...लेकिन मैं नहीं हूँ


........लेकिन मैं नहीं हूँ 

                                                     -कैलाश वानखेड़े 


सोलह बरस की बाली उमर को सलाम ,ऐ प्यार तेरी पहली नजर को सलाम ...
गुनगुना रहा था दिमाग में बज रहा था
रात के बारह के बाद  गा नहीं सकता चाहकर भी
इंतज़ार करता रहा.
इंतजार
तब नहीं करना था.
इंतजार तो एक सतत चलती हुई धडकन है
अब गाने मे संशोधन कर लूँगा ..अठारह बरस की बाली ...
और फाड़ लूँगा एक पन्ना
किसी को पता भी नहीं चलेगा
किसी को कहाँ पता चलता है कि २१ के हत्यारे बरी हो गए
कोई जुलुस नहीं ...
मोमबत्ती की छोडो यहाँ भी घना अँधेरा है
मुझे न जाने क्यों बहुतेरे चेहरे नहीं उम्मीद दिखती है
और मैं इंतजार करता हूँ
प्रिये
तुम्हे खत भेजना था
वह बहुत बड़ा हो गया
तुम्हारा पता नहीं
तुम्हारा अपना घर नहीं
...सच तो यह है हजारो -लाखों खत है मेरे पास अनलिखें
खत से  तुम्हें समझ पाता  तो महामहिम के नाम लिखता
पगली तुम्हें कहाँ समझा पाता हूँ  ..

लेकिन कुरियर वाले नहीं पहुचाते ,उन्हें पैदा ही इसलिए किया कि वे मनमानी करे
खत्म कर दे पोस्ट मैन को .
कहना है लेकिन डरता हूँ कि जानता हूँ अभिव्यक्ति की आजादी के मायने .
वह जिसके मु के भीतर पान मसाले की लेयर से जीभ बदरंग हो गई
वह थूकता है
कहता है ,ये जबान किसकी है
मैं उसे देखता हूँ वह मुझे सदियों की सड़े हुए दांतों की गुफा में ले जाता है
वह लगातार हारा हुआ ,पीटा हुआ चेहरा है फिर भी मुछं पर ताव देने का भाव है
जानता हूँ कितना गिरा हुआ है लेकिन अभी भी उसका भाव ऊँचा   है .
ऊँचे लोगों की ऊँची पसंद , गर्व से कहता है
समझ में नहीं आता है मुझे मैं कहाँ खड़ा हूँ ..
और अभिव्यक्ति ..अभिव्यक्ति...
चिल्लाना चाहता हूँ कि
सरेआम कहना चाहता हूँ ,तुझसे मुहब्बत करता है
उस जगह जहाँ  ..
शादी के पहले देखा जाता है कि  किसके घर पैदा हुआ
किसकी औलाद है ,कितना शुद्ध है रक्त
 तब उलझन नहीं है होती उन्हें .
तुम्हे भगवान तिवारी की खून की दो बूंद याद आ रही है
और मुझे डी एन  ए करवाना है तमाम भगवान का जो तिवारी है
जो मेहसाना है
जो अमर हिरा त्रिपाठी है
जो ......
मैंने तो सुना है हर नर में नारायण है
नारायण
इसलिए तो डर नहीं लगता है तुम्हें
नारायण न बन जाऊ
जानता हूँ इतना कि मैं नर हूँ
नारायण बनना नहीं चाहता
नारायणों की भीड़ में शामिल नहीं होना चाहता हूँ
तुमसे मुहब्बत करता हूँ .
डरता हूँ
जमाने से
जो जज है
जिनके फैसले मे तुम पर यकीं नहीं किया जायेगा
तुम हो ही ऐसी ..
दोषी तुम्हे ही माना जायेगा
और बरी हो जायेंगे वे
कि उनके बाप के नाम दर्ज है तिवारी ,मेहसाना ,त्रिपाठी ...
वो जोर जबरदस्ती कर ही नहीं सकते है ,कहता है और मुस्कुराता है
कि ये तो हमारी परम्परा है .
परम्परा कभी बुरी होती है ?
सती कर जला देते थे अब भी होते ही विधवा काशी भेज देते है .
काशी तो घर के भीतर ही होती है
तभी तो भ्रूण के क़त्ल  करते वक्त कांपते नहीं हाथ
तब भी आज भी
खून बहा देना ,बाएँ हाथ का काम है
लगातार हारते .पिटते चेहरों का
अभ्यस्त हो गए लोग
कत्ल की खबर आई पी एल  के सामने कोई औकात नहीं रखती
औकात ,नाक का हरामी बाप है .

एक समय पर एक बात नहीं सोच पाता हूँ
एक समय पर एक बात नहीं होती है
प्रिये
न जाने क्यों एक चुम्बन की ख्वाहिश  चली आई
जबकि तुम नहीं हो यहाँ
यहाँ पर कलम है कागज़ है
दिल है दिमाग है
लेकिन मैं नहीं हूँ .

 नोट ;; वह जानती है वह मेरी प्रेमिका है .प्रेमी हूँ यह पता है मुझे लेकिन हम दोनों को नहीं पता कि हम प्रेमी -प्रेमिका है .उस प्रेमिका के नाम लिखी जा रही कविता ...हाँ ,कविता का एक टुकड़ा भर है .
१६ मई २०१२

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