कँटीले तार



कंटीले तार
                                                                                                                               ---  कैलाश वानखेड़े
               पसीना पसीना हो गये.रुके नहीं. जल्द से जल्द घर पहुचना है.आने जाने वाले को दिखे नहीं कि क्या खींचकर ला रहे है. मन ही मन कह रहे है कि सूरज निकले नहीं . अंधेरा ठहर जाये.मॉर्निग वाक पर निकले थे और निगाह पड़ गई इस बबूल की कटी हुई डालियों पर. एक के ऊपर एक डालकर खींचने लगे और आगे जाने की बजाय पीछे मुड़ गए. खुद को तर्क दिया जिसने भी काटा होगा वह बड़ा निर्दयी और पर्यावरण विरोधी रहा होगा. काटने के बाद जलाने के लिए ले जाता.धुंआ बढाता. मेरे इस काम से उसका अगला  पाप रुकेगा मुझे पुण्य मिलेगा. काटने वाला पाप मुक्त हो जायेगा क्योंकि कटा हुआ कटीला बबूल फेंसिग के काम आयेगा. नेक काम है लेकिन अभी कोई देख ना लें.  हालांकि लोग इसे ‘’चोरी’’ नहीं कहेंगे लेकिन कहने वाले कहेंगे,अग्रवालजी खुद क्‍यों ला रहें है?किसी मजदूर को लगा देते! ये मजदूरों का काम और अग्रवालजी....बस इतना ही .इतना ही कहेंगे.काली सड़क पर घसीटते हुए कंटीले बबूल की तरह दिमाग में यही घसीट रहा है,लोग क्या कहेंगे,मजदूरों का काम खुद क्यों कर रहे हो?
       हे भगवान बस थोडी देर और रहने दे अंधेरा . न दिखें चेहरा.बुदबुदाए अग्रवाल .
       चार साल पहले जब वे सिविल लाइन्स के इस मकान में रहने आये थे तब पूरा इलाका सुनसान रहता. डर लगता था मोहिनी को. कोई नहीं निकलता अपने घर से. अग्रवाल समझाते थे ,‘’यही तो है सिविल लाइफ! अपने मे मस्त रहो. इंजाय करो! तुम कभी नहीं रही  न सिविल लाइन में,तुम क्या जानो.’’
        नहीं जान पाई आज तक मोहिनी, ये कैसा इंजाय है सभ्य कहलानेवालों का .
        ये कौन सा तरीका है सुबह-सुबह कांटेदार,कांटो को जोड़ने वाली,खड़ा करने वाली चीजों को लाना और लगाना.मोहिनी ने कहा था ,’’ तुम तो कबाड़ी का काम शुरु कर लो. सिविल लाइनवाला चुन चुनकर कांटे लाता है भला.’’
                    ‘’तुम्हें क्या मालूम सिविल लाइनवालों की पारखी नजर क्या क्या लाती हैं?’’
          अग्रवाल अलसुबह निकलते है तो लौटते हुए ले आते कांटेदार चीजे, ताकि फेंसिग की गैप भर सके ताकि कोई जानवर बकरी,गाय,कुत्ता,मुंह न मार सके भीतर वाले पौधों पर. सब्जी-फूलदार पौधों को हड़बड़ाहट में खाती है गाय बकरीया. गैप में से कुत्ते आते गंदगी कर जाते, बिखरे सामान को नोंचते है.गैप भरने के लिए घर से निकली चीजे जैसे बिजली के तार के टुकड़े,रबर,फूटी हुई बाल्टी का हत्था,तमाम तरह की बची हुई रस्सी,कपड़े सुखाने वाले तार जो सड़ने के बाद अनुपयोगी हो जाते है मतलब जो सड़ता वह इस में गड़ता. अब इतने सारे बबूल की टहनियॉ है. जो बडे बड़े कांटेवाली है, सफेद नुकीले दो-ढाई इंच लम्बे, इस तरह से लगाउंगा कि जानवर क्या कोई बच्चा यदि जैसे तैसे हाथ डालेगा तो सिवाय खून के कुछ नहीं निकलेगा .बड़े प्रसन्न हुए अग्रवाल कांटो को देखकर खून सोचकर. कोई इसमें से घुसने की कोशिश करेगा, तो किस तरह खरोंच लगाते हुए,खून निकालेगें कांटे कि अगली बार उसका बाप भी हिम्मत नहीं करेगा घुसने की. उसकी होने वाली औलादे भी उन निशानों के कारण सोच भी नहीं पायेगी  इन  कंटीले तार के भीतर जाने का. सोचते हैं, खुश होते है.
       अग्रवाल बोलते है,’’ मोहिनी,इस समाज के लिए भी कुछ करना चाहिए! रास्ते के कांटे हट जाये, इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है. उस कांटे से अपना घर सुरक्षित रह जाये, इससे बड़ा सुख क्या हो सकता है...परलोक सुधारने के साथ इस लोक में आनंद मिल रहा है ..और क्या चाहिए ?'' खुश होते है कि कैसे उन्हौंने कंटीले बबूल लाये (चोरी नहीं आता उनके दिमाग में.) जिसने काटा होगा यकिनन वह हगने गया होगा या फिर अपने जवान बेटे को बुलाने या रस्सी लाने.न जाने कितनी देर से काट रहा होगा और कितनी सी देर में मैं ले आया हू .
        सोचते हुए याद आया कि कुछ नहीं बोली मोहिनी तब कंटीले तार को जोड़ते हुए अग्रवाल ने मोहिनी को देखा .मुस्कराती है मोहिनी तो लगता है अग्रवाल को कि अब नहीं लगती मुस्कान ,मादक.कितना कुछ बदल गया.
       ‘’आप कितना डूबकर इसे कर रहे है कि कौन आया,कबसे खड़ा है,आपको पता ही नहीं चला .ग्रेट हो अग्रवाल जी ?’’मेश्राम  ने कहा.
       ‘’अरे...कब आ गए?मै तो कर्म ही पूजा मानता हूँ .जो भी करों डूबकर करो .’’ अग्रवाल पहले झेपें फिर संभले.
               ‘’ बस अभी आये हम..’’
       ‘’ आज कही नहीं जा रहे हो तो हमारे संगठन के कार्यक्रम में आ जाये ..सामाजिक काम करते है ..दीन दुखियों की,गरीबों की ...आज अस्पताल में फल वितरण है .आपको बना देते है चीफ  गेस्ट..’’अग्रवाल के हाथों में अभी भी कांटे है जिन्हें कहा ‘’फिट’’ करना है ,देख रहे है .सोच रहे है .
        ‘’ आज नहीं .अगली बार .अच्छा लगा आप सामजिक संगठनों से  भी जुडकर काम करते है .’’
        ‘’जो भी करों समाज के लिए देश के लिए ...ये देखिये हमारा काम ,आइडिया ...’’ अग्रवाल ने फेंसिग दिखाते हुए कहा .वे सोचते हुए पूरे सिस्टम के बारे में तफसील से बताते हुए,दोहराते है बार बार नये तर्क और उदाहरण से.
          मेश्राम  ,नया पड़ोसी, बरसो बाद इस मकान में कोई आया है, उन्हैं सुना रहे हैं, अग्रवाल.   अस्मिता  और मोहिनी बाते करती हुई खुलें  मैदान में आ गई है .
         सिविल लाईन की सर्पाकार रोड बाई ओर से हरसूद रोड को बाजार की तरफ ले जाती है, उधर स्टेडियम है लेकिन उसे दशहरा मैदान ही कहा जाता है जबकि दाई ओर हरसूद रोड की तरफ मुंह अंधेरें में बहुत सी महिलाए कुछ पुरुष निकलते है. खुला खुला है! न धूल है न धुंआ, अपनी तोंद कम करने, पेट हल्का करने, शुद्ध वायु लेने जाते है और सूरज के आते ही लौटने लगते है अपने अपने घरों की तरफ. कोई नहीं जाता सीधे ,सिविल लाइन के रास्ते. सीधा रास्‍ता गांव की तरफ जाता है, कच्चा है इसलिए उसे नहीं गिना जाता है, रास्ते के रुप में. ज़माना जिसे कुछ नहीं समझता है उसके लिए ही टूटता है मन ,जैसे टूटती जा रही है काली सड़क उस चौथे रास्ते के लिए ,निरंतर .जब  सड़क पर बस आ जाती है, तो कभी कभी चमचमाती कार को न चाहते हुए गांव की तरफ जाने वाले रास्ते पर, डालना पड़ता है और गडढें की शक्ल में बने हुए गांव के रास्ते पर कार के उतरते ही अग्रवाल के मुंह से गाली निकलती है, जो बस वाले के खिलाफ नहीं होती है वह सरकार को देते है और गुस्सा होते  है कि सिविल लाइन में भी इस तरह के गडढें? क्या देखती है...सरकार.वे रास्ते के बारे में कुछ नहीं बोलते. उस कच्चे रास्ते को पक्का कर दिया जाता तो कार, सिंगल पट्टी रोड सिविल लाइन की विरोधी दिशा में खड़े गडढे में न जाती. गांव वालों को रास्ता मिलता ,ये चौराहा बन जाता.अग्रवाल के दिमाग में कभी भी नहीं आता कि इस सिविल सोसाइटी के रास्ते को सीधा गांव की तरफ जाने दे! सोचते है ,क्या मतलब निकलेगा. स्साले बैलगाड़ी वालो को पक्की सड़क की क्या जरुरत है ?जिन्हें आदत हो चुकी कच्चे रस्ते कि उन्हें पक्का रास्ता अच्छा नहीं लगेगा .
         तिराहा उर्फ चौराहा के मुहाने पर पास खाली पड़ी जगह के बाद पानी की टंकी है जिसमें रिसाव है. लगातार पानी टपकता है, उस पानी का उपयोग एक छोटी सी नाली बनाकर, अग्रवाल अपने आंगन में ले आये.तिराहे के कोने में उस मैदान के बाद है अग्रवाल का घर. न, न बंगला. इस बंगले के आसपास घर नहीं है बंगले नहीं है. लम्बी चौड़ी जगह है, खाली पड़ी. F-16 में ही रहते है अग्रवाल और इसे पहला बंगला और नंबर देने वाले को बेवकूफ मानते है. रिकार्ड के हिसाब से ये आखिरी बंगला है, सिविल लाईन का. अग्रवाल कहते है,’’ जो नंबर देते है ना उनमे अकल तो होती नहीं है. अफसर के पास टाइम नहीं है कि किस दिशा से शुरुआत हो .टाइम तो मेरे पास भी नहीं है लेकिन बिना नागा मॉर्निंग वॉक पर जाता हूं.शुद्ध वायु को फेफड़ो में डालता हूँ , फेफड़ा मजबूत होना चाहिए तोंद का क्या है. भीतर मजबूती होना चाहिए. मजबूत फेफड़ा चाहिए.’’
                अग्रवाल की खिड़की पानी की टंकी की तरफ ही खुलती है, खिड़की में एक परदा रहता है,घूंघट की तरह. उसी परदें में से दिन में कभी कभार मोहिनी को सड़क के नजारे दिख जाते है.बाहर वालों को नहीं दिखता कि कोई परदे में से देख रहा है, कमरे में अंधेरा होने से.उस खिड़की के सामने प्याऊ का पिछवाड़ा है, जो टाट से ढंका है.पानी की टंकी से पानी टपकने की मात्रा घट गई, सड़कों पर आने जाने वाले कम हो गए. उन्हीं दिनों की इतवार को धूप में खड़े है कि चमड़ी न जला दे, इसी ख्याल से नीम व अनजान,अनाम पेड की घनी छाया में अग्रवाल है चिंतित और गुस्से में .छांव उनके बंगले से बाहर है .वे छांव में है.ढलती हुई शाम की धूप में तीखापन महसूस होता है .
      '’ये नाटक समझ रहे है आप. चार टाट, छः काले मटके. बिठा दिया एक आदमी...वो सामने...टंकी के पास.'’ अग्रवाल धूप से  नाराज न थे.
                '’सार्वजनिक प्याऊ है. आने जाने वाले को  पानी पिलायेगा.'’ मेश्राम  सहजता से बोले, उनके लिए ये कोई '’मेटर'’ नहीं बना.
                '’सब लफंगे है, बदमाश.कोई और ठिकाना न मिला, तान दिया यही. अब यही आनी जानी को घूरना,छेड़ना, सिगरेट दारु....पता नहीं क्या क्या करेंगे.?ये टाट....कितने दिन रहेगा ?  सड़ेगा ..फटेगा ..फिर खुलापन. फिर कौन रोकेगा. छः मटके में से पानी भी पिलाये या नहीं, कौन पूछता है. देख लेना आप ये अपनी वाली पे जायेंगे.'’मन नहीं लग रहा अग्रवाल का. चिंता से भरे हुए भविष्य की ओर देख रहे है.
                '’पुण्य का काम है. आप ही लोग कहते है.'’
                '’कहना अलग बात है,कौन भरी दुपहरी में अपने घर पर अजनबी प्यासें को पानी पिलाता है? पुण्य-वुण्य कुछ नहीं है. सब टोटके है.'’ अग्रवाल की बातें सुनकर चली आई मोहिनी छाया की तलाश में. अस्मिता भी हो गई हाजिर, चौड़े मैदान में .नीम पर बैठी है चिड़िया, उसी जगह रस्सी डालकर झूला बनाया जा सकता है ,अग्रवाल को लगता है .
                '’हम तो मजबूरी में आये. सिटी में वो एक जगह मकान फायनल हुआ लेकिन बाद में वह  मुकर गया वरना शहर से बाहर रहने का मन नहीं होता. '’मेश्राम  बोल रहे है तब उन्हैं अग्रवाल की बजाय चिड़िया दिख रही है.
                '’अच्छा ही हुआ, वरना हमारे पड़ौसी नहीं बनते...ये आपके मकान वाली जगह है ना, सरकारी है. लेकिन तान दिया मकान. आपका मकान मालिक दम वाला आदमी है.अपने को क्या...अपने दिन कट जाय,चैन से.बस .'’
                '’मकान तो इनका भी है इंदौर में .. '’अग्रवाल के बोलते ही मोहिनी ने हस्तक्षेप किया.
                '’पिता के नाम है पिताजी की कमाई. अब उसमें से वो बेटियों को देना चाह रहे है.छोटी वाली पड़ी रहती है इंदौर में.ससुराल छोड़कर.उसके पीछे पीछे उसका आदमी चला आता है. उसे क्या? ट्रेक्टर शोरुम खोल रखा है. नौकर बिठा दिए. नजर गाड़ ली ससुर की सम्पति पर. पिता समझते ही नहीं. बेटी दामाद को घर में घुसाकर रखा है. बोलते है बुढ़ापे मे सेवा कर रहे है....सेवा....?जायदाद हड़पना चाहतें है और बुढ़ऊ को लगता है सेवा कर रहे  है .मैंने अपनी  हिस्सेदारी, वसीयत की बात की तो दो टूक सुना दिया,तुझे नहीं मिलना इसमें से कुछ....हद है बेटे को न देकर बेटी को देंगे. अजीब कानून है. मुझे तो कानून बनाने वालों पर तरस आता है. बाप की सम्पति पर बेटी का हक कैसे हो सकता है ? पढाओं लिखाओं शादी कराओं, दहेज दो फिर कैसा हक ?अरे कन्यादान के बाद किसकी कन्या कैसी कन्या वह तो हो जाती है किसी की औरत ?'’
                '’तुम्हारी भी बेटी है. बेटी के बारे में ऐसा सोचते हो.'’ चिड़िया ने उड़ना मुनासिब समझा नहीं और मोहिनी ने गुस्से से कहा.
                '’ बेटी है, तो बेटी की तरह रहना चाहिए. मैं तुम्हारे बाप के घर एक दिन भी नहीं रुकता. दामाद को रुकना ही नहीं चाहिए पर निस्सड़लों को क्या कहे.'’
           अस्मिता ने मोहिनी से  कहा, '’आप तो हमारे घर आइये. बैठते है.'’
                    '’अरे नहीं, बच्चे अकेले है, उन्हैं छोड़कर नहीं जा सकती.'’ मोहिनी बोली.
         अग्रवाल बोले,’’उनकी चिंता मत कर, आ जायेंगें.चल जरा मूड़ चेंज हो जायेगा. ऐसा कर ताला लगाने का बोल और आजा.’’

 
           ताला लगाने के लिए अस्मिता  भी मोहिनी के साथ जाती है .रुक जाते है मेश्राम  और ठिठक जाते है अग्रवाल .    
         ‘’एक बात बताऊ आपको, मोहिनी शुरु में बहुत बोलती थी,वो बोलती मैं सुनता और मन की करता.सुनना अपनी भी आदत है. सुनो लेकिन औरतों की बातें दिल से न लगाओ. जब सुनो तब दिमाग कही और लगाओ अगर मैंने यह फंडा नहीं अपनाया होता तो मोहिनी की बातें सुन सुनकर,कब का पागल हो जाता. सुन न ले वरना...‘’वे धीमें से बोलकर हंसते है और मेश्राम के घर की तरफ सबसे आगे अग्रवाल चलते हुए बोलते हैं.पीछे से अस्मिता और मोहिनी आ रही है .चिड़िया अपनी जगह बैठी रही देखती रही.चिड़िया उड़ी नहीं.उन्हें देखकर भी नहीं उड़ी चिड़िया तो अग्रवाल के दिमाग में से कुछ उड़ गया. उन्हें लगा इतनी हिम्मत कहाँ से आई इस नन्हीं सी चिड़िया में? 
         ''ये मार्केट में भी ऐसा ही करते है आगे-आगे जाना फिर झुंझलाना  दो मिनिट का भी सब्र नहीं.तेजी से आगे जाना और धैर्य  खोना. इनकी आदत है, फिर वह मार्केट हो या..’’मोहिनी बोली तो उसके चेहरे पर शरारत उभर आई. सचेत रुप में आगे बोलना छोड़ दिया.
                अस्मिता चुप है .उसकी चुप्पी को झिझक समझकर  बोली मोहिनी,'’ हमारे यहॉ तो खुला ही बोलते है सब.हमारे जेठ तो अक्सर कहतें है, कहॉ घुसा रहता है? बिल में से भी निकलाकर.'’ हंसती है मोहिनी कि तत्काल चुप हो जाती है.अग्रवाल के दोनों बच्चे दौड़ते हुए आये और मेश्राम  के घर में  घुस गये.बच्चों के बाद सब भीतर दाखिल हुए.
                '’अरे आप चाय क्यों बना रही है? अग्रवाल ने मेश्राम  के घर में घुसते ही हंसते हुए कहा.
                '’कॉफी या ठंडा. क्या लेंगे?'' अस्मिता बोली.
                '’ये चाय, कॉफी नहीं लेते.बाबा के भक्त है..मैं और मेरा बेटा चाय पीता है.'’ मोहिनी ने कहा.
                '’मैंने तो स्वाद भी नहीं चखा, बचपन से अभी तक और बेटे को चाय की आदत लग गई.पता नहीं किस पर गया?'’बोलते बोलते अग्रवाल बैठ गये सोफे पर .
                 '’मुझे भी पता नहीं किस पर गया ?'' मोहिनी सपाटता से  बोली.
                 ''फिर किसे पता है?'' मेश्राम  ने हंसते हुए कहा तो सभी के चेहरे पर हंसी आई.
                 ''भाईसाब आप भी हमारे जेठ की भाषा बोलने लगे है .''मोहिनी शरमा गई.
                 ''आपके जेठ.... ?''
                 ''रिश्तें में लगते है, है नहीं. मैं इकलौता हूं.'' अग्रवाल ने तत्काल हस्तक्षेप किया .
                  ''इकलौते..? दो बहनें भी है. भूल गये?''मोहिनी बोली अपने पल्लू को ठीक करते हुए .
                   '’उन्हैं कौन भूल सकता है.सारी प्रापर्टी उन्हीं को मिलेगी.पता नहीं कैसा कानून है?  मुझे  तो कानून बनाने वाले अम्बेड़कर पर गुस्सा आता है....वो तो  उसी समय राष्ट्रपति अड़ गए थे, वो जानते थे. इनका क्या? इनके पास प्रापर्टी थी नहीं तो कैसे जानेंगे कि प्रापर्टी में औंरतों का हक होना चाहिए या नहीं. ''अग्रवाल ने अपने दोनों हाथों से बिस्कीट तोड़ा,जो मोहिनी को अच्छा नहीं लगा .वह कई बार टोक चुकी है, दोनों हाथ से नहीं तोड़ते बिस्कीट या रोटी. अग्रवाल समझ गये कि मोहिनी ने बातों की बजाय बिस्कीट तोड़ने पर ध्यान दिया लेकिन अस्मिता बोल उठी,''एक बाप की तीन संतान है. सब बराबर है. आदमी-औरत का भेद क्यों ? डां अम्‍बेडकर ने जो किया वह कोई नहीं कर सकता है?''
                  '’आदमी आदमी होता है. औरत औरत, क्यों भूल जाते है. दोनों में जमीन आसमान का अंतर है.'’ अग्रवाल ने बिस्कीट मुंह में डाला.
                '’क्या अंतर है?'' मोहिनी बोली.
                '’अब तुम्हें भी समझाना पड़ेगा? यहां बताउ या घर में.... ''अग्रवाल हँसते हुए बोले.
          ‘’ आपने अम्बेडकर को पढ़ा..समझा  ..कैसे बोल रहे है आप ?’’ मेश्राम  को झटका लगा.बिना जानकारी के किसी के खिलाफ कोई कैसे बोल सकता है.
            ‘’क्या क्या पढ़े भाई साहब ?साइंस था,तो कैसे पढ़ सकते है..लोग कहते है तो बस..मान लिया .’’
             ‘’ अच्छा खासे पढ़े लिखे होकर ..इस  तरह की  बाते कर रहे हो ?’’ मेश्राम   ने कहा .
            ‘’इनकी तो आदत ही है हर जगह टांग घुसाने की .’’ मोहिनी ने कहा .उसके दिमाग में समझ वाला ताना अटका हुआ था .
           ‘’...छोड़ों जमाना जानता है, चलो यार फटाफट खाओ.’’ अग्रवाल को कुछ सूझ नहीं पड़ रहा है .
                ''इनकी तो आदत है जल्दबाजी  की...’’मोहिनी ने बिस्कीट उठाते हुए कहा व्यंग्यात्मक रुप से.
                  '’हमारे ऋषि मुनियों ने कहा, जल्दी सोओ...जल्दी उठो. जल्दी का फंडा तो उनका है मेरा नहीं        है .''अग्रवाल बोले.
         '’आपके ऋषि मुनियों को कमाना-धमाना पड़ता नहीं था. सुन्दरियो को लाते  बाबा लोग और  मौज-मजा करते, मस्त रहते, उन्हैं क्या मालूम जल्दी सोने के नुकसान, वो तो मैं जानू.'’ मोहिनी ने कहने के बाद बिस्किट जुबान पर रखा .
                '’ऋषि मुनियों की भी पत्नी....पत्नीयॉ होती थी फिर भी ध्यान लगाकर बैठते थे. क्या नुकसान होता था उनका? हष्ट पुष्ट रहते क्योंकि उनकी कई पत्निया होती थी. ये है राज, हष्ट पुष्ट बलिष्ट होने का . तुम क्‍या समझो?.’’अग्रवाल ने कहा .
       मेश्राम असहज होकर किचन की तरफ जाते हैं जबकि उनके दिमाग में से चिड़िया नहीं जाती है . अस्मिता चाय बना रही है.  
     '’किसने रोका पत्नियॉ बनाने को? आजाद हो. दम हो तो कर लो चार छः .कुछ नहीं बोलूगी मैं, जानती हूं एक को ही .. '’चुप हो जाती है मोहिनी लेकिन चेहरा बोलता है.तन बोलता है. जितना बोलता है चेहरा, उतनी जुबान नहीं बोलती. बोलतें है उपहास, व्यंग और दोहरे अर्थ.
                  '’हॉ हम बहुत आजाद है. इतनी मंहगाई है कि एक की ही डिमांड पूरी नहीं कर पाता हूँ  तो बाकि का क्या होगा. '’अग्रवाल वार्तालाप को सामान्य करने  के लिए बोलते है, तो बोल पड़ती है मोहिनी,'’ कौन सी डिमांड? न मन से रहना न तन से गहना.....तन मन सब तरसता है. हर हसरत रुपये पैंसो से पूरी नहीं होती है.''
                 लगता है अग्रवाल और मोहिनी झगड़ पडेंगें, तभी  अग्रवाल बोलते है, '' कुछ रहने भी देगी या आज ही उतार देगी पूरा. बोलते बोलते हाथ जोड़ते है. दोनों हाथ में लगे हुए बिस्कीट के भाग को हटाने के लिए एक दूसरे से झाड़कर  जबान से होंठ को साफ करते है, जो मोहिनी को बेहद नागवार गुजरता है.वह उठकर किचन में जाती है .मोहिनी को देखकर मेश्राम  किचन में से बाहर निकलते है .
       मोहिनी का गुस्सा बरकरार है .वह कहती है ,’’ इनकी आदत तो आदत मेंटीलिटी भी गिरी हुई   है .’’ अस्मिता के दिमाग में चल रहा है, क्या नाश्ता बनाया जाये ?मोहिनी की बातों को सुनकर दिमाग नाश्ते के खयाल को भगा देता है .मोहिनी फिर बोलती है ,’’ ये अपनी सगी बहनों के बारे में अंट शंट बोलते है कि सुना नहीं जा सकता है .इन्हें लगता है आदमी के नीचे ही औरत होती है और इसी कारण मेरे ऊपर ही होते है .कभी बोलती हू मै हो जाती हू उपर ..लेकिन नहीं .उन्हें सहन ही नहीं होता .फिर तो मैंने भी यह करना शुरू किया कि जब उनके टपकने का वक्त आता तो धकेल देती हू .बाहर टपकाओ.जैसे को तैसा ....’’
      अस्मिता कुछ नहीं बोलती और चाय को कप में डालती है कि टपक जाती है चाय की कुछ बूंदें .ले आती है चाय कमरे में .
                चाय की ट्रे में से मोहिनी कप उठाती है.
                    अस्मिता और मेश्राम  दर्शक बन गए अपने ही घर में. बातचीत का कोई सिरा पकड़ में नहीं आ रहा  है .अग्रवाल के दोनों बच्चे बेडरुम में ऊधम मचा रहे है. लगता है कुछ गिर गयाहै .अस्मिता उठकर देखना चाहती है लेकिन चुप है. चुप है उनकी बेटी विभावरी, अपने मां-बाप के पास खड़ी. वह नहीं खेल रही उन बच्चों के साथ, अग्रवाल के बच्चे खेल रहे है आपस में बेडरूम में.ये दोनों बोल रहे यहाँ .क्या कहा जाये समझ में नहीं आ रहा है.
               चाय के कप थे या तनाव का असर कि चुप्पी रही .चाय खत्म हुई .
          मेश्राम  ने चुप्पी से भरे गुब्बारे को पकड़ने की कोशिश करते हुए कहा ,’’आप तो सिविल लाइन की लाइन की जगह सोसाइटी लिखवा दो .’’
           ‘’आपने तो मेरे मुहँ की बात छीन ली .वैसे भी  ‘’लाइन ‘’से घिन आती है ,राशन की लाइन लगती है .मांगने ,खडा होने ..इंतजार का भाव आता है .’’ अग्रवाल के चेहरे पर चमक आ गई .
                   ‘’हम लोग तो राशन..कंट्रोल की दूकान को सोसाइटी कहते है .सोसाइटी में सेल्समेन राशन बेचता है..’’
         ‘’आप कुछ भी कहो अब तो सोसाइटी से लगता है कुछ है हम .हटकर’’
       ‘’ अंग्रेजों ने बनाई थी सिविल लाइन .अलग लोग .अलग दुनिया .अब भी है अलग दुनिया .वहाँ सोसाइटी वाले वे ‘’वाल ‘’है यहाँ आप अग्र वाले ‘’वाल‘’ .’’मेश्राम  ने कहा .गुब्बारा अपने हाथ में महसूस करते हुए .
       ‘’वाल पर ही टिकी है टीम.अकेली ‘’वाल ‘’है जो सब डीसाईट करती है...करते है, रेवेन्यू की छोड़ के नौकरी .’’ अग्रवाल करता ,करती .करते में अटकते हुए कहते है .
       ‘’दूसरे ने नौकरी नहीं छोड़ी वे कहते है जिन्हें भैस चराना था उन्होंने देश चलाया. इस लिहाज से  देश चलाने के लिए तो ‘’ वाल ‘’ नही बने है.उन्हें तो धंधा करना चाहिए.है ना .’’ गैस से भरा गुब्बारा  मेश्राम  ने छोड़ दिया .
       ‘’देश मुसीबत में हो तो ‘’करो या मरो’’ का काम पड़ता है .दूसरी  आजादी के लिये .वो अगस्त ये अगस्त .आजादी तो ले के रहेंगे .समझे आप ?’’ मुस्कराहट में छिनने का भाव था .
      ‘’किससे लोंगे...किसे कहोंगे ,देश छोड़ने का .?मेश्राम  ने चुनौती दी कि ऊपर जाते हुए गुब्बारे को पकड़कर दिखा तो.
      ‘’ अब ये भी बताना पड़ेगा..? छोडो जी. टीवी पे मैच देखना है .आदमी का क्या है इधर टीवी में घुसो या बीवी में.....चलो.‘’हताशा से भरे हुए अग्रवाल के भीतर का गुस्सा हौले से निकला . वे उठे और बीवी को देखकर मेश्राम से कहने लगे ,’’अच्छा मिलतें है....हमारा ऐसा ही चलता है.आदत हो गई है .आप अदरवाइज मत लिजिएगा.ओके . बाय.''
      उठते ही तेजी से जाते  है कि मौका ही नहीं मिलता कुछ कहने का.अनपेक्षित लगा इस तरह से      जाना .मोहिनी बच्चों को डांटती हुई ले जाती है .मेश्राम ,अस्मिता और बेटी विभावरी राहत की सांस लेते        है .बेडरूम में सामान बिखर गया है  .विभावरी सात साल की कहती है ,’’ कितने गंदे बच्चें है .
          मेश्राम  कहते है ,’’बच्चें है .मस्ती तो करेंगे न. चलो तैयार हो जाओं .पार्क में चलते है.’’
               
                    स्वतंत्रता दिवस की सुबह की धूप तीखी नहीं है .छुट्टी है .अग्रवाल नहीं नहाये अभी     तक .अपने बगीचे में आये फूल फल देखते हुए नजर जाती है मेश्राम  के दरवाजे पर .इन्तजार कर रहे है.मेश्राम  कम ही निकलते है .अपना घर और दफ्तर उन्हें बाहर आने का मौका नहीं देता .रहा नहीं जाता है तो मेश्राम  के घर अग्रवाल चले जाते है .दरवाजे के पास खड़े-खड़े कहते है ,’’क्या कर रहे है ?’’
       जवाब नहीं आता मेश्राम खुद चले आते है .’’बस पढ़ रहा हू .’’
       ‘’ कब तक बच्चों की तरह पढते रहोगे ?’’ अग्रवाल हंसते हुए बोलते है .
         ‘’ पढता हू तो सीखता हू.क्या कह रहा है आपका बगीचा ?’’ घर से बाहर आ गये दोनों .मैदान हरा हो गया है ,उस पर चलते है.बोलते है ,देखते है .अस्मिता आ गई और उधर से मोहिनी .नहीं आये दोनों के
बच्चे .अपने अपने घरों में टी.वी .के सामने बैठे है .
          अग्रवाल बोलते है  ,'' अब तो झकास है. एक्चुली बात यह है कि जब हम आये थे इस बंगले में रहने तो कुत्ते आते थे, सामान नोंचते.. वो तो ठीक था लेकिन गंदगी भी करते, देशी कुत्तों की शी....शी इतनी गंदी होती है कि सात दिन तक दिमाग से नहीं जाती, फेंकना तो मोहिनी को ही पड़ता था .वो फेंकने वाले लाट साब इधर आते ही नहीं. आते तो सूअर है , वे घुम घुमाकर यही अपनी पीठ खुजाते थे .अब कोई भी जानवर खुजला नहीं सकता  है .’’ अग्रवाल ने पीठ खुजाली . अग्रवाल को खयाल आया कि वे कोशिश करके देख ले कि जानवर कैसे अपनी पीठ खुजलाते है. हाथ नहीं पहुंचता वहां उसी जगह खुजली होने लगी. मोहिनी से कहूंगा तो भी नहीं करेगी खुजली.वे असहज हुए फिर कहने लगे ,’’कहां गंदो की बात कर रहा हूं.बात ये है जितने भी गहने है,महंगी चीजे है सब लॉकर में है बस सस्ती चीज है जिसे मैं भी  नहीं उठा सकता उसे गंदे संदे बच्चे भी उठा नहीं सकतें.एक्युचली चोरी वाली प्राब्लम नहीं है. प्राब्लम है गंदे संदे बच्चे.''
          समझ नहीं पाई अस्मिता न ही मेश्राम  .अपनी रो में बोलते है अग्रवाल .अग्रवाल के लिए कंटीले तार लगाये जाने के सिस्टम के बारे में बताते है फिर बात बहस मौका कुछ भी हो .अग्रवाल के कहने के बाद कोई नहीं बोला तो बोलते है फिर अग्रवाल ,''हम भी बच्चे थे तो घुस जाते थे फेंसिंग में से और टंगी हुई रंगीन अंडर गारमेंन्ट पर लिख देते थे...जो सफेद होती उस पर कोयले से ...बड़ा मजा आता था. वो भी क्या दिन थे.‘’ अग्रवाल के भीतर किशोर मन उतर आया .चेहरे पर शरारत.
        ''आप कहॉ पर है?'' मोहिनी टोकती है. ऑख बडी दिखती हैं मो‍हनी की.
        ''मैं तो कहु भ्रष्टाचार बहुत बढ़ गया है. इसे मिटाने के लिए सरकार को दूसरे गांधी की बात मान लेनी चाहिए.सच कह रहा हूं मैं. है न .‘’अग्रवाल पत्नी की तरफ देखते हुए पूछते है,मेश्राम  से.दिमाग में रंगीन कपड़े और कोयला आ गए है. कोयला जिससे लिखते थे वह अब जल रहा है दिमाग में.
          ''कौन सा भ्रष्ट्राचार? किससे मिटेगा?’’ मेश्राम  तत्काल बोले वरना बोलने का मौका ही नही मिलता.
            ‘’भ्रष्ट्राचार....? भ्रष्ट्राचार होता है. टी.वी. अखबार नहीं पढ़ते आप...’’
                      ‘’वो तय करेंगे कि किसे भ्रष्ट्राचार कहे और कौन मिटायेगा. वो जिनका पहला पेज पूरा का पूरा उंची उंची इमारतों के विज्ञापन का होता है, कपड़े धोने के पावडर का होता है या सोने चांदी की दुकान का होता है.टैक्स चोरों के होते है और ...न्यूज चैनल ? उनका तो बस विज्ञापनों से ही जीवन चलता है.’’लगातार बोले मेश्राम.
              ‘’लोकतंत्र का चौथा खंभा है और साथ में टीम है,दोनों मिलकर भ्रष्टाचार मुक्त कर देंगे देश को.‘’
        ‘’राडिया कांड भूला दिया न. जिनके टीवी है, अखबार है, वे उद्योगपति तय करते है कि कौन बनेगा   मंत्री ? वे तय करते है कि समाचार के नाम पर  क्या दिखाए ?उन्हौंने अपना चेहरा धोने के लिए और बड़े-बड़े घोटालों से ध्यान हटाने के लिए बस एक ही बात कही है, दिखाई है दिन रात.क्यों किया सीधा प्रसारण. क्‍यों?''
        ''आप नी समझ रहे है. इससे क्रांतिकारी चेंज आयेगा! चेंज! राशनकार्ड,पेंशन से लेकर बडे़-बड़े भ्रष्टाचार खत्म हो जायेंगें. खलास .''अग्रवाल हंसे.हत्या की बजाय वे खलास बोलकर खुश हुए.
                ''राशनकार्ड स्थानीय निकाय...ग्राम पंचायत या नगरपालिका बनाती है. पेंशन भी वे ही देखती है,उन पर लागू होगा?””
           ''हॉ हॉ क्यों नही.प्यून से पी एम तक .''
                 ''सेन्ट्रल का एक्ट सीधा उन पर लागू नहीं होता है.''
         ''एं...... ''
        ''निजी क्षेत्र है, बहुत बडा  इसकी तरफ हमारा ध्‍यान जाने नहीं दिया जाता और हमारी बैंकों का ढांचा देखा है? कितना खोखला और गडबड है, उसका कुछ नहीं होगा और ये ढेर सारी सहकारी बैंक है ना इन पर भी नहीं.''
        ''क्या बात कर रहे है. जब चपरासी घेरे में आ जायेगा तो...’’
         ''चपरासी,किस विभाग का?''
          ''सब देश के सारे चपरासी. सारे बाबू अफसर सारे मंत्री. सारे के सारे फिर कौन बचेगा?'' कहते कहते लगा आँखे निकल आयेगीं अग्रवाल की .सोचा कुछ बाकि बचा नहीं .अब ..अब क्या बोलेगा मेश्राम .सारा आसमान कैद में होने के भाव के साथ देखने लगे अग्रवाल .
         ''ठेकेदार. बड़ी बड़ी कंपनिया .जो अब रोड बना रही है जो बिजली का काम देख रही है,जो खाद बीज बनाती है ..तमाम चीजें बनाती है और अपने हिसाब से दाम तय करती है.वे बचे है .बहुत बचे है.''
         ''आप कुछ भी कहो. भ्रष्ट्राचार को समाप्त होना चाहिए .’’
        ‘’बेशक खत्म होना चाहिए लेकिन अपना भ्रष्ट्राचार नहीं दिखता है ? प्रशासनिक सुधार किये बिना भ्रष्ट्राचार खत्म नहीं हो सकता है .लोगों पर भरोसा करिये ,उनके शपथ-पत्र पर प्रमाण पत्र हाथों-हाथ दीजिए .झूठे को कठोर दंड दो ..प्रक्रिया बदलो भई ..प्रक्रिया .’’गुस्से को संतुलित कर बोले मेश्राम  .
         ‘’भ्रष्ट्राचार खल्लास ­करना है तो टीम की बात मान लेनी चाहिए.''
            हा भई करो खल्लास. कौन रोक रहा है ?सबको पढने को तो दो कि कौन कौन इसके दायरे में आयेंगे ...ये बताओं  इतने सारों  को कंट्रोल  कौन करेगा?''
         ''टीम है ना...उनके साथ ईमानदार,देश भक्त लोग होगे,जो प्रदर्शन कर रहे है.''
        ''लाखों कर्मचारियों को कंट्रोल करने के लिये इतने ईमानदार देशभक्त कहां से लायेगे अग्रवालजी?'
        ‘’हमारे देश का टैलेंट है ना ..’’
       ‘’वो तो चला गया विदेस में ,देश सेवा छोडकर .’’
      '’ अब जायेंगे ही न देश छोडकर ..अरे हमारे देश में ईमानदार ,प्रतिभाशाली को मौका ही नहीं मिलता. सारी गड़बड़ तो बस रिजर्वेशन से है. पहले तो एससी एसटी का कोटा था अब ओबीसी का बढ़ गया. आधे से ज्यादा. इस कारण ईमानदार, देश भक्तों को नौकरी ही नहीं मिल रही है.''
       '’बिना रिजर्बेशन वाले ही है देश भक्त ? अगर वे ही है ईमानदार तो फिर भ्रष्टाचार कहॉ से आया?'' मेश्राम  ने आँखे डाल दी अग्रवाल की आँखों में .
        ''कोटे से और क्या? अग्रवाल ने बोलते हुए आँखें नीचे की और अपनी एडियाँ रगडने लगे .लगा वे गन्दगी कर रहे है उन्हें समझ में नहीं आ रहा क्या कहा जाये .क्या किया जाये .
       ''सारे के सारे दफ्तरों में विदाउट रिर्जेवेशन वाले भरे पड़े है. फिर अब क्यों जरुरत पडी टीम की?'' मेश्राम  को लगा अग्रवाल आँखे उठायेगे लेकिन अग्रवाल अपनी फटी हुई एडियों में व्यस्त हो गये.एडियों की रगड़ से निकला हुआ मैल जमा होने लगा.
        ‘’आप भी पता नहीं कहां से कहा पंहुच गए.मोहिनी,चाय बना यार.यही पीयेगें धूप सेंकते सेंकते.’’
       ''आप अच्छी बनाते है, जरा बनाना तो...’’मोहिनी बोली अग्रवाल से जो दूसरे कोने में अस्मिता  से बात कर रही है.
       ''ओ मैडम वो तो बस सुबह बनती है मुझसे.बाद मे नहीं बनती है.तुम भी....बना लो मैडम....रोज रोज सुबह महारानी को बेड टी देता हूं?''
      ''ये बहुत ही अच्छी चाय बनाते है, जरा बनाओ तो.'' मोहिनी की मुस्कारहट मादकता में बदली.
      ''मैंने कहा न सुबह-सुबह ही बनती है और वह भी बस तुम्हारे लिए! तुम बताया मत करो वरना मेरे बॉस को मालूम पड़ जायेगा तो वह चाय भी मुझसे ही बनवायेगा.''
       ''क्या नहीं करवाता है तुमसे? कंपनी का हर काम तो करते हो. फिर चाय में क्या खराबी है.''
       ''तुमने क्या मुझे ठेलेवाला, समझ लिया.''
       ''समझना क्या है?कम्पनी का आदमी कुछ भी कर सकता है,वह कांटे खींचकर उठाकर लगा सकता है तो फिर चाय बनाने में .. ''मोहिनी मुस्कुराते हुए बोली.
      ''तू जा तो,कुछ भी...समझती ही नहीं.सिविल सोसायटी में रहने के बाद भी समझ में आ जानी चाहिए, पर तुम .. कैसे समझोगी?''
       ''सब समझती हूं. आप समझे तब ना. ''उतर गया चेहरा मोहिनी का.
       ''चाय का ठेला लगवाना चाहती है? गजब है यार, हमारे खानदान में सोचा तक नहीं गया और तू जुबान पर लाती है, ये काम....ये काम तो बस उन लोगों के लिए सुरक्षित है जिनके लिए .. चल....दिल छोटा न कर चाय पिला.  वैसे भी तू कोटे में आ रही है .सब एक जैसे हो जायेंगे तो क्या हो जायेगा इस देश का ?''
       '' आप देश का और कोटे का टेंशन मत लो. ये बताओ ..कंपनी ... ? आप कंपनी में काम करते है.'' आश्चर्य से पूछा मेश्राम ने .गुस्सा आ रहा था .
              ''हॉ?''
             ''फिर सरकारी मकान में....मुझे तो लगा कि आप सरकारी विभाग में अफसर होंगे.''
               ''आप चार महिने में जान नहीं पाये हमें..आश्चर्य है. हम तो चार दिन में सामनेवाले की पूरी कुंडली जान लेते है....खैर इसकी भी लम्बी कहानी है. पिताजी एजुकेशन में अफसर थे. उनकी बड़ी हसरत थी बेटा सरकारी अफसर बन जाये लेकिन सरकारी नौकरी में योग्य लोंगों को कभी अवसर मिला है? खूब प्रयास उपरांत भी....और वो क्या है बैन लगा दिया था सरकार ने. सच तो यह है कि नौकरी वो भी सरकारी...गुलामी मुझे पसंद नहीं थी. मैं तो चाहता था बिजनेस करु. बिजनेस घराने का खून दौड़ रहा था लेकिन पिता धंधे में उतरने के विरुद्ध थे. वो गांधीजी ने गड़बड़ कर दी. अब देखों न वकालत के लिए पढ़ें और पुश्तैनी धंधा छोड़ दिया, मेरे बाप की तरह. दूसरी तरफ बोलते हैं वर्ण व्यवस्था कर्म आधारीत है इसलिए  उसे वही काम करना चाहिए जो उसके बाप दादाओं ने किया हो .पर खुद ने किया उलटा. नेता जो ठहरे.हमारे बाप और बापूजी में कोई अंतर नहीं है.हम बाप-बेटे में खटपट चलती रही फिर मेरी  उमर निकलने लगी तो दूर के रिश्तेदार के माध्यम से पिता ने कंपनी में फिट करवा दिया. कंपनी वालों को सिविल लाईन में सरकारी मकान मिल नहीं सकता, पिताजी का सपना था बेटा सरकारी बंगले में रहे ,इसे उनके दोस्त दीनदयाल गुप्ता...डी.डी. गुप्ता ने पूरा कर दिया. वो अपडाउन करते है.उनके नाम अलाट था यह बंगला, उनसे बोल बुलाकर हम आ गये. उनका भी फायदा हमारा भी .हमारा तो यह कि एक तो  पिताजी का सपना पूरा कर लिया उपर से सिविल लाईन में ठाठ से रहते है .इस बंगले के सरकारी किराया साढ़े सात सौ के बदले हम उन्हैं दो हजार रुपये हर महिने बिना नागा किये भिजवा देते है .’’
                  '’मुझें साढ़ें पांच हजार देना पड़ रहा है.गजब खोपड़ी है.'’ मेश्राम आश्‍चर्य में पड़ गये.
                '’हम लोगो का खोपड़ा भी... '’मुंह को अजीब सी आकृति देते हुए कहा ...बड़ा तेज होता है.'’ मेश्राम  ने अनसुना किया .पडौसी है ,बस इसीलिए सहन कर रहे है .समझते है अग्रवाल इसलिए वे वापस अपने पसंदीदा विषय पर आ  जाते है .''मजबूत ऑगन होना चाहिए ताकि कोई गंदे संदे बच्चे न आ जाये इसीलिए फेंसिंग के पास रतनजोत लगाये , हरे-बैंगनी चमकदार पत्ते वाले इन पौधों को कोई भी जानवर नहीं खाता है. दो साल पहले रतनजोत के बीज रेस्ट हाउस के पीछे वाले बच्चों ने खाए थे तो बीमार पड़ गए. बीमार. स्साले...'' वे खुश हुए, क्रूरता चेहरे पर आई उसे समेटा फिर कहने लगे.''.. अब नहीं आयेगें इधर. उनका बाप भी पैर नहीं रखेगा. सारा टेंशन खत्म . ‘’ अग्रवाल के बाप ने भी पैर नही रखा कभी  इस बंगले में.
       ‘’मोहिनी इसके फल तोड़ती और हंसती है. देखो...अभी भी हंस रही है. रतनजोत को तोड़कर फल के अंदर की आकृति के आधार पर निर्धारीत होता है कि वह राजा है या रानी. दो ऑंखे मुंह जैसी आकृति बनती है. राजा निकले तो मोहिनी बेटी को देती है और रानी निकले तो बेटे को. बेटे को ज्यादा से ज्यादा रानी मिले इस ख्वाहिश में वह कई राजाओं को रानी बताती है लेकिन हम एक और रानी की बात करें तो ..बातों में भी नहीं देती रानी ..इसी से काम चलाना पड़ता है. किस्मत है अपनी अपनी.''बोलते हुए अग्रवाल मुंह बनाते है,लंबे चौड़े मोटे अग्रवाल .
             अस्मिता की नजर लता पर पड़ी,जिसके नन्हैं से फूल, पीले रंग के है और हरे रंग का नन्हा सा फल जिसके बदन पर सफेद धारियां है,जो कद्दू का भ्रूण लगता है. करेले की बेल का आभास देते है पत्ते, लेकिन पत्तों की लम्बाई बताती है कि वे करेले नहीं है. कोई जंगली लता है जो खिड़की के पास खड़े सुबबूल के पेड़ और सूखे हुए बबूल के कांटो पर चढ गई है.
                 अग्रवाल देखते और बोलते है,'’ धूल से बचाने के लिए, इस जंगली बेल का सहारा लिया है.'’
                '’बड़ी खूबसूरत बेल है, पीले फूल, हरी पत्तिया..क्या नाम है इसका? ‘’अस्मिता की जिज्ञासा बढ़ गई.
                '’अजी नाम का क्या? जंगली है. जंगली के भी कोई नाम होतें है?कुछ भी बोलो इन्‍हैं, क्‍या फरक पडता है.‘’ अग्रवाल चलते चलते बोलते है.
                '’नाम तो सभी के होते हैं, कोई याद रखता है कोई भूलाना चाहता है.'’ मेश्राम रुक जाते है बोलकर  लेकिन अग्रवाल न सुनते है न रुकते ,आगे बढ़ जाते है अपनी रौ में है.कई पेड़ों की छाया में चल रहे है .उन्हें छाया का अहसास नहीं हो रहा है .पैरों तले सूखें पत्तों पर चलते हुए उन्हें लग रहा है कि वे रौंद रहे है गंदे संदे बच्चों को. 
          अग्रवाल कहते है,’’ ये जो बेल है ना, चढ़ती जाती है और घनी हो जाती है .इसके फूल बेशरम के फूल की तरह छोटे बहुत  नाजुक,मासूम,चमकदार बैंगनी रंग के होते है इसे इसलिये लगवाया  कि तार फेसिंग के भीतर के तमाम कांटे,टुकड़े,सड़ी हुई चीजे न दिखें, अब तो पास से भी नहीं दिखता कि नन्हें कांटो को मैंने इस तरह यूज किया है.‘’हंसते और कहते है ‘’जो तार सड़ जाते हैं उनको निकालना नहीं चाहिए वरना पूरा मैकेनिज्म डिस्टर्ब हो सकता है. सड़े हुए तार को यथावत रखते हुए दूसरे तार का सपोर्ट देता हूं. वरना एक छेद कब बड़ा हो जाये, कहा नहीं जा सकता है. सारी मेहनत की ऐसी की तैसी होने में देर नहीं लगती. छेद ..बडा गडढा होते ही बाहर के बच्चे कब घुस जाये, कब हाथ डाल दे, कह नहीं सकते. आपको पता नहीं स्साले गंदे संदे आवारा बच्चे घुमते रहते है. मौके की तलाश में होते है, इन्हीं तारों में से घुस जाये, चोरी करे...क्या भरोसा...? हालांकि आंगन में ऐसा कोई  सामान होता नहीं है जिसे वे चुरा ले लेकिन ये कोमल फूल है, ये फलसा है,तोड़ न ले और फिर क्या है कि एक बार आदत लग जाय तो जाती नहीं है. चोरी करने में कितनी देर लगती है..और कोई चोर कार में बैठकर सूटबूट पहनकर थोड़े आता है.‘’साँस लेने के लिए रुककर अग्रवाल गर्वित भाव से वे आविष्कारकर्ता की तरह खुद को प्रस्तुत करते है और खुश होते हैं. एक दूसरे में जुड़े हुए तमाम तार,कांटे,लोहा,रस्सी, की तरह उनकी बातें जुड़ी है.
                          अग्रवाल छत से टकराते गुब्बारे को पकड़ने की कोशिश करते हुए फिर कहते है ,‘’मजबूती के लिए ही तो लोहे के इन चार कंटीले तारों का आपस में इतना ही सम्बन्ध है कि वे लोहे के सडे हुए एंगल से अटके हुए है.बबूल ,नीम और भी न जाने किस किसको काटकर उन्हें खम्बा बनाकर कंटीले तार को मजबूती दी .इन तारों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए...एक्चुली इन तारों को  एक दूसरे से  कभी  जोड़ा नही लेकिन लगता है कि जोड़ दिया है .आपस में दूसरी चीजों ने जोड़ रखा है .इन्हें गौर से देखेंगे तो आपको चार कंटीले जंग लगे लोहे के तार नहीं दिखेंगे .चार वर्ण और ढेर सारी जातियों का मेल .पूर्वजों की सोच कितनी वैज्ञानिक थी कि इसमें  कोई घुस नहीं पाता.मजबूत व्यवस्था.मजबूत...यही तो हमारे धर्म का सक्सेस रहा है.कोई घुस नहीं पाता...न घुस पायेगा.‘’अग्रवाल हँसते है ,जिसमे चालाकी का मुलम्मा है .
             ‘’ कंटीले तार में कोई घुसना भी नहीं चाहता.‘’मेश्राम  बोले तो अग्रवाल की हँसी खो गई .गुब्बारा घर में से निकल गया. अग्रवाल बाहर आ गये लेकिन पकड़ नहीं पाये और आसमान में देखते रह गये .विभावरी हँस रही है .अग्रवाल सोच रहे है गुब्बारे को रोकने के लिए कहाँ लगाऊ कंटीले तार.     
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 ''हंस '' नवम्बर 2012 में प्रकाशित



               





7 comments:

kailash said...

हंस ''के नवम्बर के अंक में प्रकाशित और चित्र गूगल से

Ashok Kumar Pandey said...

अच्छा बुना है आपने. कहानी बांधती है अंत तक. बधाई

kailash said...

Santosh Choubey
November 4
मजबूती के लिए ही तो लोहे के इन चार कंटीले तारों का आपस में इतना ही सम्बन्ध है कि वे लोहे के सड़े हुए एंगल से अटके हुए हैं .बबूल ,नीम और भी न जाने किस किस को काटकर उन्हें खम्बा बनाकर कंटीले तार को मजबूती दी इन तारों को एक दूसरे से जोड़ने के लिए..एक्चुअली इन तारों को एक-दूसरे से कभी जोड़ा नहीं लेकिन लगता है कि जोड़ दिया है. इन्हें गौर से देखेंगे तो आपको चार कंटीले जंग लगे लोहे के तार नहीं दिखेंगे . चार वर्ण और ढेर सारी जातियों का मेल, पूर्वजों की सोच कितनी वैज्ञानिक थी कि इसमें कोई घुस नहीं पाता. मजबूत व्यवस्था .मजबूत ...यही तो हमारे धर्म का सक्सेस रहा है . कोई घुस नहीं पाता....न घुस पायेगा ...

'हंस' के नवंबर अंक में छपी Kailash Wankhede की बेहद बहसतलब कहानी "कंटीले तार" से .....

kailash said...

Santosh Choubey ----बेहद विचार -प्रवण ...लाजवाब कहानी है ...कहानी में घटनाओं की छाया में एक निरंतर बहस है और वह गज़ब की महत्वपूर्ण बहस है ..बधाई कैलाश जी :)
November 6 at 9:34am · Unlike · 1
Ahed Khan gubbara pakad liya aapne. badhai.
November 6 at 1:52pm · Unlike · 1


Ashok Kumar Pandey------- कहानी पढता हूँ अभी...
November 6 at 10:21pm · Unlike · 2
Joyshree Roy---- mai bhi
November 6 at 10:23pm · Unlike · 1
Satyanand Nirupam ------kal is kahani ko jarur padhunga.
November 6 at 11:01pm · Unlike · 1
Rangnath Singh--------- कहानी पसंद आयी...उम्मीद है भविष्य में और भी अच्छी कहानियाँ पढ़ने को मिलेंगी...
November 7 at 12:10am · Unlike · 1
गौतम राजरिशी--------- बहुत सुंदर कहानी है कैलाश जी...अभी अभी हंस में पढ़ी| अच्छा शिल्प और बांधे रखा प्रवाह ने| बधाई !

kailash said...

Avadhesh Preet ----------Tathakthit aabhijatya ki bheetri gandagi bahar lati ek achchhi kahani.
November 11 at 5:43pm · Unlike · 1
Shridhar Nandedkar --------aaj padhi maine....aswastha kar diya is kahani ne....badhai kailash ji ko.....
November 11 at 6:00pm · Unlike · 1
Rajesh Yadav---- mrs agrwal ki tapkane ki kala shandar hai badhai sir ji.
November 11 at 10:49pm · Unlike · 1
Devesh Kalyani------- painting jaisi dil me utar gai
katile taar. agrwal ka man our meshram ka manas chaturvarn ke scatch our colure jaise hai
November 12 at 8:00pm · Unlike · 1
Kailash Wankhede --------Devesh Kalyani जी कई रंग से भरा है वर्ण व्यवस्था .
November 12 at 10:14pm · Edited · Like
Kapur Wasnik -----------kahani dubara padhi. kathan shandar hai.chot zabardast padti hai. badhai.

kailash said...

Manisha Kulshreshtha ---------कहानी बहुत अच्छी लगी. सधाव के साथ अंत ! बधाई.
November 19 at 2:51am · Unlike · 1
Kailash Wankhede--- संजीव भाई ,Ashish Dashottar,Manisha jiशुक्रिया .
November 19 at 8:28am · Like · 1
Swati Tiwari --------अच्छी कहानी
November 19 at 9:27am · Unlike · 3
Arun Yadav --------Kahani pasand aayee. Badhayee. Shubh kamna.
November 19 at 6:01pm · Unlike · 2
Mahendra Joshi---- kahani civil lines ki like sir ji
November 19 at 9:34pm · Unlike · 2

kailash said...

facebook par aaye huye