महू

कहानी
                                                                                                       -कैलाश वानखेड़े
उदास दिसम्बर उसी साल का जिस साल पत्ते हरे थे
प्रज्ञा के घर जब पहली बार गया था नरेश तब उसके साथ दो दोस्त थे राहुल और संजय.किसी लड़की के घर तीन दोस्त जाते है तो अपराध बोध नही होता और लड़की के घर वालो की नजर शंकालु हिकारत से भरी हुई नही होती है , इसी ख्याल ने नरेश को दो दोस्त के साथ जाने के लिए प्रेरित किया. प्रज्ञा की मॉ, बहन व भाई से परिचय न होने के बावजूद नरेश ने नमस्कार किया लेकिन उन्होने किसी के भी जवाब में नमस्कार, नमस्ते नही कहा, बस हाथ जोड़े हल्की सी मुस्कुराहट के साथ. नरेश को लगा पूछे , कैसे है आप ? या क्या हाल है?’’इस सवाल का जवाब तयशुदा मिलता ,’’ ठीक है, मजे में है .‘’तो सुनकर लगता कि जिन्दा है लोग.छोटे से शब्द ’जिन्दा’ होने का प्रमाण देते तो सुकून मिलता, लेकिन न जाने क्यो नरेश की हिम्मत ही नहीं हुई,सवाल करने की .अचानक चेहरा उतर गया, पकड़ा गया हो कि खामोशी के चंद लम्हों में प्रज्ञा की बहन-भाई भीतर चले गये थे . प्रज्ञा की मां ने पूछा था ,’’कैसे हो बेटा ?’’


‘’ जी ठीक हु .’’
’’प्रज्ञा के साथ पढते हो? ‘’प्रज्ञा की मां ने खडे खडे ही पूछा था .
‘’जी .’’
‘’क्या नाम है तुम्हारा ?’’
‘’ नरेश .’’
नरेश पूरा नाम बताना चाहता लेकिन जुबान पता नहीं क्यों रूक गई. प्रज्ञा की मां से आंख मिला नहीं पाया तो नजर दीवार पर गई. दीवार पर डॉ. अम्बेडकर का फोटो था जिसमें तीन बच्चें थे. तस्वीर में ही बच्चों के नीचे लिखा था शिक्षित बनों ,संगठित बनों, संघर्ष करों. प्रज्ञा की मां ने अगला सवाल नहीं किया और भीतर चली गई.वह शाम रात में बदल गई थी .
प्रज्ञा कंदील ले आई थी जो पुराना है .मोटी चौड़ी बाती वाला .लोहे की पुरानी कुर्सी पर बैठी प्रज्ञा प्रकाश लेकर आई थी कि तीनो पलंग पर बैठे –बैठे सोचते रहे कि क्या कहा जाय?
’पानी पी लो.क्या चल रहा है आज कल? ‘’ ’’ सन्नाटा तोडा था प्रज्ञा ने . पानी न ठंड़ा है न गरम माहौल की तरह. पानी तीनों के भीतर जा रहा है, सवाल के साथ साथ.
’’कुछ नहीं-बस ऐसे ही धक रहा है.‘‘ संजय ने बोला था .उसके हाथ में खाली गिलास रखा हुआ था .
‘‘...................‘‘
‘‘ सोचा चलो मिल आये, क्यों नही आ रही हो कॉलेज.कोई बात ...’’नरेश ने कहा था . गिलास रखने के लिए जगह ढूंढती रही नरेश की निगाह .जगह नही मिलती .आंख मिल जाती है पल भर में .बिना कुछ कहे प्रज्ञा ने सभी से गिलास लेकर कहा
था , “ कुछ खास नहीं बस तबियत ..’’
“क्या हुआ तुम्हारी तबियत को ?’’ नरेश की जुबान गतिवान हो गई थी .
संजय दीवारे देख रहा था उसके दिमाग में यह चल रहा कि ये दिवारे कैसे बनी होगी ? कौन-कौन सी चीजे मिलाई होगी, दीवार में रंग कब लगाया होगा ?दीवार का रंग उड़ा हुआ था ,तीनों की तरह .दीवार में लगा हुआ एक पटिया था.जिसका इस्तेमाल रेक की तरह किताबे रखने के लिए होता दिख रहा था .पटिया भी चिकना, करीने से काटा हुआ नहीं था, उसको चूने से पोत दिया गया था जो सरीये के दो टुकडों के सहारे टिका हुआ था.उस सहारे को देखते ही संजय ने तत्काल पलंग को देखा कि कही ये भी दो सरीये के टुकडे पर तो टिका हुआ नहीं है ?गिर न जाये का डर उसके चेहरे पर आया और संजय के चेहरे पर बचा खुचा रंग चला गया .अँधेरा होने से कोई देख न सका .
प्रज्ञा जवाब दिये बिना चली गई. वापस आई तो एक दुपट्टे को जो सफेद था छोटा. उसे गले में लटका कर लाई थी .दोनो हाथ से उस दुपट्टे के मुंह को पकडे हुए थी .दो मुंह वाला दुपट्टा और दोनो मुंह बंद होकर प्रज्ञा के हाथ से रस्सी में तब्दील हो गए .
‘’मन नही लग रहा तो सोचा कुछ दिन न आऊ कालेज .”प्रज्ञा बोली तो सभी का ध्यान दीवार से हटा .प्रज्ञा बोलती रही . प्रज्ञा के घर की दीवार से उसके घर की स्थिति पढ़ी जाने लगी .जानने आये थे प्रज्ञा की तबियत और जानने लग गए थे दीवार .
‘’मै कल आती हू .” प्रज्ञा ने फिर कहा क्योंकि तीनों में से कोई कुछ न बोल
सका .कुछ ऐसा – वैसा न निकल जाये , जो प्रज्ञा या उसके घरवालों को बुरा लग जाये और ये भी प्रेशर था कि ‘गलत ‘ न समझा ना जाये .
वे तीनो लौट आए थे. राह चलते हुए एक दूसरे को देखते हुए चुप, बंद मुंह के साथ. वे सड़क पर नहीं दीवार पर चल रहे थे और उन्हें लग रहा था कि प्रज्ञा की माँ और दीवार की तस्वीर में से तीनों बच्चें देख रहे है.
कॉलेज का पहला बसंत, रंगहीन
नदी में लुढकते हुए पत्थर, गोलाकार चिकने बने जाते है लेकिन कॉलेज में वो खुरदुरे हो जाते है. प्रोफेसर पढाते हुए कहते है ,”शरीर में कोई अनावश्यक हड्डी बढने लग जाती है तो उसका ऑपरेशन करना पडता है. समाज में भी जरूरी है. जरूरी है उन्हें आगे बढ़ने से रोका जाए, वरना वे पूरे समाज के लिए घातक होंगे. कैंसर की तरह.’’
इस दौरान कुछ चेहरे पर हिंसक मुस्कान छा जाती है तो कुछ के पल्ले ही नहीं पड़ती बात लेकिन प्रज्ञा और उसमें समूह को बता देती है कि वे समाज के
ऐसे अंग है जो अनावश्यक रूप से बढ़ रहे है .
क्लास से बाहर निकलने के बाद प्रज्ञा के दिमाग में यही कुलबुलाता है कि खिलखिलाती हुई रागीनी पूछती, ’’ तेरा घर कहॉ है यार, हमें भी ले चल. ‘’
प्रज्ञा कहती है,’’फिर कभी चलेगें.’’
‘’देखे तो सही क्या ठाठ है ? ‘’हिंसक खिलखिलाहट में दिख रहा है कि क्या जानना चाहती है रागिनी. प्रज्ञा की नाराजगी आंखो में आ जाती है लेकिन रागिनी कहती है, ‘’अरे कैसे जी लेते हो, कैसे सांस लेते हो और बोलने की ये हिम्मत कहॉ से आ जाती है? यह देखना समझना है यार. समझाकर डियर.’’ रागिनी की हँसी बरकरार है.
पूजा न चाहते हुई कहती है ,’’तु तो इस तरह पूछ रही है जैसे शादी करनी है उसके घर .’’
‘’शादी.....? अचकचा जाती है रागिनी लेकिन जल्द ही उबर जाती है. और कहती है , ’’ ये पेन है ना बडा सस्ता है यूज एण्ड थ्रो वाला. मैं इसी का यूज करती हू .थ्रो के लिए .मेरे कांसेप्ट क्लीयर है. यूज एंड थ्रो .’’ रागिनी बाए हाथ की मुठ्ठी को गोलाकर बनाती हुई उसमें पेन डालकर फेंक देती है ,गलियारे से लगी जमीन पर उगे हुए घास ,खरपतवार में.
गेट से दाई ओर बगीचे में जाती है प्रज्ञा कि रागिनी कहती है,’’ बाय द वे ये बता तु कैंटिन क्यों नहीं आती.?’’
’’ मरजी.... बस यु ही..’’
’’ पैसे नहीं है ना ..सही है .वरना ये कोई हमारा किचन नहीं है जिसमें तुम्हारे आने पर बैन लगा हो .है ना .‘’चुइंगम चबा चबाकर कहती है रागिनी .
‘’सहीं है. पैसे नहीं मेरे पास. पैसे होते तो भी तुम्हारे जैसों के साथ कैटिन में भी नहीं बैठ सकती मैं. बैन.... अरे हम तो थूके भी नहीं. क्यों जाये तुम्हारे किचन
में ? किसलिए? हगने-मुतने ..?’’ गुस्सा इकठा हो गया प्रज्ञा के भीतर, जो आखिरकर निकल पडा.
‘’किचन में लेट्रिंग करते हो ? हॉ, तुम लोग क्या जानो सेपरेट किचन. वही खाना वही सोना... नहीं..वही हगना.....है ना.’’रागिनी ने अपने गुस्से को उपहासात्मक रूप लेकर शालीन शब्दों का उपयोग किया .वह जानती है शालिनता नहीं छोडनी चाहीए, शब्दों में.लेकिन क्रूरता और नीचता बरकरार रखती है शालीन शब्दों के भीतर खोल बनाकर.
‘’तो .. तुम्हें क्या ?’’
‘’अरे जो हमारे साथ पढने आये है , सब के बारे में मालुम होना चाहिए. यहॉ पढने के लिए अपनी योग्यता से आये है कि नहीं ...’’रागीनी के चेहरे पर न हंसी थी न सामान्यता.थूक था जो चुइंगम के भीतर आ-जा रहा है .
‘’कितनी गलत फहमी में हो तुम. योग्यता .. जरा मेरे घर के भीतर रहकर पढाई कर तब धरी की धरी रह जाएगी तेरी योग्यता... योग्यता मतलब? योग्य डॉक्टर इंजिनियर बनकर लोगों को लूटने वाले लुटेरों .. लोगों की सेहत और पैसों पर डाका डालने वाले डकैत ...डाकू ...... क्या है योग्यता?’’प्रज्ञा की आँखों में गुस्सा उबलने लगा .
बसंत था लेकिन धूप का तीखापन बढता जा रहा कि बन गया छोटा सा घेरा जो तय करने लगा योग्यता कि बोलने लगी मुक्ता ,’’ यार सब एक साथ है. एक क्लाम में है. अब ये मुद्दा डिस्कस नहीं होना चाहीए .बिकाज वी आर क्लाम मैट.’’
‘’क्लास मैट ... कहॉ ये कहा मै .ये जन्म मुझे ऐसे ही नहीं मिला. पूर्व जन्म का फल है. सदकर्मो के कारण मिला है श्रेष्ट जाति में जन्म.’’ रागिनी गर्वोक्ति से कहती है.
‘’मां के पेट से आई या सीधे टपक गई आसमान से. क्या थी तु पिछले जन्म में? कौन सी जानवर थी तु.मालुम होगा तुझे, क्योंकि अगर पुर्नजन्म होता है तो तय है कि तु पिछले जन्म में जानवर होगी. ‘’प्रज्ञा ने कहा. गंभीर माहौल सामान्य नहीं हो पा रहा.
‘’छोडों यार टाइम हो रहा है. ‘’मुक्ता गोयल ने कहा .
‘’ये तो पता नहीं पिछले जन्म में क्या थी लेकिन ये पता है इस जन्म में क्या हूं.’’ रागिनी का गर्व भाव सिर चढ़कर बोल रहा है .
‘’हाँ मालूम है हमें तु क्या है इस जन्म में ...ये बता 84 लाख योनियों के बाद तु औरत के रूप में जन्मी इसका मलाल है या नाज ?’’प्रज्ञा ने कांति की तरफ़ देखते हुए रागिनी से कहा .
‘’मलाल तो है यार ....’’कांति से कहा रागिनी ने .उसे अब चुइंगम चबाने में मजा नहीं आ रहा है .
‘’मतलब तुने सारे सद्कार्य नहीं किये या कोई गलती हुई होगी या पाप .’’प्रज्ञा ने रूककर कहा .कुछ नहीं कह पाई रागिनी .न प्रज्ञा जा पाई बगीचे में न रागिनी कैंटिन.
अगस्त हरे रंग का
पहला सवाल नरेश का था ,’’कोई परेशानी ?’’
‘अरे नहीं, परेशानी, टेंशन जैसी कोई बात नहीं बस यू ही...’’ प्रज्ञा आते जाते वाहनों को देखती रही .
‘लगा .........’’
‘परेशानी, चिंता, थकान, अवसाद क्या होते है? नहीं जानती हू इन्हें. ये शब्द ही अपरिचित लगते है. लगता है इन्हें शब्दकोष में रख दिया गया हो जानबुझकर ताकि निकम्मों को बहाना मिल सके या डराने के लिए रखे हो ....’’प्रज्ञा हंस रही ,चल रही है .गाडिया देखते हुए बोली ,’’मुझे तो लगता है नरेश कि भूत, प्रेत, डायन, चुड़ैल जैसे शब्दो से जब लोग डरने लगे तो फिर इन शब्दो का ईजाद किया होगा सनकी बाप ने. अपनी कुंठो को शब्दाकार देते हुए.’’
‘’तुम परेशानी में हो तो भी मै उसे दूर नही कर सकता हू ....’’
‘’मगर मैं परेशान नही हू . परेशानी में नही हू .तबियत भी ठीक है. सबकुछ ठीक है .आल इज वेल ......’’ प्रज्ञा मुस्कुराई तो लगा ये परेशान हो ही नहीं सकती जब बोलती है तो लगता है खुशिया झरती है. ढेर सारे रंग बिरंगे फूल झरते है .एक डंगाल हिलाने से पेड़ के सारे फूलो का टपकने जैसा, जैसे ही बोलती है प्रज्ञा सारे फूल चले आते है .खुशबु ही खुशबु से भरे हुए फूल एक को उठाने लगे तो दूसरा तीसरा ......कई फूल आ जाते है. इतने सारे कि फूलो मे से किसी एक चार फूल का चुनाव नही कर पाता कि किसे लेकर चले .... किस फूल को नाक के पास ले आये या ओंठो से छू ले ..
नरेश को लगा कह दे प्रज्ञा को कि जब तुम बोलती हो तो लगता हैं .... लेकिन नरेश को लगा कही बुरा न मान जाए, निश्चित तौर पर कुछ नही कहा जा सकता है . कोई पूर्वानुमान नही लगाया जा सकता हैं कि कब क्या हो जाये ....... यह धडका हमेशा लगा रहता है . चलते चलते रूक जाती हैं प्रज्ञा .कहती हैं ,’’नरेश बस . अब नही जाना आगे ...’’
‘’पर तुम्हीने तो कहा था ...वादा तोड रही हो ....’’
‘’हॉ ..... फिर कभी..’’
‘’फिर ....’’
‘’अगला जन्म होता नही इसलिए अगले जन्म शब्द भी नही बोल रही हू . चलो चलते है ..’’
‘’चलो ...’’
‘’उधर नही इधर .... रोशनी हैं इधर ... उधर अंधेरा है ‘’अँधेरे को देख असहज हुआ नरेश .
‘’मैं हू ना . देखलो इस बार ..... मैं हू ना ..’’गाने लगती हैं गाना, उम्मीद और हौंसले के साथ.
सुनता हैं नरेश. अंधेरी सडक पर चलते हुए गाती जा रही हैं प्रज्ञा. पैरो तले क्या आ जाये परवाह नही करती हैं जबकि नरेश का हर कदम डर के साथ पड रहा हैं .कही गड्डा आ गया तो, फिसल गया तो ,मोच आ गई तो.... कोई है जो दिमाग मे रटंत तोते की तरह कई तो...तो... तो बोल रहा हैं. जब डरते हुए कदम रखते हैं, तो गिरने के चांसेस ज्यादा होते हैं और वही होते होते बचा, थाम लिया प्रज्ञा ने .
‘’अंधेर मे चलने की आदत होनी चाहीए, चलने वालो को ..अंधेरे से लडने की बात करने वाले अंधेरे में ..खुले में ..मैदान में नहीं आते. क्यों? ‘’प्रज्ञा ने उसे संभालते हुए कहा तो प्रज्ञा के स्पर्श के साथ शब्दों से ठिठक गया नरेश . नरेश कुछ न बोल सका तो बोली प्रज्ञा ,‘’बात करना और सड़क पर आना ....दिन और रात जैसा फासला है ....सबके बुते की बात होती नहीं .’’
अंधेरा होने के बावजूद दुकान दिख रही है .दिख रही है रोशनी.जो आंखो से दिमाग को बता रही है .
‘‘रूक जाये ........ यही कही.’’प्रज्ञा बोलती है .
‘’आगे रूकते है ,दुकान है ,वन स्टाप शाप ,,बाजार का बच्चा ‘’ नरेश हंसता है .
‘’तुम्हे बाजार के अलावा कुछ नजर नही आता ...’’प्रज्ञा बोली तो प्रज्ञा के चेहरे को देखते ही रह गया नरेश. प्रज्ञा की ऑंखे देखता है अंधेरे मे .....खामोशी छा जाती है. जुगनु नही है अंधेरे मे .आसमान मे तारे भरे पडे है , चांद अधमरा ,अधकटा दिखता है , नरेश को खुद की तरह .
‘’चलो दुकान पर चलते है .’’ कुछ नहीं सूझा तो नरेश ने फिर कहा .
‘’दुकान नही बाजार है. बाजार. बाजार खीचता है तुम्हे .तुम्हारे दिमाग मे बाजार के अलावा कुछ और ...?’’प्रज्ञा ने कहा.स्वीच आन करने के लिये बढती उंगली कि स्पार्क होने से पूरा शरीर पीछे हो जाता है वैसा ही लगा नरेश को .
‘’चलो तुम जाना चाहते हो न दुकान. लेकिन किस लिए ?’’प्रज्ञा ने उसे राहत दी.
नरेश कहता है ,’’देखते है .’’
‘’मै भी देखती हू कि क्या देखते हो .....चलो .’’वह हँसी और धौल जमाते हुए आगे बढ़ी .
‘’पूरा शहर अंधेरे में है .लाइट चली गई लेकिन इसकी लाइट नही जाती है.’’
‘’हा .....इसने बड़ी चतुराई से काम लिया है .शहर और गाँव को जोडने वाले फिडर से कनेक्शन लिया है . शहर वाली पूरी बिजली तो मिलती है लेकिन जब शहर की कटौत्री होती है और गाँव को मिलती है तो यह गाँव के हिस्से की ले लेता है. बाजार है. उसे हर हाल मे जगमगाना पडता है वरना तुम जैसे लोग कैसे आओगें ....?’’
‘’मै अकेला होकर आता हु .तुम बेक समोसा खा लो .’’ नरेश बोला तो लगा कि वह बोलने के लिए कुछ बोला .
‘’अकेले समोसा खाने मे मजा नही आता है .मै भी चलती हू . दुकान जाओगें या मेडिकल स्टोर?’’
‘’जहा तुम चाहो?’’ नरेश अचकचा गया .
‘’अरे तुम्हे कहा जाना है ?तुम कहा जा रहे थे...तुमने तय किया होगा न कहा जाना है.’’प्रज्ञा गंभीर हो गई .
‘’तय नही किया है .तुमने बोला तो .....चलो चलते है.’’ नरेश अन्तर्द्वन्द में पड़ गया.
‘’बीच रास्ते मे खडे रहने से बेहतर है कही चले जाना.’’
‘’बीच रास्ते मे खडा होना मुझे भी अच्छा नही लगता है.’’
‘’चलो .माँ भी इंतजार कर रही होगी .’’
‘’खाना पकाने के लिये... ‘’नरेश ने हंसाने के लिए कहा .
‘’हा .खाना पकाना है .तुम भी चलो मेरे घर .समोसा खाने की बजाय चपाती खा लेना.’’
‘’ रात मे तुम्हारे घर जाना अच्छा नही लगेगा .’
‘’किसे ?’’
‘’मुझे भी .तुम्हारे घर वालो को भी . रहने दो ...’’
‘’ ठिक है .मै चलती हु .बाय.’’
और प्रज्ञा बिना कुछ सुने चली गई .अंधेरे रास्ते की तरफ .नरेश वही खडा रह गया बीच रास्ते पर .दुकान मे जाउ या अपने घर या आवाज दे दु प्रज्ञा को . जब तक तय करता तब तक अंधेरे मे अदृश्य हो चुकी प्रज्ञा .अँधेरे में चांद और वह अकेला रह गया.
किधर जाऊ? पिछे की तरफ देखता है तो अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है उसी अंधेरे रास्ते की तरफ है नरेश का घर .घर जाना है .मगर अंधेरा है . वन स्टाप शॉप खुली है .दाल से लेकर आलपिन तक .पेन से लेकर जुकाम की टेबलेट तक .गोरेपन की क्रीम से लेकर टायलेट सफाइ के ब्रश तक.घर वालो की जरूरत से ज्यादा की चीजे मिलती है .एम.आर.पी. से कम मे ,डिसकाउन्ट मे दो के साथ एक फ्री मे. बाजार संरक्षण मे चलता है.माचिस का खयाल आया .लगा नरेश को कि सिगरेट पी ली जाये. सिगरेट नहीं पीता नरेश . सिगरेट के कश की इच्छा यू ही चली आई या उसे माचिस लेकर आई ? माचिस की ख्वाहिश क्यों आई? सोचता हुआ नरेश अंधेरे की तरफ चलने लगा  कि संजय याद आ गया . संजय से कभी कहा था नरेश ने, ’’सिगरेट पीने से फेफड़े खराब होते है निपट जाता है आदमी.’’
’’पी ले.....जी ले...पी ले .’’संजय बोला था सिगरेट का कश खींचते हुए .
’’बर्बादी के सिवाय कुछ नहीं पीने से’’
’’जीने से क्या मिलेगा?’’मुह से धुआ निकला गोया कि उछालना चाह रहा था संजय .
’’..............................’’
अब भी चुप है नरेश तब की तरह. जीने से क्या मिलेगा? जी ले... पी ले... जी..पी..जी..पी..जी.. में डूबता –निकलता हुआ दूकान को पिछे छोड़ दिया.इक्का-दुक्का आती जाती बाइक की रोशनी आती, शोर मचाती धुँए के साथ . नाक को धुआ सुंघाकर चली जाती...धुआ ही निकलता है सिगरेट से... गाड़ी से.. कितनी दुर्गन्ध होती है धुएं में .नरेश को लगा उसमें और बाइक में कितना अंतर है? धुआ उगलने वाली, शोर करने वाली बाइक और वह...क्या प्रज्ञा मुझे चलाती है.....विज्ञापन में बाइक को औरत के शरीर में तब्दील होते हुए देखा था. देखा था औरत पर सवारी....विरासत में मिली मानसिकता को चमचमाती हुई गाड़ी के साथ दिल दिमाग में डाल दिया गया है . वह यही सिखाता है न कि औरत की सवारी करो, उस पर चढ़ो, उसे चलाओ.....मनु को बाजार ने अपना लिया .भुना लिया.
प्रज्ञा को मैं चलाना चाहता हूँ? कही मेरे भीतर तो नहीं हो, मनुमहाराज.... नरेश को लगा वह जोर से पूछे . क्या-क्या दिया है तुमने मुझे? जो मैं ही नहीं जानता हूँ? क्या प्रज्ञा सच कहती है ,हमारे भीतर खून की एक धार के साथ सैकड़ो सालों की गंदी नालियाँ बहती है और महसूस ही नहीं होता हमें. हम सवाल खडा नहीं करते.......हिम्मत ही नहीं होती .कायर है, डरपोक है, दब्बू है.... एक स्साले सड़े से अंधेरे से डर लगता है, तो फिर पूरा सिस्टम है, व्यवस्था है, समाज है .. उसी में गुंथे हुए ...वहीं आ जाता है हमारे भीतर .... सब ठीक है......बेहतर है. उन पर मत करो सवाल यही सीखाया और सीख गये हम. सच गलत तो दिखता ही नहीं .बरसो से पड़ा हुआ पानी सड़ गया.सड़ गया कि बदबू नहीं आती हमें .खुद के मल में गंदगी नहीं दिखती है . प्रज्ञा के कहे हुए शब्द उसी तेवर के साथ हावी हो गए .तेज हार्न बाधा पैदा करता है स्मृति में और वही ठिठक जाता है ,अटक जाता है कि अँधेरे में खड़ा हो जाता है .
जब कुछ सूझ नहीं पड़ा तो नरेश गुनगुनाने लगा ’’ हम किस गली जा रहे है .हम किस गली जा रहे है .अपना कोई ठिकाना नहीं..........ठिकाना ...’’
लम्बी गलियों से मुडती हुई ढलान वाली सड़क अचानक मुख्य मार्ग पर मिल जाती है .कहाँ अटक गया था इतनी देर. रात ज्यादा हो गई है .मुख्य मार्ग पर गाड़िया कम हो गई तो पुलिस से डर लगने लगा.
पुलिस नरेश को रोक कर पूछेगी, ‘’क्यों ,कहाँ से आ रहा है?’’
तो वह क्या जवाब देगा कि प्रज्ञा से मिलकर आ रहा हूँ .’’
‘’ कौन है प्रज्ञा ?’’ अगला सवाल फटकारता हुआ मिलेगा और फिर श्रंखला तडफने लगेगी सवालों की .
‘’कौन है ..?‘’क्या है तुम्हारी......’’
गूंजते और घूमते रहे सवाल .सवालो की संख्या बढती जा रही और राह में सवाल करनेवाली पुलिस नहीं मिली .पुलिसवाला नजर नहीं आया .
जून जैसा कोई महिना था खामोश
मैं प्रज्ञा दोहरे . ग्वालियर की रहने वाली हूँ. लोगो को लगता है,कुछ समझ नही पा रही हू .उनकी तरह समझ विकसित कर न पाई और करना भी नही चाहती हू .सिर्फ जीना है .अपनी शर्तो पर अपनी मर्जी से .डिग्री मिलने के बाद घर चलाने के लिए एक अदद नौकरी की चाह भर है .नौकरी में डुबना नही चाहती हू . सच तो यह है कि प्रेम मै भी करना चाहती हू डुबकर अपने आपको भूलाकर. भूलना मैं चाहती हू खुद को. वह भी भूले .प्रेम करते हुए संकरी गलियों में जाना चाहती हू . चाहती हू , लोगो को ,बच्चों को बताना . खूब पढ़ो. पढ़ो कि इतिहास में क्या दर्ज है .पढ़ो कि समाज के ढ़ॉचे का निर्माण कैसे हुआ. कैसे बना अर्थतंत्र, ?क्यों है हमारे आंगन में गरीबी का बसेरा. सवालों के साथ गली गली जाना चाहती हू . चाहती हू, मेरे हाथ में हो हाथ जो चले साथ-साथ.
हो चूकी तमाम गुजारिश, अब डिग्री के साथ मिलने वाले घृणा, प्रताड़ना के तमगे लैब में ले जाकर उसे प्रेरणा व साहस से तब्दील करना चाहती हू .अब तक जिंदगी से प्यार किया है मैने. ताउम्र करती रहूंगी फिर चाहे जो किमत चुकाना पड़े .लडना पड़े. जिंदगी को कभी हारने नहीं दुंगी .लिखूगी जी भर के कि दिमाग के भीतर इकठ्ठा न हो उदासी, परेशानी, भय, पलायन के गठ्ठर.
क्लास फोर की सरकारी नौकरी कर हम पढाने वाले पिता की उदास लम्हों की आस बनकर, खुद को साथियों को घर वालों को गली वालों को सबको लेकर साथ खुशी से भर दुंगी .जिंदगी मै तुझसे बेंइतहा प्यार करती हू. मै मरना नहीं चाहती हू ,ये जिंदगी .
अप्रैल, हरे पत्ते झड़ गए थे और कोपल फूटने लगी
‘’ एम्स में बालमुकुंद, आई आई टी कानपुर में माधुरी .इम्युनोलॉजी में मंजरी के बाद लिनेश ....कितने बच्चों की हत्या होगी? क्यों मारे जाते है हमारे बच्चे? क्या है गुनाह ?’’प्रज्ञा ने कहा और चुप हो गई .चुप हो गया नरेश .
प्रज्ञा रामटेके कॉलेज की सीमेंट वाली कुर्सी पर बैठकर जब बोल रही है तब डेढ बजे है . गरमी से पसीना बह रहा है . पेड़ मरीयल है .हवा अपने साथ धुए की गंध के साथ आ रही तब पिछवाडे़ वाले हिस्से में कॉफी, समोसा, आलुबड़ा जैसी चीजे बन-पक रही है .कई कुर्सियां भरी पड़ी है. तब भी कई खडे है .इन्वर्टर से चार पंखे कैंटिन में चल रहे है. भीतर से आग और तपा हुआ तेल जल रहा है .ठीक उस वक्त सड़क से लगे बगीचे नुमा जगह पर प्रज्ञा को नरेश सुन रहा है .तब तीसरा कोई नहीं उनके पास .बहुत सारे है उस कैम्पस में जो आ-जा ,खा-पी .ही-हा जैसी कुछ चीजो- बातो से अटा पड़ा है.
उस वक्त नरेश ने कहॉ,’’कितने ताज्जुब की बात है. हायर एजुकेशन वाला एक भी लड़का या लड़की मरने के पहले चिट्ठी नहीं लिखता .दोस्तो को नही बताता .प्रोफेसरो को खबर नही होती और मर जाता है .आत्महत्या मान लिया जाता है.’’
‘’वर्क लोड,टेंशन ,डिप्रेशन और लव अफेयर इन चीजो में हत्याओ को आत्महत्या करार दिया जाता है.’’
‘’तब भी कोई नहीं लिखता. मरनेवाले किससे डरते है?’’
‘’इतना सताया जाता है नरेश कि जुबान बंद हो जाती है .दिमाग कुंद हो जाता है .कोई सहारा न हो ,तो अकेलेपन में प्रताडना तोड़ देती है .टूट जाते है धीरे धीरे सपने ,इरादे और छूट जाती है मंजिल ...’’ उदासी में डूबकर कहती है और नम हो जाती है प्रज्ञा की आँखे .छलकते नहीं आंसू लेकिन चेहरा बता देता है पूरा इतिहास जो प्रताडना से भरा हुआ है .
नरेश कहता है ,’’क्यों नहीं लड़ते ...?”
‘’ये तो ठिक ठिक पता नहीं ..मेरे साथ पहले साल शुरूवाती दिनो में रागिनी हंसते हुए कहती थी ,’’ शुडू क्या हाल है? ...शुडू, क्या चल रहा है?..... शुडू ,तुम पढने की तकलीफ क्यो उठाती हो ? जैसे एडमिशन हो गया है वैसे ही पास हो जाओगी.प्यार से बोलती थी रागिनी . बड़े लाड से बोलती थी रागिनी ,‘’आजा मेरी शुडू . शुड्डो ....रागिनी हग करती. तब उसकी मासूमियत उसका प्यार ममता के अलावा कुछ और सोच भी नहीं सकते थे हम . रागीनी बोलती थी ,’’ जमाना बदल गया है . लाईफ में चेंज आया तो बोलने में भी. यू नो आक्सफोर्ड वालो ने कई शब्द हमारे उठा लिये है .मैंने उनको शुडू भेजा है. कॉलेज में जब बहुत सारे शुडू आ गये तो शब्द को भी आना चाहिए.’’न उदासी है न गुस्सा .अटकता रहा कुछ जो रोक देता है प्रज्ञा को .
‘’उसके साथ क्यों रही?’’सपाट सवाल किया नरेश ने .
‘’एक ही रास्ता हो .एक ही क्लास रूम एक ही कैंटीन एक ही स्टैण्ड हो तो क्या करे ?आंख बंद नहीं कर सकते .कान में रूई डाल नही सकते .’’बोलते –बोलते चुप हो गई प्रज्ञा .नरेश की आंखों में देखा फिर बोलने लगी ,’’नया जमाना? रागिनी का मतलब तो बाद में समझ में आया .सीधे –सीधे एसी एस टी ओबीसी शब्द बोल नहीं सकते है इसलिए नया शब्द ईजाद किया ,’’शुडू .’’ प्रज्ञा बोलते बोलते चली गई कालेज के पहले साल में .जहां अँधेरे में घुटन के अलावा कुछ नहीं मिलता है .अजनबी लगते है सब .वहाँ के गलियारे में शूडू शुडू के अलावा कुछ भी सुनाई नहीं देता है .
‘’प्रताडना बंद नहीं होती है . कुछ शब्द बदल जाते है. कुछ तरीके चेंज कर लेते है .पॉलिश हो गये न बाजार वाले .मासुमियत के साथ गला काटते है . ये हर रोज काटते मारने के लिए .’’ नरेश ने प्रज्ञा को देखते हुए कहा .
प्रज्ञा ने कहा ,’’रागिनी ने कहा था हायर मार्क्स मिलने के बाद भी मुझे केमिकल नही मिला और एक तु है लाडो जिसे कम मार्क्स लाने पर भी मनचाही फेकेल्टी मिल गई. शुडू ,तुम लोगो के कारण दो साल बर्बाद हो गये मेरे. हमारा हक छिनने वाली तेरा क्या करू? ‘’तब मैंने कहा था ‘’तुम्हारा हक? सदियो से हमारे हक पर डाका डाला है तुमने .सदियो से सहते रहे है हम .अब हमे मौका मिला तो पच नही पा रहा है?’’हमारे साथ वाली मुक्ता गोयल बोली थी ,’’ रागिनी ये तरीका ठीक नही है .ये क्लासमेट है .क्लासमेट .उसे इस तरह बोल नही सकती .’’ रागिनी ने फिर कहा था,‘’क्यों न बोलू चमची ...’’.मुक्ता बोल उठी थी ,’’ तुमने यही सीखा है रागिनी इस तरह बोलना .नोचना जानवर की तरह.’’जब रागिनी नहीं मानी तो मैंने कहा था ,‘’ जितना सामर्थ्य है उतना किया मैने .कोई चिटिंग नही की. मेहनत की .मेहनत के बल आई हू और यह बता दू यहॉ पास होने के लिए नही मिलता रिजर्वेशन ? रागिनी का हाथ पकड़कर मैंने कहा था ,एक बात कहू सेशनल मे तो तुम्हे मिलता है रिजर्वेशन. हमे तो सजा दी जाती है सेशनल में सजा भुगतते है हम .चू करे तो प्रोफेसर निपटा दे. वहॉ प्रोफेसरो की मानसिकता यहॉ तुम्हारी ..सब एक जैसो हो तुम .एक जैसे सोचते हो न बढ़े हम. न पढ़े हम .लेकिन रागिनी मैं पढूंगी अच्छी तरह से समझ ले .’’तब मुक्ता ने मुझे धकेलते हुए कहा था ,‘’चलो यार मेटर क्लोज करो . क्लासमेट ऐसा नही करते. चलो पीरियड का टाइम हो रहा है .’’उस रात बहुत रोई मैं . मेरे साथ मुक्ता भी रोई और संघमित्रा भारती भी आई .तब लगा चलो कोई मेरे साथ है .वह अहसास नही होता तो पता नहीं क्या करती मै . सारी बहादूरी को समेटा था उस रात मैंने .’’
‘’संघमित्रा ..कौन ..दिखी नहीं कभी ..’’नरेश ने जिज्ञासा के साथ कहा.
‘’उसने तो पहले ही साल कालेज छोड़ दिया था .वह सहन नहीं कर पाई .वो रहती तो उसके पास भी आत्महत्या के अलावा दूसरा रास्ता नहीं होता. कालेज छोडकर जाने वालो के बारे में कोई सोचता ही नही ,,क्यों छोड़ देते है कालेज ...’’ मातम सा छा गया .
‘’यहाँ तो आत्महत्या करनेवाले के बारे में कोई भी कुछ नहीं कहता है तो ड्राप आउट के बारे में सोचने के लिए वक्त कहा है ? नरेश ने निराश होकर कहा.
बहुत देर तक जब कोई नहीं बोला तो कहने लगी प्रज्ञा ,’’नरेश, उन दिनों जब शुडू पर आब्जेक्शन लिया मैने तो रागिनी ,राजेश और दूसरे साथियों ने मेरे सामने बोलना तो बंद किया था लेकिन इशारे,ओंठो पर जुबान चलाने के तरीके और हद तो तब हो गई जब मुंह में थूक इकठ्ठा कर हमारे सामने थूकते थे . दूसरों को लगता है इतनी छोटी-छोटी बाते है . वर्क लोड, टेंशन यह सभी के साथ होता है .हम अछूते नहीं रहते है .हमें तो ये प्रताडना अतिरिक्त रूप से मिलती है .फ्री में ..न चाहते हुए . इस तरह का व्यवहार तोड देता है हम लोगों को नरेश .तोड देता है .’’
‘’जो लड नहीं पाते वे मारे जाते है और वे कहते है आत्महत्या कर ली .’’ नरेश ने कहा .
‘’ हायर एजुकेशन में मेरीट वालो का राज चलता है . मेहनत के बल पर हम लोगों की आर्थिक हैसियत थोडी बहुत बढ़ी तो रिजर्वेशन का थोडा सा बेनीफिट लेने लगे .इन्हे डाका लगता है .इनके मां बाप को भी सहन नहीं होता. बचपन से ही दुर रखा जाता है हम लोगो से. अब साथ बैठने लगे तो पहाड़ टुट पड़ा, पहाड़ .’’प्रज्ञा का पीछा नहीं छोड़ा इन बातों ने .उसके चेहरे पर तीन साल पुराना केलेंडर दिख रहा है .
‘’हम सब भाई-भाई जब कोई बोलता है तो जी में आता है उसका गला दबाकर कहु कि यहॉ आकर देख .देख कि भाई-भाई को कैसे प्रताड़ित करते है .’’नरेश का गुस्सा उफान पर आ गया .
‘’हम प्रताड़ित होते है और वो करते जाते है . फिर मैने भी रिप्लाय देना शुरू किया था.एक बात बताउ ये जो हत्या ,आत्महत्या वाले है इन्होने जीवन में कभी भेदभाव देखा नही होगा . इसका ताउम्र अहसास नही होता होगा उन्हें और जब यहॉ देखते है तो धक्का लगता है और टूट जाते है.’’प्रज्ञा ने कहा .
‘’ तमाम टेंशन, प्रताड़ना को जो झेलता है उस मरने वाले के चेहरे पर दिखती है. क्या उनके दोस्त को नही दिखी. प्रोफेसरो ने महसूस नही किया. क्या किसी का ध्यान नही जाता .कोई तो पूछता इतने मेहनत करने वाले मेधावी लडका-लडकी क्यो कर लेते है आत्महत्या? कोई नहीं बताता है इसका कारण ? न मीडिया न पुलिस न प्रशासन न आयोग कोई नही .कोई नहीं तफसील करता है, हत्यारा कौन है? ‘’नरेश ने प्रज्ञा के चेहरे को देखते हुए कहा .
’’हत्यारे नहीं बताया करते है कि वे हत्यारे है .हत्यारों से उम्मीद करते हो कि वे बताएँगे अपना नाम .....सच तो यह है न दोस्त होता है न प्रोफेसर,जो हमारी वेदना को महसूस कर सकें .पूछना तो बहुत दूर की बात है .हमें ही बनाना होगा अपना दोस्त अपना प्रोफेसर ,तब हम जान पाएंगे .’’
’’ वे सोचते है आत्महत्या तो सभी करते है इनकी आत्महत्या भी उसी श्रेणी की है लेकिन ये बहुत बड़ा झूठ है .झूठ .’’नरेश को लगता है कैसे पर्दाफाश करे .
’’नरेश ,हत्यारों के पास होते है शुडू,योग्यता ,हक जैसे हथियार .धीमी मौत के शस्त्र लगातार चलाते रहते है ,फिर वह कालेज हो ,चौराहा ,दफ्तर या टी.वी.अखबार .अब तो नेट भी है .इनसे बचने के लिए रास्ते की तलाश करते है तो आत्महत्या की खाई में पहुँच जाते है .’’उस खाई की तरह जाने वाली अंधी सुरंग में चलती हुई गाड़ी अचानक रुक जाने के बाद वाला अहसास प्रज्ञा के दिमाग से चेहरे पर दिखने लगा .
‘’मैने कोशिश की थी कारण जानने की लेकिन सोर्स इतने लिमिटेट है कि सबके सामने बताने के लिए कुछ खास नहीं मिलता .’’असफलता से थकी हुई आवाज में कहता है नरेश .थोडा रुका फिर कहने लगा ,‘’सब जानते है लेकिन एविडेंस मांगते है. ये बताओं अब तक कहा के एविडेंस मिले है ?गुहाना ,मिर्चपुर.झझर . अकोला ,,,,,,,,,कभी बस्ती जलती है तो कभी बलात्कार कभी हत्या . सब होता है .ये तो होता ही आया है .कोई नही बोलता. अब नये तरीके अपना लिये तरक्की पसंदो ने .नया जमाना है यहॉ इस जगह पहुंचने की किमत हमें चुकानी पड़ रही है .हमारे बच्चों की किमत जान देकर. हत्या, जलाना, बलात्कार के बाद ये आत्महत्या नया तरीका है.’’
‘’कहते है आत्महत्या किस बेस पर कहते हो? न सुसाईड नोट है न साक्षी .मीडिया, पुलिस, कॉलेज सब कह देते है आत्महत्या .बिना जांच किये बिना जाने.सब चुप है .कोई नहीं बताता कि जो भी मरता है वह बिना लिखे क्यों मरता है ....कुछ कहे बिना ,,.बोलता नहीं कोई .. डरते है कि हम रिजर्वेशन वाले है ?”बोलते बोलते प्रज्ञा की आँखे लाल हो गई ,
‘’हम बोलेंगे अब .हाँ हमें फख्र है कि हमारे माँ बाप ने अपनी पूरी जिंदगी हमें बनाने के लिए लगा दी...उनके लिए ..बाबा साहेब के लिए कि उनकी बदौलत है हम यहाँ खड़े .हम कहेंगे कि है हम कोटे वाले .’’
‘’हमारे यहॉ तहरीर चौक नहीं है?’’प्रज्ञा सयंत होकर बोलती है ,तो कहता है नरेश, ,‘’हमारे यहॉ महू है.’’
…………………………………शुरुवात .

3 comments:

mukti said...

अच्छी लगी कहानी. समस्या कोई सीधी सी तो है नहीं कि इसका कोई समाधान निकले. ये मानसिकता का सवाल है. हमें अपने बच्चों को दुनिया का असले रूप दिखाकर ही बड़ा करना होगा. उन्हें लड़ने की ताकत देनी होगी. भेदभाव की ये दीवारें इतनी गहरी हैं कि इन्हें तोड़ना नामुमकिन सा लगता है, लेकिन फिर भी कहीं तो कोई उम्मीद होगी. यही उम्मीद इस कहानी में दिखती है.

ramji said...

अच्छी और सार्थक कहानी ...आज ही यह खबर आई कि एम्स में एक दलित छात्र ने आत्महत्या कर ली...|..हमारे समाज के इस कैंसर का हम सबको मिलकर मुकाबला करना होगा ...|हां..उम्मीद का दामन हमें किसी भी स्तर पर छोडना नहीं चाहिए , यह कहानी हमें यह महत्वपूर्ण बात भी सिखाती है ...बधाई कैलाश जी को...

Dinesh kori said...

Yatharthta se paripurn kahani sabak deti he ki sachchai ka sanyam se samna kar ummeed banaye rakhe aur roshni jalaye rakhe apne bheetar aatma ke roop me. Ise kisi vipreet haalato me na bujhne de.