कितनी दूर हो कि गुफा में हो

       गढ़े नहीं होंगे 
अक्षर 
शब्द के अर्थ बनाये नहीं होंगे 
जबान अभ्यस्त नहीं हुई होगी बोलने के लिए 
सुनते वक्त जो सुना उसे दिल वैसा माने यह रिवाज नहीं होगा 

पर थी आँखे आँखों के पास

आँखों के भीतर देख मिलने 
गुफा में बनाता पत्थरों पर सपने 
ब्रश बनकर जो रौशनी फैलाते होंगेवही पत्ती जो एक डंडी पर खिल रही है आज भी 



भैसा ,हाथी,कछुआ
मछली और बनाकर उस लुप्त हो चुके जानवर को ,
उसकी सवारी कर कहाँ जाने का खयाल आता होगा
पैतीस हजार साल पहले उस प्रेमिका को ..

हाथ में लेकर हाथ कर समूह नृत्य
किस सुर लय साज और बिन गीत
उमंगती हुई तड़फ के साथ कदमताल करता होगा
जानता था वह और उस गुफा के बाशिंदे
अपराध नहीं है प्रेम


दूर कही प्रेमिका बनाती तीर बनकर हिरणी
अपने आपको अपने प्रेम की तरह अमिट रंग से
भेजती होगी फूल अनकहे ,मनचाहे
बनाती होगी मु
तब दिल का आकार तय नहीं हुआ होगा तो
किसे बनाती होगी दिल हरे पान के पत्ते की बजाय

गहरा लाल रंग जब पत्थर पर चित्र में तब्दिल हो जाता होगा
तब क्या तुम्हारे लिए शुद्ध रक्त का लेशमात्र भी खयाल आता होगा ?

कत्थई रंग जमाने की तमाम धूल के बाद भी बना हुआ है अपने मूल में
तुम अब भी वैसे ही हो प्रेमी गहरे लाल रंग से भरे हुए अमिट
तभी तो रची जाती है प्रेम कविता
प्रेम कहानी

तू यह बता

कविता रच रहे थे कि लिख रहे थे कहानी
सूरज को विदा करने के बाद लिखते होंगे डायरी
जिसे कहते है अब शैल चित्र ...



आँख मारना तब आया होगा ?
धडकती होगी ?उसके खयाल मात्र से


आज तुम्हारी धड़कन तुम्हें बेजुबान कर देती है
जबकि तय कर दिया गया है शब्द के मायने और उसके अर्थ
तब भी नहीं है तुम्हारे पास शब्द

कैसे कहे क्या कहे ?में उलझ गए हो
कि

अजन्ता में बोधिसत्व अपने हाथ में फूल लेकर खड़े है

---कैलाश वानखेड़े .
11 फरवरी 2014
====================google से चित्र -साभार .

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