट डांस
                           - कैलाश वानखेड़े

    उसने कहा था,मैंने सुना था.वो चली गई थी.उसके जाने का वक्‍त अभी भी धड़क रहा है. न जाने ऐसा क्यों लग रहा है कि वह लौटेगी सधे कदम से, खुद को संभालती हुई. मुस्‍कुराहट को दबाती हुई धीमे से अपने पैंरो को देखते हुए आंख और चेहरे को नीचे कर कुर्सी पर बैठने के बाद कहेगीं.वह ऐसा ही करती है वो ऐसा ही करेगीं अभी. अभी लगातार दरवाजे की तरफ देख रहा हूं. लग रहा है वो बैठकर अपने बालों को ठीक करने के अंदाज के साथ बोलेगी, ''बात यह है कि.....     
    बात यह है कि वो जा चुकी है. जब जा रही थी तब लगा था उससे रूकने का आग्रह करूं.तब अजीब सी लड़खडाहट आ गई थी आवाज में. बोल नहीं पाया था. बस इतना कहा था मैंने, ''ठीक है.’’कह नहीं पाया था अपना ख्‍याल रखना. कोई बात हो तो बताना. तब लगा था कि ठीक है,सुनने के बाद वो कुछ कहेगी लेकिन उसने कुछ नहीं कहा. क्‍या कहेगी?क्‍या सुनना था मुझेनहीं मालूम पंखे को देखने लगा जो घूम रहा है. दरवाजे को देखा जो बन्‍द है.
    वो अब निकल चूकी होगी.बस स्‍टैण्‍ड से बस राईट टाईम पर निकल जाती है. नहीं रूकेगीं बस. बस को अगला शहर समय पर पकड़ना है. लग रहा है बस खराब हो गई होगी.खराब बस जा नहीं सकती है.बस स्टैंड पर कोई इतनी देर रुकने की बजाय वो लौट आएगी.कमरे का दरवाजा खुलेगा और आकर  कुर्सी पर बैठेगी.ख़याल इन्तजार के इर्द गिर्द चक्कर लगाते हुए अटक गये.
    उस वक्‍त कमरा तप रहा था. पंखे की बस से  बाहर था  तापमान को एक जैसा रखना. मुश्किल और बैचेनी में तमाम पूर्वानुमान के बावजूद बरसात इस जगह नहीं हुई है.सूरज  तेज धूप के साथ पूरी मुस्‍तैदी से अपनी डयूटी निभा रहा था. खेत में अंकुरित बीज झुलसते हुए खुद को बचा रहे है.धरती से गीलापन नमी छोड़कर जा चुकी है.
    चार दिन चार सूरज चार चांद और हजारों हजार चांदनियों के बावजूद करोड़ रूपधारी अंधेरे के बीच कैसे रह पाऊंगा अकेला. अखबार में दूसरी आजादी, अन्ना की खबर पसरी हुई है.इस पेपर  से  पंखा करने का मन होता है लेकिन उसी वक्‍त बिना किसी को कुछ कहे उठता हूँ.  निकल आया हूँ  बाहर.
    इधर उधर भटक कर जब थक गया तब घ्रर आया रात में. टीवी के इस रियलिटी शो में विदेशों में जाकर ऑडियंश लिया गया.  सुभाष जिसके पुरखे बंगाल छोड़कर विदेश चले गए. जज बनी सराह खान ने पूछा, ''तुम किसी से प्‍यार करते हो?'' सुभाष ने बिना सोचेबिना वक्‍त गवाये कह दिया, हां. इस धधकते सवाल का जवाब इतनी जल्‍दी कैसे दे सकता है कोईप्‍यार शब्‍द ध्‍वनि अभी कान के गलियारे में ही पहुंची होगी और सुभाष की जबान ने झट से हां कह दिया. इस हां को सुनकर आश्‍चर्य में पड़ गई सराह खान. वो जज जिसने अंतरजातीयअंतरधर्मीय विवाह किया था उसे यकीन ही नहीं हुआ कि कोई इतनी जल्‍दी सबके सामने प्‍यार को मंजूर करेगा. मैं प्‍यार करता हूँसरेआम कहना गुनाह माना गया. अपराध. सामाजिक अपराध जबकि चोरी छिपे प्‍यार करना और उस अहसास को सीने से लगाये रखने के दौर मेंदेश में देख रहा हूँसुन रहा हूँ. सुभाष जो मंच पर हैलंदन के हॉल में है. सबके सामने बेधड़क निर्भिक होकर कहता है, ''हॉ मैं प्‍यार करता हूँ'',
    मैं अकेले में, एक कमरे के भीतर बोल नहीं पाया और वो चली गई. हॉशब्‍द फैसले से उबर नहीं पाई सराह खान कि अपने को समझाने के लिए सवाल करती है, ''किससे?'' सराह खान उलझी हुई दिखती है जबकि मैं खुद से बोल चूका था,''किससे प्‍यार करते हो सुभाष?
    तुम मुझे प्‍यार दो मैं तुम्‍हें प्‍यार दूंगाका नारा देश विदेश में छा जाएगा. सुभाष ने रेडियो की जगह टीवी पर सबके सामने कह दिया. उस हॉ में चमक थी. रोशनी थी. दंग से भरा, संगीत में डूबा था पूरा माहौल टीवी में और मेरे घर के भीतर टीवी की रोशनी के अलावा कुछ नहीं था. बल्‍ब नहीं जल रहा था. भीतर कुछ जल रहा था. कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ. सराह खान वो जज है कि वो उलझन में है अब  कौन सा सवाल करेसुभाष से? सुभाष की आंखेचेहरा और जबान के साथ कदम तैयार थे. जो चाहे पूछोजो चाहे करने को कहोवह तैयार है पूरी तैयारी के साथ मंच पर लेकिन सराह खान के साथ वैभवी जो दूसरी जज हैवो भी हतप्रभ थी. सराह बोलीफिर?''
    सुभाष बोला, ‘’उसके मां-बाप पंजाबी है. वे नहीं चाहते है कि उनकी बेटी की शादी डांसर से हो. वे चाहते है इंजीनियर या डेंटिस्‍ट दामाद. जिसकी कमाई  पचास हजार डॉलर हर महीने हो. वो प्रेमी की बजाय इंजीनियर या डेंटिस्‍ट से शादी करवाना चाहते है. कमाई से शादी करवाने वाले मां-बाप की बात सुनकरमेरे भीतर कुछ टूटा.तभी खड़ा हो गया मैं. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इस सुभाष को आजादी मिलेगी या नहीं. उस लंदन में जहाँ रहता है सुभाषजहाँ रहती है लड़कीवहाँ बेबस दिख रहा है. निराशा की तरफ जाती हुई खाई के मुहाने पर खड़ा है. उसको उस जगह पर देखता हुआखुद को अकेला महसूस करने लगा. तभी तो जब कुछ सूझा नहीं सराह खान को तो बोली, ''हमारे देश में तो हालात बदले हैइस तरह की बातें नहीं की जाती हैयहाँ....यहाँ विदेश मेंताज्‍जुब है.'' अपनी अस्थिरता को छिपाने के लिए सराह खान ने अपने बालों में दोनों हाथों की उंगलियां डाली. इस बहाने कुछ सुलझ जाए लेकिन उलझ गया था मैंहैरान था कि हमारे देश मेंबोलते हुए सराह खान किस जगह की बात कर रही हैबतौर नागरिक भले ही इस देश की हो लेकिन वो बॉलीवुड की हैजो सच नहीं दिखाता हैवो सपने बेचता हैसपने को ही हकिकत मानता है उसमें प्रेम सुहावना लगता हैआसान लगता हैकितना मुश्किल है प्रेममुझसे पूछोमेरी बात सुनो,
    कोई नहीं है सुनने वाला. अकेला हूँ और खाना पकाना है. उसे हमेशा भूल जाता हूँ याद नहीं रहता. याद करना नहीं चाहता कि खाना पकाऊँ. याद रहता है कि उसे कहूँगा. याद रहता है उसका चेहराउसकी बातउसकी हंसीआइनें में उसकी ही तस्‍वीर दिखती है. तभी ख्‍याल आता है कि सुभाष को एक सैल्‍यूट दू. नजर टीवी पर गई तो सुभाष नहीं दिखा. अंधेरा फक्‍क से हो गया. बिजली चली गई. कभी भी जाती है. कभी भी आती है. उसके होने न होने से कोई विशेष असर नहीं पड़ता मुझे. अब आंख बन्‍द कर वहीं लेट गया हु. जमीन परसोचता रहा और ठंडी जमीन सुकून देती रही.उसका चेहरा आंखों के भीतर नाचता रहा.
    सभी चैनलों पर नाचना गाना हो रहा हैजिसे रियलिटी शो कहा जा रहा है. इसे  नाचना गाना नहीं कहते. एक हल्‍कापन लगता है सुनने में. नृत्‍य कहते ही आभिजात्‍यपन आ जाता है पर नहीं कहा जा रहा है नृत्‍य. लिखते है नृत्‍य लेकिन शो का नाम नहीं है. नृत्‍य के नाम जो सिखाया या किया जाता हैउससे दूर हैं लोगनृत्‍य शुद्धतावादी के कमरो मेंहॉल में है वह यहाँ-वहाँ नहीं दिखतादिखता है डांसजिसे चाहे वो कर सकता हैकरना चाहता हूँ मैं भी डांस. उठता हूँ कि बिजली आ जाती हैटीवी चालू करता हूँ,
    सिगड़ी का प्‍लग लगाता हूँटीवी बन्‍द हो जाता है. बल्‍ब की रोशनी एकदम कम हो जाती है. खाना पकाने की सिगड़ी के तारों का गर्म होना टीवी को स्‍वीकार नहीं है.अपने घर में अपने हाथ से खाना पकाना टीवी कोबल्‍ब को मंजूर नहीं है. सिगड़ी जलेगी तो हम बंद हो जाएंगेंएक धमकी हैडांस देखूँ या खाना पकाऊँ?
    आटा गूंथता हूँ. उसके ख्‍याल में होता हूँ. सिगड़ी पर खुद को पाता हूँ और गूंथते आटे में उसको. लगता है कि वो टीवी देखते हुए बैठी है और मैं आटा गूंथ रहा हूँ. पानी के हल्‍के से छिंटे जैसे ही आटे पर डालता हूँ लगता है उसके चेहरे पर छिंटे मारे है. वो मुस्‍कुराती है उठती है और एक गिलास पानी डालने के लिए बढ़ती है कि उसका हाथ पकड़ लेता हूँ. छलकता है गिलास में से रह-रहकर पानी कि हमारी इस पकड़-जकड़ में बरसती है भीतर बाहर कोई कल-कल करती नदी. भिंगोती है कि डूबाती है कि हम बहते चले जाते है. पता नही कहां जाना है. बस बहते रहना है. आटा गूंथते हुए बहता जा रहा हूँ कि अचानक लगता है गर्माहट हो रही है. सिगड़ी की आग अपने चरम पर है.उसकी आग में अपने चहेरे का ताप है. लगता है कि सिगड़ी बन गया हूँ.
    तवा रखता हूँसिगड़ी पर. रोटी बेलता हूँ कि बल्‍ब का वॉल्‍टेज बढ़ जाता है कि अब टीवी भी चलाई जा सकती है. नहीं करना ऑन. सिगड़ी बना हुआ हूँ कि नदी बनना चाहता हूँ कि कहना चाहता हूँ.
    टीवी चलाया. समाचार चैनल लगाया. डेढ़ सौ साल से बन्‍द पद्मानाथन मंदिर के तहखाने को खोलने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था. सात में से पांच तहखाने खुले है. माना जा रहा है कि डेढ़ लाख करोड़ की संपति है. हिरा-मोतीसोने-चांदी के जेवरातसिक्‍केप्रतीक चिन्‍ह मिल रहे है कि इतनी राशि का मतलब है केरल का तीन साल का बजटमनरेगा की तीन साल की राशि है. दुनिया का सबसे महंगा मंदिर. इस मंदिर ने तिरूपति मंदिर को शिखर से हटा दियाजिस मंदिर में सदी का महानायक अपने बेटे के वैवाहिक जीवन के लिए मन्‍नत मांगता है. डरा हुआ महानायक पैदल चलता है. टीवी वालों को बुलाता है. दिखता है टीवी पर कि वह दिखना चाहता है टीवी पर, समाचार पत्रों में कि होने वाली बहू के कुंडली के मांगलिक दोष निवारण के लिए भागता है कि बेटे की सगाई अब न टूट जाए कि जिससे इश्‍क किया थावो तो नहीं मिली लेकिन जिसने इश्‍क किया था सल्‍लू से विवेक से वो अरेंज होने के बाद बनी रहे.
    इस डरे हुए डराये हुए समाज में प्रेम डर का नाम बन गया कि समाचार के बजाय जस्‍ट डांस देख लूं कि महानायक के डांस में संगीत नहीं है. लय नहीं हैसुर नही हैन गायन है कि रोमानिया की लड़की पिया बसंती रे काहे सताये आजा, पर डांस करने के बाद गाने का अर्थ बताते हुए आंसूओं में डूब जाती है कि उसका मंगेतर बाहर खड़ा डबडबाई आंखों से स्‍क्रीन पर देखता है. वैभवी भावुक हो गई हैसबने देखा उसके आंसू, डबडबाई आंखेभावुकता को. मेरी आंखे नम हैइंतजार में बैठा हुआ हूँ कि गुन-गुनाना चाहता हूँकाहे सताए आजा ....पिया बसंती रे....
    दरवाजे के खटखटाने की आवाज आई. सांकल को लगातार दरवाजे के पटिये पर बजाया जा रहा है कि सताने के इस दूसरे तरीके पर उठता हूँ. इस ख्‍याल के साथ कि वो आ गई हैउसने ही दरवाजा खटखटाया हैदरवाजा खोलते ही फटाक से वो अन्‍दर आ जाता है.
    ''क्‍या कर रहा था बे? कबसे बजा रहा हूँ.'' ख्‍यालों की छत भर-भराकर टूटती है कि उस मलबे में दब जाता हूँ. हवा नहीं है. रोशनी नहीं हैफिर भी उसकी याद में ही हूँ कि वो कैसे आ सकती हैइतनी रात में वो अकेली कैसे आ सकती हैवह आना चाहती है कि डरती है. देख न ले कोई उसेमेरे घर के भीतर जाते हुए. अंधेरी रात में एक लड़की किसी के घर में चली गईयह एक आंख सेएक जबान से निकलकर इस कस्‍बे की आवाज लाउड स्‍पीकर में बदल जायेगी और जगह-जगह खड़े एंकर पूछेगें, ''सारा देश जानना चाह रहा है कि आप किसलिए गई थींसारा देश देख रहा हैबताईये क्‍या किया अन्‍दरसारे देश की नजर आप पर हैक्‍यों डर रहीं है आपक्‍या किया ऐसा जो इतना डर रहीं हैसारा देश जानना चाह रहा हैबताइये..बताइये...
    और देश को बताना नहीं चाहती है वो. वो इश्‍क में हैप्रेम में है. प्रेम में जो होता हैइश्‍क में जो डूबी रहती हैउसे किस निगाह से देखते हो कि पीठ पर धौल जमाते हुए प्रेमशंकर कहता हैक्‍या कर रहा था बेकिसी के साथ या अकेले-अकेले..'' वो हंसता है. वो जोर से चिखते हुए हंसना चाहता है कि जानना चाहता है क्‍या कर रहा था मैं.
    ''चुपकर जस्‍ट डांस देखजस्‍ट.'' मैं कहता हूँ कि अभी भी दिमाग में वही छाई हुई है,
    ''फिल्‍म देखनी है. बोर हो रहा था.'' वो टीवी के रिमोट को ढूंढ रहा है.
    ''फिल्‍म नहीं जस्‍ट डांस देख. देख कि विदेश में भी अपने देश वाला पैसे वाले को दामाद बनाना चाहता है.''
    ''वो तो सब जगे हैगरीब की जोरू कौन बनना चाहती हैकौन बनेगी तेरी जोरू?'' हंसता है प्रेमशंकर. इस तरह कि मेरे चेहरे पर चिपकी हुई ''रोशनी'' को हटाने के लिए फूंक मार रहा हो.
    ''प्‍यारे बता तू गरीब है या नही.'' 
      ‘’तू ही बोल.’’ अभी उसके खयालों में हूँ कि सब्जी पकाने के लिए दाल ढूंढ रहा हु.
      ‘’तेरे पास पंखा है.मतलन तू गरीब नही है.’’ उसने फैसला दे दिया.मैंने कहा,ये तो चाइना मेड है.सस्ता है.’’
       ‘’जब देखा जाता है सरकारी नजर से तब सस्‍ता महंगा नही देखते. पंखा है न और फिर तेरे पास पक्‍की दीवार वाला  घर है मतलब गरीब नही है.'' 
      ''अरे ये कौन सी बात है ये तो किराये का मकान है''
       ‘’हां मतलब तो आवासहीन नही है. खुले में नहीं सोता मतलब गरीब नही है रे तू.'' भावुकता वाले अदांज में उसने कहा.
        ‘’अरे छत तो होनी चाहिये सिर छिपाने के लिये.''    
     ‘’टीवी...ये सबसे किमती सामान हैअब तू कुछ भी कर ले, तू गरीब हो ही नही सकता. चल जस्‍ट डांस करते है.’’ वो हंसते हुये अपनी कमर हिलाने लगा.
     ''ये तो ईएमआई पे है, वो भी दिल्‍ली मेड.'' विवशता में तब्‍दील होता जा रहा हूँ मैं कि प्रेमशंकर बोलता है, ''तू गरीबी रेखा के नीचे नही आ सकता है. तू तो गरीबी के ऊपर है. ऊपर चढ़ा हुआ.'' हंसता है कामुकता से भरी हुई हंसी में डूबा हुआ है.
    ''ऊपर नीचे..?’’
    ''बंधू सरकार तेरे को गरीब मानती नही और लोग तुझे अमीर समझते नही.’’ 
    ''अभी तो बोल रहा था कि गरीब नही हूं और अब...''उसने मेरी बात काट दी और बोला, ‘’देख भाभी की नजर में तो तू गरीब है. तेरे पास कार नही है. तेरे पास खुद का मकान नही है. बहुत अच्‍छी कॉलोनी में रहता नही है.नौकरी भी परमानेंट नही है. चिटफंड कंपनी का डिब्‍बा कभी भी गोल हो सकता है. छोड़, जस्‍ट डांस ही देख लेता हूँ. अरे ये तो रिपिट है.वैसे भी अगले राउंड में जाने वाले को एक करोड़ मिलेगें.''
    ''एक करोड़ मिल जाये तो...''
    ''तो भी भाभी नही मिलेगी.’’ अठ्ठाहास था सपनों को फूंक देने वाला अचानक गिरा देने वाला.जैसे आसमान में उछलकर भाग गया अब धरती पर पटक दिया. बुरा लगा. बहुत बुरा. मूड़ खराब हो गया. चेहरा उतर गया. चाकू ढूंढने लगा हूँ.
    प्‍याज काटते वक्‍त नम हुई आंख. प्‍याज का असर नही था. सपनों की टूटन थी.प्रेमशंकर  टीवी देखते हुए बोला,’’करोड़पति बनना और जिससे प्‍यार करते हो उसका पति बनना दोनों अलग-अलग है. प्‍यार करो अपनी तरफ से. वो चाहे न चाहे. आगे बढे न बढे. एक बात बताऊँ सच्‍चा प्‍यार तो एक तरफा होता है. अपने धुन में मगन रहना. सपनो को खोजना. सपनो में होना. शादी वादी का इससे कोई लेना देना नही है. प्‍यार को प्‍यार ही रहने दो इसे कोई नाम न दो.’’ वो गुनगुनाता है. मैं चुप हूं कि अब जस्‍ट डांस चल रहा है.
       सौमित्रा को एंकर बंगाली बताता है,भारत माता बनकर करती है डांसगाने के शुरुआत में गूंजती है आवाज हमारी भारत माता जकड़ी है,आतंकवादभ्रष्‍टाचारतानाशाही में आरक्षण में....’’ भारतमाता बनी हुई सौमित्रा ने देश भक्ति की लहर फैला दी.ये किसकी भारतमाता है,जो आरक्षण से भी जकडी है?सवाल दिमाग में घूम रहा है.
    प्रेम शंकर जस्‍ट डांस देखते हुए कहता है,’’अबे सारा देश आजादी की बात कर रहा है और तू जस्‍ट डांस देख रहा है. तू तो पक्‍का देशद्रोही है.’’ वो हंसता है.ब्रेक आते ही चैनल बदलता है. समाचार चैनलों में दूसरी आजादी जनलोकपालभ्रष्‍टाचार के अलावा कोई शब्‍द सुनाई नही दे रहा है. कोई-सा भी चैनल लगा दोयही बात यही चेहरे है. जैसे कोई विज्ञापन हर चैनल पर दिखता है. एक ही वाक्‍य है.एक ही भाव.एक लाइन में विज्ञापन एजेंसी सारे चैनल से खरीद लेती है. चाहो न चाहो वो वाला विज्ञापन देखना ही पड़ता है.विवशतासहजता में बदल दी गई है. अब गुस्‍सा नही आता है. वही वाला विज्ञापन हर जगह होगा तो चुप रहोदेखो सुनो उसी तरह का यह मामला है, चुप रहो और हां इसके खिलाफ कोई भी सवाल किया तो सब ऐसे टूट पड़ते है कि लगता है, गुनाह किया है. मैनें फेसबुक पर इसे अतिरंजित परिवर्तन की बात कहीजो किसी और के दिमाग से चल रहा है.जिसका मकसद स्पष्ट नही है, तो कईओं ने अनफ्रेन्‍ड कर दिया. असहमति पढ़ना सुनना ही नही चाहते है.और दाल चढ़ा देता हूं मैं सिगड़ी पर.
    प्रेम शंकर बताता है,’’ देखो किरण कैसे डांस कर रही है.विश्‍वास का कपड़ा किरण ने सिर पर डाला और डांस....भाषण के बीच में डांस होना चाहिये कि नही?’’
    ''ये तो जस्‍ट डांस का प्रायोजित रियलिटी शो है.'' कुकर की सीटी ढूंढ रहा हूँ. सीटी बजाने के लिये जरूरी है. प्रेम शंकर को गुस्‍सा आ गया, ''यार ये बता भ्रष्‍टाचार से सभी परेशान है. है कि नही. सब चाहते है भ्रष्‍टाचार मुक्‍त हो देश.''
    ''हां चाहते है सब लेकिन होना नही चाहते और ये जो आंदोलन है न जिस भ्रष्‍टाचार को रोकने की बात कर रहे है,उसके नियम कायदे कानून सब पहले से है बस उन्‍हें इम्‍प्‍लीमेंट करना है. उसे छोड़कर नया ढांचा खड़ा करना मतलब आयोग बनाने जैसा है और तू जानता है आयोग क्‍या करते है? कैसे करते है काम. किसी एक का काम नाम बता जो पूरी ईमानदारी के साथ अपना काम कर रहा हो.''
      ‘’लेकिन विरोध करना तो गलत है.’’
    ''जो मुझे ठीक न लगे, जिसके तौर तरीके,उद्देश्य, जमा हुए लोगों के स्‍वार्थ दिख रहे है, तो क्‍या अपने आपसे झूठ बोलूँअपने साथ मैं क्‍यों करूं भ्रष्‍टाचार?''
    ''सच तुमको दिखता नही. ये जिस चिटफंड कंपनी में काम कर रहे हो नवो किसको सहारा देगी? किसे दिया है? तुम लोग अपना मुनाफा देख रहे हो.चिटफंड कंपनी का कर्ताधर्ता अपना पैसा बना रहा है और बेवकूफ कौन बन रहा है. जनता और तू आंदोलन का विरोध कर रहा हैतू...''
    ''उस लोकपाल में चिटफंड कंपनी शामिल नही है.वो सिर्फ बातें है और हां ये भी बता दूं ये दूसरी आजादी की बात मुझे अपील नही करती है.’’ कुकर की सीटी बजती है बातों को रोकती है.
    अपने घर से इतनी दूर आकर अकेला रहता हूँ. इस कंपनी से भागने का सालभर से सोच रहा हूँ लेकिन मेरा पैसा अटका पड़ा है. हर बार आश्‍वासन दे रहे है. कमीशन के आकर्षक पैकेज के अलावा इस कंपनी का बड़ा नामबड़े काम देखे थे तो लगा कि लाइफ बन जाएगी लेकिन पगार के लाले पड़ रहे है. बड़े-बड़े विज्ञापन में भारत माता दिखाता है मालिक. मालिक का फोटो अपने बेटे-बहुओं के साथ इस तरह से दिखाता है कि लगता है ये ही है राष्‍ट्र निर्माता परिवार.  सोचते हुए मन ही मन में  हंसी आती है. इसने भारत माता की जय बोला और अब दूसरी आजादी वालों को देखता हूं तो लगता है आजादी की बात तो सब करते हैंसब एक जैसे है. सोचता हूँ बोलना नहीं क्‍योंकि असहमति व्यक्त करना गुनाह बना दिया गया है.
    इतनी देर में घूम-फिरकर फिर जस्‍ट डांस देखने लगा हूँ. पता नहीं पुराने एपिसोड एक के बाद एक क्‍यों दिखा रहे हैं. इतना टाइम है कि उसे खपाने के लिए बस जस्‍ट डांस...
    शरमाता हुआ लड़का आया. बेहद दुबला पतला. जज बनी हुई सराह खान मजे लेने लगी हैं. उसने नाम बताया जयेश. अप्रवासी भारतीयएन.आर.आई. जिनके भीतर गाने और देश प्रेम भरा हुआ हैबताता है कि गुजराती है.खुश होकर सराह खान बताती है कि वैभवी भी गुजराती है. उसका अन्‍दाज इस तरह का है कि वैभवी भावी दुल्‍हन है. वैभवी इस तरह से भाव बनाती है कि वह भावी दूल्‍हे को देख रही हो. गुजराती होने से लगा प्रांतभाषा मैच कर गए. तो सराह ने कहा कौन होवो भाषा प्रांत के बाद जाति पर पहुंच गई.   
    मेरे कान खड़े हो गए. मेरे भीतर का कोई बाहर आने वाला है कि जैसे मुझसे पूछ लिया गया होतुम्‍हारा सरनेम क्‍या है?  मैं बोलता उसके पहले जयेश बोला,''पहचानो.मैं दंग हूँ.सरेआम जाति पहचानो अभियान चल रहा है.अखबार की वैवाहिकी से विज्ञापन पढने लगे हैं ये. प्रेम शंकर अधीरता में दोनों जज का सहयोगी बन गया. सरनेम पूछा जानामतलब विवाह की सबसे बड़ी शर्त की पूर्ति. कि इठलाती है वैभवी और शर्माती हुई सराह पूछती है,
, ''पटेल हो? ''
    ''ना.वो माइक हाथ में लेकर अपनी कमर को इस तरह से हिलाता है कि उसका शरीर हिलने लगता है.वो कहता है,’’सोचो?’’ भारतवंशी नये लड़के को यह गर्व है कि वह उसकी जाति जानने वालों के जिज्ञासा में है.बोलती है वैभवी, ''शाह हो.और वह लड़का उछलता है कि मुझे पहचान लिया गया है.खुशी है उसके भीतर.वो बिखर रही है कि दोनों जज खुश हैं कि शाह मिल गया शाह... जाति आखिर पहचान ली गई.वे तीनों खुश हैं.खुश है तमाशबीन कि देखोये जान गए जाति को.
    सराह को अपने ज्ञान के परिपूर्ण का अहसास हुआ.मुझे अपूर्णता का अहसास हुआ कि कैसे जान लियारंग है, रूप है, शरीर है, कपड़े हैं, तो किस आधार पर तय कर लिया कि ये कौन हैसुभाष को पंजाबियों ने क्‍यों खारिज कियासुभाष की उदासी मेरे भीतर उतर आई, क्‍या सुभाष पंजाबी होता तो 50 हजार डॉलर कमाने वाली शर्त लागू होतीविदेश में रहकर इतना प्‍यार करने वाले का पेशा तय करता है कि किससे शादी करने दी जाएगी.प्‍यार या पेशापेशा से पैसा बनता है, पैसा चुनेंगे.पैसा पेशे से आएगा, तो पेशा किससे आएगाहमारे देश में पेशा किससे आया?वर्ण व्यवस्था से आया है पेशा और फिर इससे जाति.
       जयेश के डांस पर सराह हंस रही है, वैभवी लोट-पोट है कि सब हंस रहे हैं, ये डांस नहीं था.एक मिक्‍चर था, जिसमें न लय है न ताल इसलिए सब हंस-हंसकर बेहाल हो रहे हैं कि मैं अभी उदास हूं कि वैभवी ने किस आधार पर तय किया कि ये पटेल नहीं है, तो शाह  ही  होगा?
    मेरे गांव झापादरा से गुजरात की सीमा करीब बीस कि.मी. है.हमारे इस इलाके में दूर-दूर तक हम ही हम रिश्‍तेदार हैं और कोई भी नहीं है पटेल या शाह.तो जिस गुजराती को मैं जानता हूं, उसे ये जज क्‍यों नहीं जानते, क्‍यों नहीं उनकी जुबान पर आया कि तुम भूरिया हो, परमार, बुनकर हो?
      सुबह हो गई.प्रेम शंकर  अपने घर नही गया और मै सपने देख रहा था.वो आएगी और दरवाजा खटखटाएगी.अहसास हुआ कि सचमुच मेरे ही घर का दरवाजा खटखट कर रहा है.जागते हुए लगा कि दरवाजा तो पिटा जा रहा है. इतनी सुबह कौन हो सकता हैहल्‍की सी रोशनी दरवाजे के भीतर से आ रही है.लाईट बंद करके सोता हूँ तो सुबह का अहसास बाआसानी से हो जाता है फिर आज तो इतवार है और नौ से पहले उठता नही हूँ. इतनी जल्‍दी कौन होगाआंख मलता हूँ और पूछता हूँ कौन?उस आदमी ने अनायास पूछ लिया, ''चल भई अपना नाम बता.उसके हाथ छोटा सा काला बैग है.समझ ही नही पाया क्या हो रहा है.
        '' क्‍यों?’’ जानना चाह रहा हु कि ये आदमी जिसके हाथ में रजिस्‍टरफार्मबैग हैवो इस तरह कैसे नाम पूछ सकता है. वो बोला ''जाति वाली सेंसस हैजनगणना. आई समझ में.'' गुस्‍सा था उसकी बात में जैसे मैंने कोई गुनाह किया हो. मेरा नाम पूछने से पहले यह बताना था. लेकिन वो ठिठ सा खड़ा देखता रहा. चुप था. मैं भी कुछ बोला नही.वो थोड़ी देर बाद बोला,’’ नहीं बताना हो तो मत बता.कोई जरूरी तो नही है? जाऊँ क्‍या?''
    ''आप तो बुरा मान गए.'' मैंने कहा.जबकि उसको यह कहना था.फिर मैंने क्यों कहा? नींद,सपना,दरवाजा पिटने से बड़ा गंदा उसका बर्ताव लग रहा है.
    ''चलो छोड़ो. नाम बताओं?'' उसका पेन तैयार था.
    ''आकाश भूरिया.''
    ‘’पिता का नाम?’’
    ''शान्तिलाल भूरिया.''
    ''उम्र?''
    ''26''
    ''शादी तो हो ही गई होगी?''
      ''नहीं''
     ''हमारे यहां तो इस उमर में दो तीन बच्‍चे होके मामला खत्म हो जाता है.'' पेन वाला ही ही करने लगा. उसका इस तरह ही ही करते हुए हंसना बुरा सा लगने लगा.
    उसने कहा, ‘’लो इस पर साईन करों.''
      मैंने कहा क्‍या लिखा है? जरा देखूँ.'' उसने कह,’’हम टीचर है. गलत नहीं भरते. काहे का टाईम खराब कर रहे हो?’’ मेरी जिज्ञासा को उसने अनावश्‍यक समझा और थोडी देर चुप रहने के बाद भरा हुआ फार्म मेरी तरफ सरका दिया. मैंने हंसते हुए कहा, ''आपने तो मेरी जाति भी लिख दी. मुझसे बिना पूछे.''
       ‘’टीचर हूँ सब जानता हूं और वैसे भी सबको पता है भूरिया एसटी में आते है.'' वो अपनी जानकारी सगर्व उंडेलता हुआ बोला. मैंने कहा, ''धर्म में ये क्‍या लिख दिया आपनेबिना पूछे ही.''
        ‘’तो मुसलमान कर दूँ?’’ वो चिढ़ते हुए बोला. उससे सवाल करना अर्थात उस पर भरोसा न करना जैसे लग रहा था उसे.
         ''क्‍यों?''
    ''तो वैसे भी वनवासी इसाई कर्न्‍वटेड होते है झाबुआ के.''
    ''आपको नहीं लग रहा कि आप कुछ ज्‍यादा बोल रहे है.वैसे भी जातिवार जनगणना में सारी जानकारी पूछकर ही लिखनी चाहिए. आपने तो मेरी जातिमेरा धर्ममेरी भाषा सब अपने मन से भर दी.''
     ‘’तो क्‍या गलत भरी?'' टीचर अपने अंहकार के शिखर पर जा रहा था.
        ''हॉ गलत लिखी है जानकारी.'' मैं अपनी नाराजगी जाहिर करता हूँ. वो जो ज्ञानी बन बैठा था जिसे लग रहा था कि वो सारी जानकारी सही सही भर चूका है. वह बोला,’’ धर्म में क्‍या लिखवाना चाहते होबता दो?''
    ''आदिवासी''
    ''आदिवासी?'' आदिवासी कोई धर्म नहीं होता है.''
    ''आप इसका फैसला करेंगेहम जो कहे वो आपको लिखना पड़ेगा.’’
    ''इसमें धमकाने की कोई बात नहीं है मेरे बाप का क्‍या जाता हैजो कहोगें वो लिखूंगा...लिख दिया अब और क्‍या बदलवाना है बता?''
    ''भाषा? भीली है. भीली लिखिए. मेरी मातृभाषा हिन्‍दी नहीं है.''
    ''भीलीभिलीलीनिमाडीमालवीमारवाडीसब हिन्‍दी ही तो है.''
    ''इसमें तो आप वहीं लिखिए जो लिखवा रहा हूं और यह भी बता दूँ ये हिन्‍दी नहीं है.''
    ''कौन सा फरक पड़ेकुछ भी लिखवाओ.'' उसे जाने की जल्दबाजी थी.उसे उम्मीद नही थी कि कोई  इस तरह कहेगा,टोकेगा.
    ''फरक तो बड़ा पड़े. आपने मेरी जातिभाषाधर्मव्‍यवसाय कुछ भी नहीं पूछा.आपने सब अपने मन से लिखा.''
    ''सड़क को देखकर पूछूँतेरा रंग क्‍या है? डामर के साथ क्या मिलाया? ये तो बेवकूफी होगी न. क्योंकि ये सब मेरको मालूम है. मालूम है तुम लोग वनवासी होते हो. झाबुआ,भूरिया तो तुमने बताया बाकी तुम्‍हें देख सुनके सब लिख लिया तो क्‍या गलत लिखा मैंने?'' मेरी खिल्‍ली उड़ाने, अपने आपको सर्वज्ञानी समझते हुए उसका अंहकार बोला. मेरे बदन पर मेरे दिमाग में अपने अधूरे गंदे ज्ञान को डलवाने की कोशिश, सर्वे करने वाला कर रहा था. उस किचड़ को साफ करने के इरादे से पूरी मजबूती से मैंने कहा,‘’आपने मेरा धर्म अपने मन से मान लिया. मेरे सरनेम से आपको पता चल गया कि मैं कौन हूँ?आपको पता है कि झाबुआ में सफाई करने वाले का भी सरनेम भूरिया है.टोकरी बनाने वाला भी भूरिया है.तीर चलाने वाला भी..फिर कैसे तय कर लिया कि मेरी जाति क्या है? आपने मेरी भाषा क्‍या हैयह तक नहीं पूछालिख दियाहिन्‍दी. मुझे अपनी भाषा लिखवानी हैमेरी भाषा भीली है. भीली और मैं आदिवासी हूँ. भील.भील लिखिए.''
    वो समझ गया. पेन निकालकर बोला,''अपना क्‍या जाता हैजो सामने वाला लिखवाता हैवो लिख लेते है. टाईम खोटी नहीं हो इसलिए झटपट लिख लिया. बुरा मानने की तो कोई बात ही नहीं है. इस तरह बोलने की जरूरत ही नहीं थी कोई.'' उसके भीतर का संचित ज्ञान टूटने का अहसास उसके चेहरे से,उसकी आवाज से महसूस कर रहा हूं. अपने आपको मजबूती के अहसास की राह पर चलता देख रहा हूं.
    ''मैंने कहा चाय पियेगें?''
    ‘’भोत कुछ पिला दियाअब कुछ नहीं पीना है, धन्‍यवाद श्रीमान आपका. आप तो यहां सब पढ़-पूढ़कर साईन करों दो बस.'' इस आदमी का चेहरा हाव भाव देखकर लगा कि ये जस्ट डांस का एक प्रतिभागी है,जिसे अपनी प्रस्तुती पर शाबाशी नही मिली और इसलिए नाराज सा हो गया है.मुझे लगा मेरे आसपास न जाने कितने लोग है जो जस्ट डांस करते है या करना चाहते है.उन्हें लगता है कि लोग उनके बारे में पूछे,बात करे और शाबाशी दे.वे किसी की तारीफ़ नही करेंगें.ढंग से बात नही करेंगे लेकिन चाहेंगे कि सामने वाला उसके सामने बिछ जाए.दरी चादर बन जाए.
          घर के भीतर प्रेमशंकर से एनडीटीवी कह रहा है,"जीत गए अन्‍ना जीत गया इण्डिया.जश्‍न मनाओ दोस्‍त ने कहा.उसने बताया कल सुबह १० बजे अन्‍ना का अनशन टूटेगा. स्‍टार न्‍यूज ने आधी जीत का जश्‍न बताया है.मैंने कुछ नहीं कहा. देश जीत गयाइस पर अटक गया था. यह कौन सा खेल है और देश के नाम पर क्‍यों खेला जा रहा हैपूछना था लेकिन यह दौर ऐसे सवालों को सुनने वाला नहीं है.यहां जवाब नहीं मिलेंगे ऐसे सवालों के बस वे जो कह रहें हैं.मान लो जैसे  टीचर ने मान लिया था.उसके बारे में सब कुछ. अब लोग टीचर में बदल गए है और मेरा दोस्‍त टी.वी. बन गया था जो नाच रहा हैनचवा रहा है.सारा जंहा डांस कर रहा है सब कर रहें हैं डांस. समाचार डांस के इस रियलिटी शो का सीधा प्रसारण देखने की बजाय मैं मनोरंजन चैनल पर जस्‍ट डांस देखने लगा कि याद आया पिछली बार इस शो में एंकर ने जज वैभवी से कहा था आप स्‍टेज पर आकर डांस करें तो नहीं मानी वैभवी जो दूसरों को नचवाती है कि एंकर कहता है, "सारा देश चाहता है. ये पब्लिक है और आपको डांस करना पडेगा.देश की बात सुनकर वैभवी डांस करती है.
          इतवार की सुबह में उजाले में मैंने साईन कर उसे धन्‍यवाद कहा.प्रेमशंकर अपने घर गया.नहा धोकर खाना पकाना शुरू ही किया था कि दरवाजा खटखटाने की आवाज आई.फिर उसकी याद आते ही मुस्कुराहट छा गई.गिलकी काटते काटते चाक़ू हाथ में लेकर खडा हो गया.
       "मैं.मैं से तत्‍काल अन्‍दाज लग जाता है ये चपरासी, चौकीदार, घरेलू नौकर, सारे काम करने वाला गुलाब.गुलाब नाम है इनका. दरवाजा खुलते ही गुलाब बोलता है ''सेठजी ने बुलाया है.''
      एरिया मैनेजर को ये आदमी सर,साब नही बोल पाया.उसकी निगाह में ये सेठ है.सेठ...हंसी आती है लेकिन उससे सवाल करता हूँ,"क्‍यों?"
    ''नी पता बोले जल्‍दी बुलाके ला जैसा है वैसा ही. टेम नी करने का बोला.उसकी आवाज में सेठजी का हुकुम था. उसके शरीर में नौकर का अहसास था. उसकी आंखों में हुकुम तामीली सफलता पूर्वक पूरा करने का अनुरोध था. विनय था नम्रता से लाचारी थी.उसे इस तरह से भरकर भेजा गया था कि वो यहां वहां से तरह तरह से बिखर रहा था. संभलते नहीं बन रहा था उसे. बस यह हाव भाव थे कि मुझे उठाकर साथ में ले आना. उसे देखकर सिर्फ पानी पिया और ताला लगाकर अपनी मोटर साईकिल पर उसे बैठाकर निकल गया.
    खेत में बसी नई कॉलोनी में है हमारे एरिया मैनेजर का नया मकानबंगला.जिसे सडक कहा गया था वो  बरसात में बह गई है. खेत की काली मिट्टी का किचड़ है. जा नहीं सकते. किचड़ में फंसने और गंदा होने के डर के कारण में बाइक कोने में खडा कर देता हूं. साबुत जगह को देखता हूं पैर रखता हूं गुलाब की निगाह साबुत जगह नहीं देख रही है.वो अपने  प्‍लास्टिक के जूतेके साथ किचड़ की परवाह किये बिना आगे निकल जाता है. वक्त से पहले पहुंचकर दिखाना है सेठजी को कि देखोजो हुकुम दिया वो कर आया. आदेश का पालन कर लिया. उसकी तरफ नही देखता है एरिया मैनेजर.वो मोबाइल पर भड़भडा़ रहा है. उसने गुलाब  के विजयी भाव को देखा ही नहीं और मोबाइल कान से हटाकर पीठ की तरफ कर बोलता है, "अरे वो नालायक भूरिया कहां है?"
    उसकी तल्ख आवाज मेरी कानों में पडी. लगा जैसे वो गुलाब को समझता है, वैसा ही मुझे भी समझता है. तभी तो इतनी बेअदबीइतनी वाहियात ढंग से बोला.मेरे सामने हमेशा मीठा बोलने वाला मेरा हित चिंतक मुझे क्या समझता हैकुछ टूट गया.वो बोलते बोलते दरवाजे के पास आया.उसने देखा.झेपा.कुछ गलत हो गया का अहसास उसे हुआ.उसने कहा,"अरे आकाश... सॉरी यार इतनी सुबह तुम्‍हें कष्‍ट दिया. आय एम रियली सॉरी. किंतु बात ही कुछ ऐसी थी कि बुलाना पडा. तुम तो जानते हो यहां तुम्‍हारे सिवा मेरा कौन हैएरिया मैनेजर का पोर-पोर माफी, विनम्रता और मेरे सिवा और कोई न होने के कारण अपना होने का अहसास दिलाना चाह रहा है. इसका मुझ पर असर नहीं पडा. चांटे के बाद गाल सहलाने से दिल के भीतर की टूटन इतनी आसानी से नहीं जुडती.
    "प्‍लीज यार.कार स्टार्ट नही हो रही है और अर्जेंट जाना है.तुम्हें पता ही होगा.दूसरी आजादी मिल गई है.सेलिब्रेट करना है.दिल्ली में वो ज्यूस पियेंगे इधर हम भी ज्यूस पियेंगे..अंगूर का....चलो जल्दी करो.तुम दोनों कार को धक्‍का लगा दो. मै स्‍टार्ट करता हूं. जल्‍दी... प्‍लीज जाना है.विनय और परेशानी के हावभाव के साथ बोलते बोलते वो वो कार की चाबी लेने घर के अंदर जाता है.लगता है  ये भी डांस कर रहा है.जस्ट डांस करों और करोड़ जीतों,देश को जीत लो.बस एक डांस.सोचता हूँ और चुप होकर  बाहर खड़ा हो जाता हूँ.मेरे साथ गुलाब भी खड़ा है,जमीन में नजर धंसाकर.उसकी नजर उप्पर उठ जाए कि गुलाब से पूछता हूं, "कहाँ जा रहे है साब?"
    " नी पता. बोल रहे थे दोस्‍तों के साथ कोलार डेम निकलना है. पाल्टी  है."
    काटो तो खून नहीं का अहसास हुआ, अरे ये कौन सा तरीका है कार को धक्‍का लगाने के लिए और वो भी पिकनिक के लिएसुबह सुबह बुलाया. मैं समझ ही नहीं पाया.तभी वो हडबडाता हुआ नाचता हुआ आया और बोला," तुम दोनों धक्का मारो. मैं स्‍टार्ट करता हूं."
    "कार मैं भी चला लेता हूं. स्‍टार्ट मैं करता हूं.मैंने चाबी के लिए हाथ बढाया तो एरिया मैनेजर का चेहरा फक् से उतरा गया.
    "क्‍या बात करता हैतू धक्‍का लगा मेरे दोस्‍त.मुस्कारने की असफल कोशिश करते हुए बोला.
      "धक्का आप लगा लो. स्‍टार्ट मैं करता हूं.’’ मै अडिग था. मेरे इरादे स्‍पष्‍ट थे. किचड़ में खडे होकर पीछे से धक्‍का लगाते हुये किचड झेलने का मन नहीं था. इस आदमी ने जिस तरीके से नालायक कहा है वो पता नहीं मुझे क्‍या समझता है.उसे देखता हूँ वो हक्‍का-बक्‍का है. उसे समझ नहीं आ रहा कि मेरा मातहत, मेरे से नीचे वाला ये भूरिया कैसे ऐसे बोल सकता है. मैं समझ चुका था इस आदमी की निगाह मेंमैं झाबुआ का आदिवासी हूं जो मजदूरी करता है. सुबह हो या रात बस मजदूरी. हर बात मानने वाला और अब नहीं मान रहा है.
    वो कुछ सोच रहा था कि बोला, "रहने दो आकाश. तुम जाओ.मुझसे नजर मिलाये बगैर वो अपने घर के भीतर घुस गया. उसे अभी भी उम्‍मीद थी कि मै कह दूंगा, ठिक है धक्‍का लगाता हूं लेकिन मैंने कहा नहीं.
   ‘’गुलाब, चल भाई.कीचड़ में कब तक खडा रहेगा?’’ मैं कहता हु.
वो झिझकता है.हाथ के इशारे से उसे बुलाता हु.गुलाब कीचड़ से बाहर निकलने के लिए कदम उठाता है.
.....
‘’सत्यापन’’कहानी संकलन 2013 में आधार प्रकाशन से आया.
(हंस के जून 2017 अंक में)



Monday, June 5, 2017

गोलमेज



            
                       
         ''ओ खसकेल..भाग जल्दी वरना तेरको भूत ले जायेगा.उड़ाके..उप्पर...आसमान में.  चल रे भूतालिया आ गया.''चौथे को अनसुना कर पहला गोल गोल घूमती हुई हवा देखता रहा  जिसमें कागज, पोलीथिन ,कचरा,धूल और बहुत सा कुछ उड़ रहा है.तभी उसे लगा वह भी उड़कर देखे.उड़ने की ख्वाहिश में उस तरफ भागा और घुमती हुई हवा में घुसने की कोशिश करने लगा लेकिन भवरे की तरह घूमती हवा गोलाकार होती हुई तेजी से दाई तरफ बढ़ने लगी .उसके पीछे पीछे पहला भागने लगा. धूल के साथ साथ कंकड भाग रहे है.पहला, धूल हवा कंकड़ की मार खा रहा है.उसे लगने लगा उसकी जिंदगी में कंकड़ इस तरह न आये तो वह उड़ लेगा दूर आसमान में,नीले आकाश में,उड़ते बादलों में, पतंग की तरह.उसे देखकर चौथा फिर चिल्लाया, ’’पगलेट...मरेगा क्या?’’अभी भी पहला रोमांचित है.नहीं सुनता. उसका मन उड़ान यात्रा में है.हवा तेज गति से दोनों तरफ से आई थी.आकर कसकर आलिंगन किया.पलभर में ही सम्पूर्णता का अहसास कर दोनों दिशाओं की हवा मिलकर उड़ने लगी.जहाँ जाती वहां पर जो होता,उससे मिलती और ले जाती.जिसे अपने साथ ले जाना संभव नहीं होता उसे अहसास करा देती कि हम तो चले है, चल सको तो साथ हमारे चलो.यही पर ऐसा ही कुछ सुन रहा है  पहला.कोई सपना कभी दिमाग  में रखा था उसे हकीकत में बदलने के लिए वह गोल गोल नृत्य करती हवा आकाश की तरफ जा रही है, में,घुसने के लिए भागने लगा.हवा गोल आकार को विस्तार देने लगी. धूप खाने के लिए लटके हुए कपडे भी उड़ने लगे.किधर जाऊ क्या करू? सूझ नहीं पड रहा है,फैलती और लम्बी होती आकाश की तरफ बढ़ने लगी हवा. सफ़ेद कपड़ों में लिपटी औरत इसी तरह उडती हुई समुन्दर के किनारे पहुच गई थी,तेरे इश्क में हय..तेरे इश्क में.... तेरे इश्क...
       चौथा उसकी कॉलर पकड़कर खींचता हुआ ले जाने लगा.पहला हवा के साथ दौड़ते हुए  आसमान में जाने की चाह में था लेकिन अब हवा दूर होती जा रही है और उसके साथ आसमां में जा रहे है धूल,कागज ,पोलीथिन,कुछ कपडे. उडनेवाले ओझल होने लगे तो पहला अब पेड़ों को देख रहा है.उसे पूरी तरह से सुनाई दे रहा है पेड़ों के गाने.आपस में पेड़ों को चिल्लाते हुए नाचते हुए महसूस कर रहा है .भूतालिया चला गया लेकिन हवा तेज चल रही है. पहला चल रहा है जैसे सफ़ेद बादल.सीमेंटेड सडक बेहद चौड़ी है. इतनी कि क्रिकेट,सितोलिया जैसे खेल खेले जा सकते है.उसे सडक आसमान की तरह विशाल लगी.सड़क किनारे मकानों के सामने और भीतर कार ही कार है.किनारे खड़ी कार के पास फुटपाथ के बीच में पेड़ ही पेड़ है.कोई भी बच्चा नहीं जान पाया उन पेड़ों के नाम.पत्ते है उनमें,लेकिन न फल है न फूल. किसी पेड़ के पत्ते ही ऐसे है कि उन्हें फूलों की जरुरत नहीं.जब फूल का काम पत्तियां करे तो फूल के पेड़ को क्यों रखे? पहला पेड़ों को और चौथा दूसरे और तीसरे को देख रहा है, बोल रहा है,चिल्ला रहा है.दूसरा और तीसरा,कोने में खड़े हो गए है.
        वे चार है,नौ से उप्पर और बारह तक की उम्र के. घर मोहल्ले की रेंज से बाहर के एरिया में उछलते कूदते हुए अपना मन का किया करते है.सभी की हाईट कमोबेश एक जैसी ही है.घरवालों को फुरसत न मिली कि उनकी उंचाई नापते या देखकर अंदाजा लगाते.स्कूल से तो खैर उम्मीद ही नहीं है.पहला और तीसरा पढने में तेज है,ऐसा दूसरे और चौथे को सुनाया जाता था.डरा डराकर नसीहत दी जाती थी कि उनके जैसा पढ़.पहले और तीसरे को उन दोनों से दूर रहकर मन लगाकर पढ़ने की हिदायत उनके घर के भीतर घूमती रहती.चारों ने घरवालों की हिदायतों को कभी नहीं माना. अपने मन की मानी.आज जब निकले तो दिमाग के भीतर कोई प्लान या टारगेट नहीं था,हमेशा की तरह.न ही चलते हुए गा रहे थे.तीखी धूप को गाली देकर सफ़ेद बादल आकाश को कैद करने लगे तब चौथे ने चिल्लाकर कहा,’’भागो रे...कौन सबसे आगे जाता है...भागों ...’’पहला वाला बादलों में खोया था.वह कैद करने का  तरीका समझने में लगा था.वह अक्सर इसी तरह सोचता और उसमें खो जाता.वह हवा को भी समझने में कई घंटे लगा देता.चेहरे से, नाक से अपने भीतर के फेफड़े से अंदाजा लगाता.सवाल अपने से करता.वो अँधेरा, यह हवा किस तरह आती है,धूल क्यों फटाक से उठकर हवा के संग संग जाती है.कई चीजें,कई बातों में खो जाना,उसकी फितरत बन गई.
        ''अबे रुक...देख आम का पेड़.''पहला खुश होकर बोला गोया की प्यारा दोस्त दिखा हो.सडक किनारे फुटपाथ के पास में है आम का पेड़. दीगर पेड़ की लाइन इससे दूर है.फुटपाथ पर मकानों की जालियों,गेट और उससे आगे पेड़ों की लाइन है.’’तो .’’चौथा बोला और उसने आम के पेड़ में लटके हुए बहुत सारे कच्चे आम देखे. बढ़ते हुए आम.उन्हें अपनी उम्र की दहलीज पर खड़े दिखे.तीसरा बोला,गद्दर है. चौथा बोला कच्ची कैरी और जमीन से लगभग उछला जबकि पहले वाला आम का पेड़ है, यही सोचकर आल्हादित हुआ.उसने अपने साथ पत्तियों का होना महसूस किया जो उस वक्त हवा के साथ मस्ती कर रही है.चौथे ने दूसरे को जल्दी आने के लिए आवाज लगाईं और पेड़ पर सरपट चढने लगा.दूसरा भागकर आया और जैसे तैसे पेड़ पर चढ़ गया. 
       किसी बंगले का कोई खुला हुआ दरवाजा हवा के कारण बज रहा है.किसी बंगले में फ़र्श रगड़ते हुए धोने की आवाज आ रही है.बंगले से बच्चों-बड़ों की न आवाज आ रही है न ही उनकी परछाई दिख रही है.सब बंद है.पाश कालोनी है.इसी वक्त किसी लोहे के दरवाजे से एक बड़ा कुत्ता निकला.कुत्ते को  देखते ही डर गया पहला.पहले के अलावा किसी का ध्यान इस तरफ नहीं है.दोनों उप्पर है और तीसरा उन्हें देख रहा है. तीसरे को पहले ने कुत्ता दिखाया.कुत्ते को देखते ही तीसरा बुरी तरह से डर गया.हो न हो उन्हें भगाने लिए कुत्ते को भेजा हो.उसकी आवाज बंद हो गई.पहले ने आवाज लगाईं.’’नीचे उतर..चल बे.''दरवाजे को बंद कर लड़की निकली.उसने कुत्ते के गले में बंधी चेन पकड़ी हुई है.तीसरे ने झट से लडकी को पहचान लिया,अरे ये तो अपने मोहल्ले की है. पांचवी गली में रहती है.तभी तीसरे को लगा वह तो चारों में सबसे बड़ा है.उसके इस दावे को खारिज किया जाता था हर बार.बड़ा नहीं माना गया उसे लेकिन फिर भी वह खुद को सरकारी कागज के आंकड़ों के आधार पर बड़ा मानता रहा.इसी तर्क के आंकड़े ने लड़की को देखा और देखता रहा.लड़की के हाथ में मोबाइल है दूसरे हाथ में कुत्ते को कंट्रोल करने वाली चेन.लड़की का नहीं है मोबाइल. मालकिन ने दिया है.इतने महंगे कुत्ते को लेकर लड़की कहाँ पर  है?यह मालकिन घर के भीतर लडकी को देखे बिना जानती है.मोबाइल में जीपीएस सेट है.लडकी जहाँ जहाँ जायेगी उस जगह को मालकिन  अपने मोबाइल में देख सकती है.वह कुत्ते को घर से बाहर ही करवाती है.कुत्ता चार पांच चक्कर लगाने के बाद अपनी तयशुदा जगह पर करता है.करने का यही वक्त है लेकिन कुत्ता बच्चों को देखकर असहज हो गया.कुत्ता भौंका नहीं जैसे कि दोनों बच्चों को आशंका थी. अपनी बाउंड्री से बाहर अजनबी को देखकर नहीं भौंका करते है, बड़े मकानों के कुत्ते.क्या लेना देना पडौसियों से?मालिक का अनुसरण कर रहा है कुत्ता या कुत्ते का अनुपालन मालिक?
       कुत्ता इधर उधर जाता है,सूंघता है.लड़की को अच्छा लगा कि सुनसान रहने वाली गली में कोई आया है.सड़क पर है एक उम्मीद.तीसरा उसे देखता जा रहा है.पहले ने सोचा, दुबली पतली लड़की ने इतने खतरनाक  कुत्ते को कंट्रोल में कैसे रखा?उसकी कोई बत्ती जली, लडकियां कितनी जल्दी सीख जाती है कुत्तों को कंट्रोल में रखना..और पहला,तीसरे को देखकर मुस्कुराया.
             टहनियों से चिपके हुए दोनों बच्चे मौज मस्ती कर झूमते पेड़ के साथ झूम रहे है.पेड़ पर इस तरह झूमने का यह अलग अनुभव रोमांच दे रहा है.आम को देखते ही पकड़ते,तोड़ते और नीचे कैच करवाने के लिए फेंक देते.पेड़ पर कई आम को वे पकड नहीं पाते.एक हल्का सा स्पर्श होता और टहनी आम को दूर ले जाती.एक स्पर्श की चाह में ताकता हुआ तीसरा मन ही मन बोला,गद्दर है.पहले ने उप्पर देखते हुए कहा,''उतर बे. भोत हो गए.चल बे चल.''पेड़ पर चढ़े  दोनों सारे आम तोड़ने के सपने को हकीकत करने में लगे है.वे जवाब तक नहीं दे रहे है.चौथा आम तोड़कर बोला,’’ ले पकड़...’’तीसरा उस लड़की से बात करना चाहता है. लडकी हायर सेकेंडरी में पढती है.
       खिडकियों को बंद करने की खडखडाहट के साथ किसी की तेज भागती  घालमेल होती भुनभुनाती आवाज है,जो सूखाने के लिए डाले हुए कपड़ों  को उतारने के साथ आ रही है. कामवाली बाई से उम्मीद करती हुई कि उसे तो पता होना ही चाहिए. तेज हवा का सीजन है,तो कपडे ऐसी जगह न डाले...इसी उम्मीद में बडबडाती स्वर लहरियों के बीच इस मकान के मालिक की नजर नुकीले लोहे की जालियों में से बच्चों पर पड़ी.पहले ने आगाह किया,’’भोत टेम हो गया.चल.अबे इत्ते सारे आम कैसे ले जायेंगे?’’
      ''तेरी बुशट उतार...तू तो छोड़ बे.ओ तेरी बनियान हाँ हाँ टीशट उतार.उसका मु बंद कर.फिर सारे आम उसमें डाल देंगे...अबे तू सुन रिया क्या #$%^.''ऊपर से तीखेपन से तीसरे पर चौथा चिल्लाया जिसमें उम्मीद थी.घर था.मां थी.भाई बहन थे.शाम थी. रोटी के साथ अचार था,टेस्टी वाला.पहले वाले के पास चिंता थी.फ़िक्र थी दोस्तों की.तीसरे का मन नहीं है इस आदेश को मानने का.कई कारण इकठ्ठा हो गए उसके पास.लड़की का होना,फिर बड़ा होकर भी छोटे की बात मानना,टीशर्ट का नया होना. कल ही नंदा नगर से टीशर्ट खरीदी थी उसकी माँ ने.जामुनी रंग के आधे हिस्से के बाद फीका हरा रंग और जो डिजाईन है वह ‘’क्रास‘’जैसी है.लड़के को टी शर्ट के ख़राब होने और फटने का भी डर सताने लगा.उसने कहा,मै नी देता ..जा.’’
     ’’ठीक है मत दे,कल से अपना थोबड़ा भी मत दिखाना.भाग स्साले..चल तू ही शट उतार.’’चौथा कड़का.निशाना सीधा लगा.तीसरे ने गाली देते हुए अपनी टी शर्ट देखी. उतारे या नहीं..उसने लड़की को देखा और सलमान खान की याद आते ही टीशर्ट उतारकर उप्पर उछाला ..ले ..लेले.’’
         पहला टीशर्ट की गरदन दोनों बाहों से बांधकर आम डालने लगा.‘’उतर उतर,वो देख.’’धीमी सतर्क आवाज में कातरता है.लड़की के चेहरे पर परिचित से लडको के प्रति सहजता है लेकिन उसके साथ वाला कुत्ता अभी भी असहज है.पहला कुछ आम भरकर टीशर्ट का मुँह बंद करने की जदोजेहद में लग गया.रस्सी बांधने से ही मुँह बंद होगा लेकिन रस्सी नजर नहीं आ रही.रस्सी जैसा कुछ दिख जाए मिल जाए...सोचते हुए उसकी नजर सड़क किनारे के कचरे में चली गई.
    लोहे का दरवाजा खुलते वक्त चुप है कि चप्पल भी बेजुबान हो गई.पहले वाले को इस खामोशी पर ताज्जुब हुआ. उसके घर की गली में इंसान के चलने की आवाज घरों के भीतर,गली के मोड़ पर बाआसानी सुनी जाती है.इनके घर,दरवाजा और चप्पल की तरह ये भी चुप ही रहेंगे, यह सोचकर पहले की आवाज का वाल्यूम बढ़ गया.’’मकान वाली..उतर बे.’’बंगले के दरवाजे से बेहद धीमी आती हुई महिला,क्रीम रंग पर निचुडा हुआ बैंगनी रंग के फूलों से भरा गाउन को हल्का सा उठाती हुई आ रही.पैर उठाने का संघर्ष कर रही है.पैरों में गाउन उलझ न जाये,चलते हुए फिसलने का भय है या बाहर बच्चों की शक्ल में चोर लुटेरे होने की आशंका जो वृद्ध की हत्या के पुराने समाचार से गाढ़ी और ताज़ी हो गई.ठीक ठीक समझ नहीं पाया पहला. उसे लगा,जितने जल्दी हो निकल जाए लेकिन न रस्सी मिली न इतनी ताकत जो आमों को लेकर भाग सके.तीसरा आ गया पास में. कही हताशा थी कि खामोश होकर लड़की को ही देखता जा रहा है.रेंज से बाहर ही है लड़की.कुत्ता सार्वजनिक रूप से सार्वजनिक जगह पर मल विसर्जित नहीं कर पा रहा है और लड़की को देर हो रही है.लड़की ने सलवार सूट पहना है,जिसका रंग डार्क होने से समझ नही आ रहा है.सूट गंदा नहीं है लेकिन इस तरह के रंगों के बारे में लोग सोचते है ये गन्दा होने पर भी गंदा नहीं दिखता. कुछ चीजें बाते ऐसी ही होती है,जिसके बारे में बहुत कुछ ऐसा ही सोचा जाता है,जैसा वह होता ही नहीं.
         पहले वाले ने देखा इसी लोहे के दरवाजे के पास काले रंग के चमकीले पत्थर पर सुनहरे रंग से लिखा है,गोदकर. बड़े अक्षर में, 
                                      ‘’मंगल मूर्ति
                                        मोहन माहेश्वरी
                                                                               ,डीबी स्कीम नं.५४
 इसी दरवाजे से बाहर आती हुई महिला को पीछे छोड़ते हुए लाठी के सहारे तेज क़दमों से वृद्ध आ रहा है.मतलब ये मोहन माहेश्वरी है.मतलब ये आगे आयेंगे मतलब इनसे बोलना होगा यानि क्या बोले?इस प्रक्रिया में लग गया पहला.पेड़ से उतरकर तोड़े हुए आम की हिफाजत करने के लिए चौथा आगे आया.किसी मकान के गंदे कपडें और झूठे बर्तन के साथ धूल को भगाकर तेजी से आती हुई महिला दिखी जो पिछली गली की है. जान पहचान वाली होने से तीसरे ने अपने भीतर साहस को देखा.पहले को अजनबी पेड़ों में आम का पेड़ अपना लगा था वैसे ही लगी महिला.बिना आवाज दिए बिना बुलावे के आ गई.महिला ने आते ही बिखरे हुए आम को इकट्ठा करना शुरू कर दिया. गजब की फुर्ती और तेज दिमाग की मालकिन को देखकर पहला आसपास के मकान देखने लगा, पडौस में दीवार पर टांगे हुए पतरे के बोर्ड पर है,ठा.दौलतसिंह शक्तावत,कुंडला हाउस.सामने है अग्निहोत्री भवन.उसके पास राधा कृष्ण मंदिर सडक के खत्म होने वाली जगह पर दिगम्बर जैन मंदिर है जो राधा कृष्ण मंदिर  से कई गुना ज्यादा भव्य है .तभी पास आ गया मकान से निकला हुआ आदमी.महिला ने साड़ी के पल्लु को पेट की तरफ खोंसकर बिखरे आम को डालना बंद किया बाकि आम टीशर्ट में डालती हुई बोली,’’चलो.. ऐसे ही दोनों मिलके उठाओं.’’ खुले हुए मुँह को पहले ने पकडा दूसरा छोर दुसरे ने पकड़कर उठाया.तभी वृद्ध ने कहा,’’येss.. ये ss..रख आम इधर.ओ तेरको ही बोला है..निकाल आम.’’ वृद्ध में भारी गुस्सा भरा हुआ है मगर मानने को कोई तैयार नहीं है.
    ’’ये आम कैसे तोड़ लिए है? अपना बाप का माल समझ रखा है?आम यहीं रखों.’’झुकी हुई कमर के साथ लाठी के इशारे से बोलते वृद्ध के सिकुडे हुए बदन पर कुर्ता है.एक बच्चे के एक धक्के से वृद्ध को गिराकर भाग सकते है,दूसरे ने सोचा और शरारत से भर गया.यह सब जानते है कि आम उठाकर ले जाए तो वृद्ध उन्हें रोक पाने में शारीरिक रूप से असमर्थ है.यह वृद्ध भी जानता है.बच्चे और महिला को लगा बोलबालके मामला निपटा देते है.
   ‘’उधर क्यों रखे आम?’’ चौथे ने आते ही बोला,उसके हाथ में टेलीफोन का काला तार है. उसे रस्सी बनाने का इरादा लेकर आया है.
  ’’सीधे तरीके से बोल रहा हूँ मान लो.आम यही रखके भागों यहाँ से.’’ ‘’नी जाते.अब  बोलो.’’चौथा बोला तो वृद्ध ने कहा,’’पुलिस को बताता हूँ,अभी. ‘’वृद्ध के चेहरे पर चमक बढ़ी कि डर के हथियार से बच्चों की हिम्मत काट रहा हूँ कि रीढ़ की हड्डी सीधी होने का अहसास होने लगा.‘’यही रख.’’लाठी से दिशा और जगह बताते हुए बोले वृद्ध.ये पिद्दी बच्चे मान क्यों नहीं रहे उसकी बात,सोचा और पेड़ को देखने लगे.
   ‘’नी रखना.’’चौथे ने काले तार को सीधा करते हुए कहा.
    ‘’रख..वरना?’’वृद्ध ने अपनी आवाज में धमकाहट लाते हुए कहा तो तत्काल चौथा बोला,‘’वरना क्या?’’चौथे की आवाज से निकली ध्वनि.आँखों के भीतर का ताप इतना तेज है कि वृद्ध को लगा अब बोलकर डराना आसान नहीं फिर भी पत्नी से कहा,’’अरे जरा मोबाइल देना मेरा.’’ जिसे सुनना था वह सुन नहीं पाई. तभी आम की तलाश में निगाह डालती महिला बोली,’’ बाबूजी जाने दो.आम तो हवा से गिरे है.हम नी ले जाते तो कोई भी ले जाता.आम ही तो है.’’
   ‘’आम है तभी तो.पत्तियां ले जाते तो कुछ नही बोलता.जानवरों को खिलाते तो पैसा और पुण्य  मिलता.’’वृद्ध बोला तो पहले ने कहा,’’आम के पत्ते जनावर नी खाते.’’
       ‘’तू चुप कर.अरे आम के पत्ते ले जाओ.घर के दरवाजे पर पत्तों की माला लटकाओ. बरकत बढ़ेगी.पैसा आएगा तो ऐसे भटकना नहीं पड़ेगा.जाओ मंदिर में प्रसाद लो.भगवान का आशीर्वाद लो.हाथ जोड़कर माफ़ी मांगों भगवान से कि अब चोरी नी करेंगे.भाग्य सुधर जाएगा.भाग्य.’’ वृद्ध असफल हो चुके थे.सम्मानजनक तरीका अपनाना चाह रहे है इसलिए उनकी आवाज में मृदलता आई.
      ‘’चोरी..? किसने की चोरी? हमने नी की चोरी.नी जाना मंदिर.नी लेना प्रसाद वरसाद. चलों रे.’’चौथा बोला तेजी से.
     ‘’चुप..अधर्मी.बुजुर्ग से ऐसा बोलते है?ये पाप है.पाप करे और माफ़ी न मांगे भगवान से.नरक मिलेगा नरक.’’गुस्सा आ गया फिर वृद्ध को.
     ‘’बच्चों से ऐसा बोलते है? वैसे भी अभी कौन से स्वर्ग में है?आप हमारी चिंता मत करों.’’पहले ने अपनी खामोशी को हटाकर गुस्से को पीते हुए कहा.
       ‘’अभी लगाता हूँ मोबाइल.चौराहे पर होगी पीसीआर.एक मिनिट में आएगी और ले जायेगी थाने.वही बताना चोरी की थी कि नहीं. ओ बाई तू समझा ले नादान को.इसके चक्कर में सब जायेंगे जेल.जेल से निकलना मुश्किल कर दूंगा.’’वृद्ध ने डराने के लिए आवाज में कडकपन और भरोसा भरकर कहा.डर के साथ भ्रम हावी होने लगा,पहले और चौथे को छोड़ बाकि पर.तभी महिला बोली,‘’कोई चोरी की?डाका डाला,जो इतना डरा रहे हो सेठजी?अरे आम ले जा रहे है.धरम मंदर परसाद की बात करते हो तो समझों तुमने पुन्य कर डाला.इतने  बडे मकान वाले को कायकी कमी?’’
    ‘’ये झाड तो तुम्हारा नी है,फिर ये आम तुम्हारे कैसे?’’महिला के बोलने के बाद तत्काल चौथा बोला तो वृद्ध के चेहरे की चमक उतरी लेकिन इतने आगे आ गए कि अपनी बात से पीछे जाना मुश्किल लगा इसलिए हार न मानते हुए कहा,’’ये पेड़ मेरा है.मैंने लगाया है मैंने मेहनत की है.जो लगायेंगा,वही खायेगा.जो खायेगा वही मालिक होगा.आई समझ में ?’’
    ‘’ये जगे सरकारी है.सरकारी जगे के झाड भी सरकारी है. सरकारी झाड के आम भी सबके है.’’चौथे ने कहा जबकि उसके दिमाग में चल रहा है कि कच्चे आम से वृद्ध का सिर फोड़ दे, अब सहन नहीं हो रहा है उसे.ये बातों से समझ नही रहा है. सरकार की तरफ से काटी गई कालोनी में सड़क के दोनों छोर पर जालीदार गेट लगाकर बोर्ड पर लिखा गया,यह आम रास्ता नहीं है. ये पूरी तरह से गलत है लेकिन कहे कौन.
    ‘’ये तो झूठ है.ये समझ लो तुम सब,मरते मर जाऊँगा लेकिन सारे आम तो नहीं दूंगा...अच्छा ठीक है,चलों ऐसा करते है,तुम्हारी जेब में जितने आम आ जाए उतने ले जाओं और बाई तू भी तेरे पास जितने है,उतने ले जा.बाकि बचे हुए आम यहाँ इधर रख.‘’वृद्ध मान चुका है ये आम नहीं देंगे इसलिए समझौता करना ही पड़ेगा.जितने भी आम मिलेंगे वह समझौते से ही मिलेंगे,यही सोचकर समझौते में महिला को ज्यादा फायदा देकर इस गठजोड़ को तोड़ने में विरासत से प्राप्त ज्ञान का सदुपयोग कर वृद्ध ने ख़ुशी हासिल की.
   ‘’हाँ हाँ ठीक है.चलो बे चलते है.’’आम तोड़ने ,भरने या बोलने में जिसका कोई लेना देना नहीं है उस तीसरे ने कहा लेकिन सभी ने अनसुना किया तो हताशा से भरी उपस्थिति दर्ज करवाकर तीसरे ने कहा,’’मैंने तो पहले ही रख लिए आम अपनी जेब में.और नी चीये आम.मै तो चला.मेरी टीशट दे ..चल शाम को मेरको दे देना.’’तीसरा जाने लगा लड़की को देखते देखते.
    ‘’तेरको जाना है तो तू जा लेकिन हम तो सारे आम ले जायेंगे.पुलिस को बुलाना है तो बुला लो.’’चौथा बोला.तीसरा रुका नहीं.चला गया.लड़की सब सुन रही है.वह कुत्ते का मल विसर्जन न होने के कारण दूर खड़ी थी.
    लड़की ने इसी साल स्कूल में पढ़ा था,गोलमेज सम्मेलन,पूना पैक्ट.सर की बात याद आने लगी थी.पूना पैक्ट को डिटेल में बताने की बात पर सर ने कहा था कोई मतलब नही ज्यादा समझने का.परीक्षा में दो नम्बर से ज्यादा का सवाल कभी नही पूछा जाता है.तुम लोग तो इतना सा याद रखों कि येरवडा जेल में डॉ.अम्बेडकर और गांधी जी में एक समझौता हुआ था जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है.ये गोलमेज सम्मेलन की असहमति के बाद का है.इसके बाद लडकी को घर में अपने कम पढ़े लिखे पिता ने पुरे विस्तार के साथ पूना पैक्ट बताया था.गांधीजी के आमरण अनशन में मरने की नौबत आई और कैसे दबाव में ये सब हुआ.लड़की की आँखों में पिता का चेहरा दिखने लगा.पिता बताते बताते चुप हो गए कि हमारे साथ धोखा किया गया.
   आम वाले इस मामले को सुनकर न जाने कैसे गोलमेज सम्मेलन याद आया. कुत्ते का शौच हो जाने के बाद लड़की को लगा, अब उसे इन लोगों के पास आ जाना चाहिए.
     वृद्ध ने चौथे को नजरअंदाज कर तीसरे को सुनाते हुए कहा,’’ये है समझदार..’’फिर दूसरे और महिला को देखते हुए कहा,’’चलो सब की बात छोड़कर ऐसा करते है.ये मेरा पेड़ है. जमीन मेरी है फिर भी आधे आम तुम सबको देता हूँ और बाकि आधे मै रख लेता हूँ. बस आधे...ठीक है.मैं तो तुम सब लोगों की भलाई चाहता हूँ.हमारे घर में झाड़ू पोंछा वाली बाई से पूछ लेना,वो बर्तन साफ़ करने आती है.वो बता देगी कितने दयालु है हम.हम बचा हुआ खाना फेंकते नहीं ,उसी दे देते है.अन्न का अपमान नहीं करते और तो और वो सड़क गटर साफ़ करनेवाले से पूछना उसे तो हर महीने पचास रूपये देते है. मैंने सबका भला कर उद्धार किया है.’’वृद्ध ने असफलता ढंकने के लिए साधू की तरह कहा.  
      ‘’पचास रूपये देकर कौन सा उद्धार किया है? कोई उद्धार नहीं किया है.आपकी जरुरत थी इसलिए ये सब किया है.’’लड़की के भीतर का गुस्सा अचानक ही निकला वो आते से बोली.लडकी को अनसुना किया वृद्ध ने और कहने लगे, ‘’सुबे सुबे झाड़ू लगाकर वो झाडूवाला गिरे हुए आम ले जाता है लेकिन कभी भी मना नहीं किया उसे ...अरे इतना उदार रदय है हमारा और ये छोकरी पता नहीं क्या क्या बोल रही है?चलो...न तेरी न मेरी.और अब अगर मेरी बात नहीं मानोंगे तो मजबूर होकर पुलिस को पडौसियों को गार्ड को सबको बुलाकर तुम सबको जेल में डलवा दूंगा. तेरको चोरी चकारी के अलावा आता क्या है?’’ नम्रता समझाइश से भरे समझौते का असर नहीं होता देख भय दिखाया.वृद्ध जानता है ये एक मोहल्ले के होकर भी सब अलग अलग गलियों के है,ये एक नहीं हो पायेंगे इसलिए फिर बोले,’’ये गली तुम्हारी है?ये मोहल्ला तुम्हारा है,आये कैसे इधर?’’
    ‘’ये आसमान तुम्हारा है?ये हवा तुम्हारी है? भूतालिया जैसी बात कर रहो हो.गोल गोल?’’पहला बोला तो जवाब ही नहीं सूझ पड़ा वृद्ध को.इसी बंगले की मालकिन अभी भी खड़ी है समझने के लिए कि सुनाई नहीं देता है बिमारी की वजह से लेकिन दरवाजे से आगे जाए या न जाए यह फैसला नहीं कर पा रही है.घर की दहलीज लांघकर कभी नहीं बोली मालकिन.अब इस उम्र में आकर पति से बोलना चाहती है, आ जाओं..जाने दो लेकिन जबान निकलने से पहले इजाजत चाह रही है.तभी लड़की ने कहा,‘’बाबूजी ये आम का पेड़ आपने नहीं लगवाया.मेरी माँ इस्सी गली में काम करती थी बरसो से.वो बताती है,यहाँ पे जब कोई मकान नहीं बना था तभी से है आम का झाड.अपने आप उगा था. इसलिए पेड़ पर न तो आपका हक़ है न जमीन आपकी है.आप याद करोगे तो सब याद आ जायेगा.’’ लड़की ने इधर उधर होते कुत्ते को कंट्रोल करते हुए कहा.
      लडकी की बात सुनकर  वृद्ध तैश में आकर बोले,‘’तू कौन होती है बीच में बोलने वाली?तू तो हमारे बीच बोल ही मत.’’इस सड़क पर जैसे आम जन आ नहीं सकता वैसा ही दो के लफड़े में तीसरा नी टपके,यही सोचा वृद्ध ने लेकिन लड़की उतने ही अधिकार से बोली,’’बाबूजी ये मेरे मोहल्ले के है. मेरे है.’’ 
    ‘’तू तो चुप कर.पढ़ और पढ़ा ले लेकिन सड़क पर बोलेगी तो काम से निकलवा दूंगा.आई समझ में.’’आगबबूला हो गया वृद्ध.
     ‘’आपमें दम होगा तो निकलवा देना. डराना वराना मत.यह पूना नहीं  है कि बोलोगे मर रहा..मर रहा हु...बोलबोलकर समझौता करवा लोगे.ये जेल नहीं गली है गली..वह भी खुली हुई.लोहे के गेट लगाने भर से,गार्ड बैठाने से गली न तो बंद होती है न जेल बन जाती है.’’लड़की निर्भयता से बोली.उसके दिमाग में पिता की बातें थी.चेहरा था.दुबली पतली लड़की आम का मजबूत पेड़ लगी पहले को.वह देखता ही रह गया मगर वृद्ध लड़की की मजबूती से अनजान बनते हुए कहा,‘’पूना? फ़ालतू बात मत कर.चार क्लास क्या पढ़ ली, लगी चपर चपर करने.तू तो हट.चलो तुम लोग मान रहे हो या बुलाऊ पुलिस को?’’ वृद्ध ने आक्रमकता से डराना चाहा लेकिन उनका चेहरा बता रहा है, निराशा ही मिली लेकिन अब वापस जा नहीं सकते. चुप रह नहीं सकते.क्या करे?
   ‘’चार नहीं हायर सेकेंडरी में हूँ.जानती हु सब.सब आप जानते है.तब दया की थी हमारे बाबा ने और आपने धोखा.तब आपने बेजा जिद न की होती तो आज हम यहाँ खड़े नहीं होते. अपने घर में पढ़ रहे होते...यही बता दो ,अब कौन ले जाता है आम?ये पडौसी..इनको तो आप कुछ नहीं बोलते. बड़े लोगों को आप बोल ही नहीं सकते है और हमें ही ज्ञान दे रहे हो.पेड़ सबका है.आम सबके है. जो चाहे वो आम ले जाए.’’लड़की के मोबाइल की घंटी बजी. मालकिन बुला रही है.लडकी रिसीव नही करती कॉल.चौथा लड़का बोलता है,’’ये सच्ची बोलती है.तुम्हारा झाड है ही नी तो देने वाले तुम कौन? हम तो सब ले जायेंगे फिर जो चाहे वो कर लो.’’कि बजते हुए मोबाइल पर उभरते आंकड़ों की अकड निकालती हुई लड़की कहती है,चमकती स्क्रीन को देखते हुए,‘’ये कोई गोल टेबल नहीं है कि बात ही बात करते रहेगे.हो गई बात.अब ये बापूजी कुछ नी कर पायेंगे.तुम लोग तो ले जाओ.’’लड़की ने कहा फिर मोबाइल पर बोली,’’जी मैडम, दरवाजा खोल दिया है.आ रही हूँ.’’
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Thursday, August 7, 2014

थू करने के लिए नही है मेरी जबान पर थूक

बकवास करते है आप ,जाति कहाँ है ?

बीच बाजार में घसीटते हुए ले जाकर
लटका दिया उल्टा
वही जहाँ है फव्वारे और ढेर सारे फूल खिलने की प्रतीक्षा में
ठीक उसी सड़क पर जो हवाई अड्डे से औधोगिक केंद्र को खींचती है
जिसका दूसरा हाथ बिग बाजार के माल के नीचे रखा हुआ है
वही पर
उसकी गरदन को धड से अलग करने के लिए
तलवार से काटा गया
खून निकला और वही जिसे कली कहकर हँसते हो
उसके भीतर चला गया
किसी को पता ही नहीं चला
काले शीशे से लाल रंग तो दिखता नहीं लाल
और हीरो होंडा बजाज से निगाह आगे की तरफ होती है
उसकी नजर में भी घुस न सका खून
फुटपाथ को तो घेरकर शर्मा स्वीट सेंटर ने कंजूमर के हवाले कर दिया
राहगीर नहीं है कोई उसकी राह खा गया वह
उसी वक्त सुपारी के कारखाने में जल रहा है कुछ तो भी
भट्टी के नीचे
सुपारी को सेंकने के लिए और फ़ैल रहा है उसका धुआँ
जो जाता है सीधे आँखों में
मसलते है और आगे बढ़ जाते है कि उनके पास नहीं है वक्त
गाली देने के लिए भी
तभी किसी आवाज से कोई समाचार आता है
दिमाग के भीतर भट्टी में
पहाड़ियों में गड्डों से जाता नहीं हर कोई डही
जहाँ फरमान हुआ है

तस्दीक करनी है उसी जाति के तो हो लेकिन ये काम करते हो ?
विकास बहुत हुआ
बहुत कर ली कोटे वालों ने तरक्की हक़ मारकर .
गाँव ,पटवारी,पंचायत ,स्कूल के प्रमाण के बाद भी जरुरी है
संतुष्टि के लिए फोटो .
भरोसा ही नहीं होता मनुष्य को देखकर
कागज़ पंचनामा रिकार्ड शपथपत्र
सब हो सकते है फर्जी

बनाया जा सकता है आदमी को भी फर्जी
जाति प्रमाण पत्र तो सदियों से बनाए जाते रहे है
सदियों से करते आ रहे है यही कामधंधा हमारे पुरखे
तब शिवाजी की जाति के लिए बनारस से बनवाये गया था रिकार्ड

अब कलयुग में ऊँची जात का नहीं चाहिए प्रमाण
वो तो रोटी बेटी से कर लेते है
बार बार हजार बार सरेआम कहते है
कभी अपने गरीब होने के पुछले को जोड़कर तो कभी मूंछ पर ताव देकर
कहते हो ही ही करते हुए बनिया आदमी हूँ

तय कर देते हो और सामने वाला भूल गया हो तो याद कर ले अपनी जाति

कोटा ,आरक्षण रिजर्वेशन मेरिट प्रतिभा पलायन देश दुनिया
राजनीती वोटबैंक गंदगी कचरा फिल्म हिरोइन एसएमएस एमएमएस वाट्स अप नीली फिलिम गाने ....बाय करते हो
कि भोत काम बाकि है
ये जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है
ये देश भी कोई देश है ...

उस बच्चे से जिसे भगवान का रूप बोलते हुए किसी को शर्म नहीं आती
कहते हो पाना हो स्कालरशिप तो ले आओं मरे हुए जानवर के साथ
अपना फोटो...

ढाई सौ किलोमीटर दूर जब सुनता हूँ
तो अपने को किसी आदिम गुफा में पाता हु
सन्न हु
कि कितने कुत्सित विचार है तुम्हारे
कि मानसिकता की सडन के बाद भी तुम अभी भी हो
उसी गटर के कीड़े जो रेंगता है गंदगी छोड़ता है और सड़ जाता है
थू करने के लिए नही है मेरी जबान पर थूक

बस बचे है मेरे पास शब्द जिन्हें वापरता हूँ
कि चूल्हा जलाने के काम आ जाए
कि कक्षा नौ के पाठ की तरह अपने बेटे को पढ़ा सकूँ
जब कोई मांगे तुमसे इस तरह का प्रमाण
तो मेरी तरह खुद का क़त्ल मत होने देना
मेरे बेटे उससे कहना अंकल जी मेरे पास है एट्रोसिटी का कागज
घर में है संविधान .
///////8888////
शनिवार, 12 अक्टूबर 2013...
janpaksh blog me..
http://jantakapaksh.blogspot.in/2013/10/blog-post_12.html

Monday, August 4, 2014

समझ गये ना


कुछ ऐसा ही ख़याल आया था लेकर लाउडस्पीकर
कहूँ
तुम इसे चिल्लाना कहोंगे
कहोंगे
जो भी कहना है शालीनता से कहो
कहो सुर में
न हो सुर तो कर्णप्रिय लगे
कर्णप्रिय के साथ लय हो ताल तो जरुरी ही है
और सबसे बड़ी बात तुम चुप नहीं बैठ सकते हो
अपना काम करों ये क्या लिखते हो ?
हम है न लिखने के लिए
हम तुम्हारी आवाज बनेंगे तुम्हारे दर्द को उकेरेंगे

हिदायत है सलाह या चेतावनी

दीवार पर टंगी हुई किल के बारे में ,चलो देखते है कौन बेहतर लिख सकता है
बेहतर ...डराता है शब्द .
बेहतर लिखना  ही लिखना होता  है


लिखने के बाजार में फैला रखे है
सजाये है ढेर सारे  विषय
उन्हीं पर हमारे जैसा या फिर पूर्वजों जैसा लिखों
लिखों जो मानदंड स्वीकृत है उस तरह से .

हम नाम देखेंगे
उस पर लिखेंगे
पढ़ने को वक्त नहीं है
हम तो नाम से ही समझ जाते है
बहुत हुआ तो एक लाइन ही काफी है
हांड़ी में चावल का एक दाना ..
विरासत है समझने की .

समझ गये ना ?
21 june 2012

झोपड़पट्टी के मासूम फूलों का झुंड

                     जिंदगी,झोपडपट्टी की अंधेरी संकरी गलियों में कदम तोड़ देती है और किसी को   भी पता नहीं चलता है।जीवन जिसके मायने किसी को भ...