भाकर के भीतर की आग

तवे से बहुत छोटी सी दिखती है आग ...
लहराती हुई लगाकर पूरी ताकत ,पकाती है भाकर को
मोड़कर भी दो हिस्से नहीं होती
उसकी परत टूट नहीं पाती
जिसे कटोरी के पानी से बारबार चिकना बनाया जाता था
कि न चिपके हाथ में
न चिपक बच्चे गोद में
कि पकना ही है ज्वार की भाकर की तरह
जिसमें रहती है आग तवे से बिछड़ने के बाद भी
आग बनी रहे अपने भीतर ,माँ यही चाहती थी .




(संजीव तिवारी की वाल से साभार फोटो.इसे देखकर लिखा है ,कुछ तो भी )

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