सत्यापित

   कहानी ''सत्यापित ''को सुना जा सकता है ,रेडियों की दुनिया के सरताज ,युनूस खान की आवाज में .यहाँ क्लिक कीजिये .....http://katha-paath.blogspot.in/2014/02/blog-post_9.html
                                                                                                                                        -कैलाश वानखेड़े

अभी इंतजार में हूँ कि मेरी बारी आये और मैं अपने आपको सत्यापित करवाऊ .मुझे सत्यापित करवाना है अपना फोटो. कोई भी मेरे चेहरे को पढ़कर अंदाज लगा सकता है कि मैं अभी परेशानी में हूँअब और इंतजार नहीं कर सकता. मेरे पास धैर्य था, मेरे पास समय था, मेरे पास सपने थे, मेरे पास मैं था, अब मेरे पास आवेदन पत्र पर वह फोटो है जिसे दुःख-सुख का अनुभव नहीं होता. फोटो पर पड़ने वाली सील और होने वाले हस्ताक्षर से प्रमाणित होने वाला था मेरा वजूद. सत्यापन  करने वाली सील अक्सर चेहरा बिगाड़ देती है और रही-सही कसर लम्बे चौड़े हस्ताक्षर पूरे कर देते. चेहरा पहचानना मुश्किल हो जाता है.उसी को प्रमाणित मानते है.टहलना नहीं चाहता हूँ .थक गया हूँ बुरी तरह. भूख-प्यास मेरे दिमाग से रुखसत हो चुकी और अब गुस्सा सवार हो रहा. गर्म लोहा, जब तक आग पर रहता लाल दिखता, आग के हटते ही काला दिखने लगता जिसने लोहे को तपते हुए नहीं देखा वह नहीं जान सकता कि अपने मूल रंग में लौटता लोहा कितना गर्म होता होगा. अपनी उम्मीद को उसी में तपाये हुए इंतजार में हूं .
जहाँ खड़ा हूँ, उसी गलियारे में आते-जाते लोगों के बीच एक चेहरा बार-बार टकराता है. अपने पूरे शरीर से बेखबर. वह कश्मकश में है. जाउ या ना जाउ के. वह अपने पास के तुडे-मुडे कागज उलट-पुलट कर देख रहा है. कुछ खोज रहा है. कुछ ड़र जैसा है जो उसे बेफिक्र होने नहीं दे रहा. ये यहाँ इस गलियारे में क्यों भटक रहा है? किस काम के लिए आया होगा? मैं देखता रहा और सोचता रहा. चूँकि मैं खड़ा हूँ खड़ा न होने की इच्छा के और चाहता हूँ कि दो बातें कर लूं. बहुत देर हो गई मुँह के भीतर जबान पर शब्दों ने यात्रा नहीं की. वह लगातार मुझे देख रहा है लेकिन भावहीन. पहचानना चाह रहा. अब उसे कैसे बताऊॅं कि भाई साहब मैं आपका परिचित नहीं हूँ. उसके चेहरे पर कोई भाव न दिखने के बावजूद मैंने हल्की मुस्कान भेज दी.उससे बात करना चाहता हूँ और बात, मुस्कान से शुरु हो, तो भारी दिल हल्का हो जाता है . राहत मिलती. घड़ी का क्या, उसकी सुई को टक-टक कर चलना रहता सो चलती रहती लेकिन यहां दिल में धक-धक करने वाली धड़कन उस एक-सी रफ्तार में नहीं चलती. तेज हो गई धड़कन कि यह इंसान शायद जवाब न दे तो ? पहल का अपमान सा लगने लगा और इसी अपमान बोध ने धड़कन की गति बढ़ा दी. अजीब आदमी है, कहाँ खोया है या कोई चेतना नहीं इसके भीतर.कम से कम मुस्कान का जवाब तो दे. अब अगर बोलना,बताना या सुनना नहीं चाहता है, तो न बोले न सुने. जबरदस्ती तो नहीं की जा सकती. लेकिन एक तपे हुए लोहे पर चन्द बून्द मुस्कान की ड़ाल दे.
ये बंदा असहमतियां लाया है ढोकर कि इसकी कमर झुक गई. गर्दन ढ़ीली हो गई, आंखों के नीचे कालापन इतना बढ़ा कि अपनी उम्र से बडा लगने लगा. यह आदमी हर हालत में तीस के भीतर का होगा लेकिन लगता तो ऐसा नहीं. मेरे भीतर जिज्ञासा जमीन पर मछली की तरह तड़प रही और उस बन्दे ने अगर तत्काल  मुस्कान या शब्द मुझे नहीं दिए तो वह जिज्ञासा मर जायेगी और उस मातम में मेरा वक्त मुर्दा होकर पसर जायेगा. मैं डर में जीने लगा. ऐसे कैसे हो सकता है कि आप मुस्कुराहट बढ़ाये और आपकी मुस्कुराहट लौटकर न आये.
अब तक मैंने हार, अपमान जैसे शब्दों को हटा लिया और मान लिया कि ये आदमी बदमाश टाइप का नहीं है. मुझसे ज्यादा परेशान है और ज्यादा परेशान इस बात को लेकर हो रहा है कि अनजान आदमी बिना स्वार्थ के मुस्कान कैसे दे सकता है , जबकि जो जानता हो कि अंजानी मुस्कान स्वार्थ के वर्क से लिपटी होती है तो इसी बात ने शायद उसे विचलित भी कर दिया और वह गलियारे से चल पड़ा .
प्यास रूक जाती है लेकिन कमबख्त पेशाब रूकती नहीं. रोकना भी नहीं चाहिए और मैं मुस्कान वाली बात को लेकर पेशाबघर खोजने चल दिया. उसके पीछे चलते चलते मैंने तय कर लिया कि पेशाबघर में पेंट की चेन खोलने के बाद वहीं छोड़ आउंगा मुस्कान की उम्मीद, जहां लोग पान की पीक, खॅंखार, थूक छोड़ आते है. जिनके पास जो होता है, वह वहीं छोड़ देता है. पेशाबघर से जाते हुए लोग अपने पीछे उन्हीं घृणा, नीचता, दुष्टता को छोड़ते है, जो उनके पास होती है, दीवार पर वहीं लिखते है जो उनके अवचेतन में होता है जो उनकी सीमा से बाहर होता है जो उनकी कुण्ठा का झंडा होता हैं. उनकी बात छोड़िए, मैं तो पेशाबघर की तलाश में हूं और वह बंदा मुझे अपने पीछे आते देखकर घबरा गया. उसे लगा मैं उसका पीछा कर रहा हूं.
अंततः पेशाबघर नहीं मिला. दफ्तर से बाहर जाती हुई गली में, जहाँ गंदगी थी, जहाँ दुर्गन्ध थी, वहीं खड़े-खड़े निवृत्ति ले ली. वह वहाँ नही दिखा. सो मैंने भी मुस्कान अपने जेहन में रख ली और हँसा पेशाब करते हुए.

हंसी चेहरे पर थी जब मैं उसी जगह लौटा जहाँ थोड़ी देर पहले खड़ा था और वह भी वहीं खड़ा दिखा जहाँ पहले था. दोनों दो अलग-अलग दरवाजे लगी खुली जमीन पर थे, जमीन के लोग. अंदर कुर्सी पर थे कुर्सी के लोग. बंदिश अन्दर से हंसी, ठहाके में आ रही. ठहाके इतने अच्छे लगने लगे कि मेरे चेहरे पर हंसी तैरकर जाने लगी. लगा  तपती मई में घनघोर वर्षा हो रही है और वह मुझ पर चकित. परेशानी के जाल में छटपटा रहा आदमी रिलेक्स होकर हंसने लगे तो हैरानी होती है. इसी हैरानी भरी निगाह से क्लर्क ने मुझे देखा और क्लर्क परेशान हो गया. अब मेरे सामने दो परेशान लोग हो गये. क्लर्क की परेशानी का अलग सबब है. दो घंटे पहले मैंने उससे कहा था कि मुझे बहुत जल्दी जाना है, मुझे साहब के पास सत्यापित करने जाने दो. और अब उसने मेरे चेहरे की हंसी, बेफिक्री देखी तो वह परेशान हो गया. बेफिक्र आदमी अच्छा नहीं लगता, यह जाना मैंने. मैं बेफिक्र नहीं था लेकिन लग रहा हूँ. मैं हर हालत में जितनी जल्दी हो, उतनी जल्दी भागना चाह रहा हूँ लेकिन नहीं जा पा रहा हूँ. तभी ख्याल को जमीन पर उतारा और उस अनजान बंदे से पूछने के लिए आगे बढ़ा तो मुझे देखकर वह मरियल पीछे खिसका. तभी रुका मैं. इस गलियारे में एक किशोरी भी भटक रही वह न गुस्से में थी न परेशानी में. उसके चेहरे को देखकर लग रहा कि उसने अपने सारे जज़्बात छिपाकर रखे है. कितनी बेहतर अभिनेत्री हो सकती है, अगर यह नाटक में काम करे तो? मैं जानता हूँ कि इस गलियारे में वे ही भटक रहे है, जिन्हें कोई काम है, जो हो नहीं रहा है, वे जिनका काम कोई नहीं कर रहा है, वे चाहते हैं कि जल्द से जल्द अपना काम हो और निकले इस गलियारे से बाहर. कोई अपनी परेशानी लेकर फिजूल में भटक नहीं रहा होगा. किसी न किसी चीज का मारा होगा, तो फिर ये लड़की परेशान क्यों नहीं दिखती ? क्यों नहीं है इसके चेहरे पर हड़बड़ाहट के मुंहासे ? मेकअप करके आई कि जो जानती हो परेशान दिखने वाले को ज्यादा परेशान किया जाता है. मजबूर की मजबूरी का फायदा उठाने के लिये लालायित रहते हैं लोग. जब मुस्कुराहट भरे मेरे चेहरे को क्लर्क ने देखा था तो वह परेशान हो गया था, दूसरों का हंसता चेहरा, खुशी नहीं देता. लड़की के चेहरे को देखकर मैं भी परेशानी का अनुभव कर रहा हूँ. क्या क्लर्क का चेहरा मुझ पर सवार हो गया ?
पीले रंग का सलवार सूट एकदम टाईट. पूरे बदन को कपड़े से कस दिया. उसकी टांग कमर पतली दिखी. बालों को भी कसकर बांधा हुआ. अठारह-बीस साल की होगी. उस लड़की के हाथ में घड़ी है ,एकदम छोटी और दूसरे में पीले रंग की दो पतली चूडियां. वह इस गलियारे में खुशबू बनकर आई. इसी गलियारे में परेशानी, पीड़ा, तनाव व संत्रास के कण उड़ रहे है और चेहरों पर चिपक कर दिमाग के यंत्र को बाधित कर रहे है . कितने महिन कण होते है ? लड़की के आ जाने से कितनी जल्दी वे कण चेहरों से दिमाग से हटने लगे  हैं. एक चेतना बनकर आई लड़की जिसने बर्बाद वक्त को आबाद कर दिया.
एक मुस्कान उस लड़की को देने से पहले, उसकी आंखों के भीतर देखना चाह रहा हूं मतलब तौलना चाह रहा हूं . खुद को कि कितना रिस्पांस देगी वरना यह दूसरी मुस्कान भी लौटकर गायब हो जायेगी और क्लर्क के चेहरे पर बैठ जायेगी. किसी भी सूरत में मैं अपनी मुस्कराहट क्लर्क को नहीं देना चाहता हूँ. इसी ने हाँ, इसी ने मुझे दो घंटे से लटकाकर रखा है. वह क्लर्क है, यह उसके कपड़ों से नहीं लग रहा. वह कमरे में बैठा, बैठने से उसके पद की पहचान हुई और मैं उसे नजर अंदाज कर अंदर जाने लगा था, तभी उसने एकदम रुखे चेहरे और कठोर आवाज में जिसमें दुत्कार शामिल थी, कहा था ‘‘क्या काम है?’’
‘‘साब से फोटो अटेस्ट करवाना है? ‘‘मेरी आवाज में भी तल्खी थी. विनय-निवेदन नहीं था. चूँकि आवेदन-पत्र में लिखा था राजपत्रित अधिकारी से फोटो सत्यापित कर भेजे, इसलिए राजपत्रित अधिकारी की तलाश में आया था.
‘‘अभी टाइम नहीं साब के पास, दूसरे साब से करवा लें.’’ क्लर्क का यह आदेश था जबकि मैं दूसरे साब से मिलकर आया था तो उन्होंने मेरे सारे सर्टिफिकेट देखे, आई कार्ड देखा फिर पूछा कहां रहते हो ? मैंने जवाब दिया था अम्बेडकर नगर, तो उन्होंने कहा अभी टाइम नहीं मेरे पास. इतना सब कुछ देखने कहने के बाद फोटो पर साइन करने के लिए सिर्फ दो सेकेण्ड लगते.. दो सेकेण्ड. लेकिन नहीं थे साहब के पास दो सेकेण्ड़ इसलिये मुझे लगा क्लर्क जो कह रहा है, वह सच ही होगा सो इंतजार कर ले.
‘‘मैं रुक जाता हूँ’’ आवाज निवेदन पर उतर आई थी मेरी.
‘‘अर्जेन्ट है?’’ क्लर्क की आवाज में अचानक मृदुलता आ गई थी. मदद करता चेहरा दिखने लगा. चलो काम हो जायेगा, सोचते ही मैने कहा था, ‘‘बहुत अर्जेन्ट है, अगर आज नहीं हो पाया तो आवेदन भेज नहीं पाउंगा.’’ कातरता उतर आई थी मेरे भीतर जो दिमाग को बता रही थी कि हाथ नहीं जोड़े मैंने. जोड़ ले, जोड़ ले, भीतर से कहीं आवाज आ रही थी. लेकिन हाथ जोड़ नहीं पाया. आवेदन पत्र को पूरा पढ़ने के बाद वह बोला, ‘‘कुछ लाये हो?’’ क्लर्क की आवाज में नमी थी और आँखों में उत्सुकता. वह कुर्सी से खड़ा हो गया.
‘‘मतलब?’’
‘‘मतलब जल्दी काम करवाना है न और वैसे हर किसी का फोटो अटेस्ट नहीं करते साब, मैं बोल दूंगा मेरी गली में है तेरा घर, जानता हूँ तुझे. तभी कर देंगे साब साइन’’ लालच थी, धमकी थी, झूठ था, नकाब था, फरेब था, क्या-क्या नहीं था उसके इन शब्दों में. मैं दंग था. हैरान था, मेरे पास ऊँची इमारत से गिरने के बाद सोचने के लिए कुछ नहीं था. जो भरोसा पैदा हुआ था वह मर गया. मैं क्या कहूँ, अब मेरे पास हाथ थे लेकिन बेजुबान हो गया. तभी कमरे के भीतर से चपरासी आया . मेरे तमाम विचारों-भावों में रुकावट आई. कभी मैं चपरासी  को तो कभी क्लर्क को देख रहा था.क्लर्क अपने प्रस्ताव के जवाब के लिए अभी भी मुझे देख रहा था. मैं उसे देखना नहीं चाह रहा था.
मैंने अपनी नजर हटा ली और कुछ आगे बढ़ा साहब के  कमरे में जाने के लिये.
‘‘समझाया , समझ में नहीं आती, अभी टाइम नहीं है साब के पास’’ वह झल्लाता हुआ चीख कर मुझे रोकता हुआ अन्दर गया. मैं हतप्रभ था. कमरे के भीतर से आवाज आई.
‘‘बड़ा ढीठ हो गया है तु पांडे़ ? क्या करते रहता है, दिन भर ?’’
भीतर से इस डॉट के बाद आवाज नहीं आई. खामोशी थी, जो मेरे चेहरे पर मुस्कुराहट को देती हुई वापस चली गई.
‘‘वो शर्मा बाबू को देखों, साला काम-धाम कुछ करता नहीं. उसका असर तुम पर हो गया या तुम्हारा उस पर....जाओ....समझ में नहीं आ रही है...शर्मा को देखों.’’वही डांटवाली आवाज थी .
वह अपमानित चेहरा लेकर कमरे से बाहर आया और मुझे घूरकर बोला,’’ दस बार समझाना पडेगा? टाइम नहीं साब के पास. चलो हटो.’’ वह उसी अंदाज में बोला, जैसा सुनकर आया. उसने एक तीर से दो निशाने साधे. एक मुझ पर दूसरा भीतर. जवाब दे दिया था उसने भीतर वाले को.
उसी जवाब पर सवार होकर वह चला गया साहब का वक्त मुझे दिखाकर. मेरे दिमाग के भीतर अपमान जैसी बात आई लेकिन मैंने उसे चेहरे से दूर रखा. हर हाल में मुझे अपना काम आज ही करवाना है. यही सोचते हुए मैंने अपना ध्यान विकेन्द्रित कर दिया. क्लर्क को देखते हुए मैं गलियारे में आते-जाते खड़े लोगों के चेहरे और चाल को देखने लगा. हर एक के चेहरे और चाल को, उनके यहाँ आगमन के प्रयोजन को अपनी कल्पना से पढ़ने की कोशिश करने लगा. मेरे पास वक्त नहीं. अपना वक्त बर्बाद हो रहा था, मुझे लगने लगा कि मुझे बर्बाद किया जा रहा है. हर छोटी-मोटी नौकरी के आवेदन पर अपना फोटो चस्पा करना और फिर सत्यापित करने के लिए चक्कर लगाने में पैसा और समय बर्बाद होता. हर बार यातना के दर्दनाक अनुभव से गुजरता हूँ दफ्तरों में. दिमाग-दिल के भीतर कुछ कटता, दर्द होता. इस बार भी यही सवाल उठाया कई राजपत्रित अधिकारियों ने, हम नहीं पहचानते तुम्हे. तपती हुई मई में जलते हुए सवाल लेकर यह जानते हुए भी कि स्कूल और कॉलेज बन्द है फिर भी कोई सर भूले-भटके मिल जाये, यही सोचकर गया लेकिन ग्रीष्मकालीन अवकाश ने दरवाजे बन्द कर रखे थे. बन्द दरवाजों को देखकर लौटा था और इसी गलियारे में खड़ा हो गया था,आखरी उम्मीद लेकर. इस गलियारे में हर कोई अपनी बात साब को ही सुनाना चाहता दिखा. आपस में कोई भी बतियाते नहीं दिखे . जो है वे बिखरे हुए है. काम हो जाता तो जल्दी से भाग जाते लोग या फिर आश्वासन मिलता तो उम्मीद से बढ़ाते कदम. ऐसे कदमों से ज्यादा है वे जो इंतजार में है. इंतजार वाले अगर हाथ में हाथ डालकर चेन बना ले तो? तो...और मेरी मुस्कुराहट बढ़ गई.
चलो बात की जाये, क्या करेगा मरियल? जवाब नहीं देगा? न दे. मैं कोशिश करके देख लू.पसीना निकल जाये तो सुकून मिलता है, बात निकलने की तरह.बोझ को उठाकर चलते-चलते एक वक्त ऐसा आता है जिसमें मन इंकार करता है चलने से. बात करना चाहिए उस सोच को पक्का किया. वह लड़की टहल रही है. रुक नहीं रही. मैं रुका हुआ हूँ . लगा मुझे रोक रही है. इसीलिए मैं रुक रहा हूँ. बातें न सही मुस्कान ही दे दू  और ले लू. वह मरीयल आदमी खड़ा है. लेकिन लड़की आ जा रही है. मैं उसे तौल पाने में असमर्थ हो गया. क्लर्क जाकर वापस आ गया. क्लर्क के बैठते ही लड़की क्लर्क के पास आई. अपने कागज लड़की ने क्लर्क को दिये. क्लर्क ने कागज पढ़कर मुस्कुराते हुए कहा. ‘‘अरे तुम तो लल्लन की बेटी हो. बड़ा अच्छा आदमी था लल्लन. दोस्त था मेरा.. दोस्त. तु कितनी बड़ी हो गई? गोद में खिलाते थे हम. बहुत बड़ी हो गई हो , बहुत बड़ी.’’ उसने लडकी की आँख, नाक, ओंठ को देखते-देखते अपनी नज़र उसके वक्ष पर गड़ा दी और उसी गड़ी हुई नजर से बोले जा रहा. नज़र गाड़ रहा. छेद कर रहा. लार टपका रहा है. जैसे गड्ढ़ा करने के लिये पानी छोड़ा जाता है, तेजी से खुदाई के लिए, उसी अन्दाज में लार टपका रहा है.
लड़की पीछे हटी. क्लर्क के हाथ से कागज लिया. ‘‘काका, आपको भी देखकर मुझे पापा की याद आ गई. आप भी मेरे पापा जैसे ही हो.’’
जैसे गड्ढ़े की खुदाई करते हुए कोई पत्थर आ जाये और खुदाई का वार वापस पलटता हुआ हाथ केा झटका देता है, वैसा ही झटका उसे लगा और लड़की कमरे के भीतर चली गई. रोकने के लिए क्लर्क के पास शब्द नहीं थे. हाथ भी नहीं था.
लड़की के कमरे के अन्दर जाने के बाद मेरे कदमों में गति आई और मैं उस मरीयल आदमी के सामने था, मुस्कान को पीछे छोड़ सीधे शब्दों को रख दिया.‘‘किस काम से आये हो?’’ सुनकर मेरे सवाल और मेरे करीब आने से उसने अपनी परेशानी के साथ अविश्वास की चादर ओढ़ने की कोशिश कर झिझकते हुए कहा ‘‘थोड़े काम से आया हूँ.’’
मुझे लगा कि मैं अपने भीतर बैठे हुए खालीपन को भर दूँ  और अपना काम बताऊॅं, दोनों का मन हल्का करने के लिए मैंने कहा. ‘‘मैं यहाँ अपना फोटो अटेस्टेड करवाने आया हूँ.तीन घंटे से ज्यादा हो गये. खड़े-खड़े परेशान हो गया हूँ.समझ में नहीं आ रहा क्या करु ?’’ मैंने सवाल नहीं छोड़ा था इसलिए जवाब मुझे नहीं मिलने वाला था लेकिन मैं उसकी बात सुनना चाहता था.
थकी हुई आवाज में उसने सवाल का जवाब न देते हुए कहा, ‘‘पान्हेरा गाँव में कुछ व्यवस्था नहीं. घरवाली को बच्चा होने वाला था. सरकारी हस्पताल में आया भर्ती कराने के वास्ते. नरस ने देखा और बोली दो दिन बाद आना. घर जाने का किराया भाड़ा कौन देगा? मजूरी मिलती नहीं खेत की इसलिए ड्रायवरी सीखी. मैं गाड़ी चलाता हूँ, जीप. चापोरा से अंर्तुली फाटा ,इच्छापुर.अब यहाँ आने का मतलब गाड़ी बन्द. गाडी नहीं चलाये तो क्या खाने का और क्या ओढ़ने का. नरस को बोला कि कर लो भर्ती. पड़ी रहेगी किसी कोने में. नहीं मानी नरस. मना बोल दिया, तो मना.डॉक्टर से मिलने की कोशिश की लेकिन डॉक्टर साब नी मिले तो फिर किधर को जाने का. यही, इधरीच टेशन पे रुक गये हम. वही सोना, वही खाना. समोसा खाके, चने खाके निकाले दो दिन.वो टेशन है रेलगाडी का, वहीं अंधे भिखारी, पागल लोगों के साथ पडे रहे. शहर में दूसरी जगह नहीं मिली जहां रूक सके, सो सके. हग मूत सके...सुरक्षित रे सके...वहीं टेशन पर घरवाली अगले दिन जब दरद से तड़पी तो उसे पैदल पैदल लेके निकले. रास्ते में वो चलते चलते रोती रही चिल्लाती रही. अब मैं क्या करू! कोई गाडी रोकने को, बिठाने को नी तैयार...उसे रोते देख मेरी मॉं भी रोने चिल्लाने लगी... कोई नी सुने...मेरी तो आवाज ही बंद हो गई. क्या करू...इसे पकडू... उठा नी सकू... वैसे ही चलते घसीटते ले आया और हस्पताल के गेट के पास बोली, अब नी सहन होता..वही जो बैठी...लेट गई...और फिर थोड़ी देर में तो बच्चा हो गया... मैं बहुत भागा हस्पताल में... कोई भी आने को तैयार नीं हुआ. दो तीन घंटे बाद लोगों ने फोटो खींचे...पूछने लगे..लेकिन उसे उठाके अंदर ले जाने को कोई नी तैयार हुआ..फिर हाथ पैर जोड के हस्पताल के बरांडे में लेटा दिया...बोले जगे नी है... फिर एक आदमी बोला कि हमें बदनाम कराने के वास्ते गेट पे डिलेवरी करवा दी. दो मिनिट नी रूक सके...कैसे समझाउ उसे कि दो दिन से रूकी है...बोलते-बोलते रूक गया. मैं भी उसके साथ रूक गया. वह वही अस्पताल में रूक गया. कुछ देर बाद मैंने कहा, “फिर...वह बोला, “फिर मैं बच्ची और उसके माँ को हस्पताल छोड़ के घर आया. माय को किया साथ में. मैं गाड़ी चलाने वास्ते चला गया. दूर की सवारी थी. एदलाबाद की. वहाँ गया, तो पकड़ ली गाड़ी. बोले जा, दण्ड भरने. अब दण्ड का पैसा नहीं पास मेरे. मालिक को फोन किया तो बोला तू क्यों ले गया गाड़ी महाराष्ट्र में. एम.पी. की गाड़ी जाती क्या? अब उसने चार बात सुनाई और पटक दिया फोन. मैं भी दो दिन वहीं पडा रहा फिर छोड़के गाड़ी आ गया. वापस आया तो घरवाली की छुट्टी कर दी हस्पताल वालों ने.’’
मुझे उसकी बात का सिरा पकड़ में नही आ रहा और वह चुप नहीं हो रहा. लगातार बोल रहा. मेरी मुस्कान चेहरे से उतर गई. उसकी बात परवान चढ़ गई. वह रुकना नहीं चाहता. विषय को पटरी पर लाने के लिए कहा मैंने, ‘‘गाड़ी छुड़वाने आये हो?’’
‘‘यहाँ गाड़ी कैसे छूट सकती? महाराष्ट्र का मामला है. मैं तो हस्पताल के चक्कर लगा लगा के परेशान हो गया हूँ.’’
‘‘तो क्यों जाते हो अस्पताल?’’
‘‘वो पैसा मिलता है न, हस्पताल में डिलेवरी का? वो पैसा नी मिला. पैसा मिले नी मिले लेकिन बात तो सीधे मुँह करनी चाहिए. वो तो मेरे को देखती और काटने लगती.’’ मुझे ऐसा लगा कई बार उसे काटा गया. काटे हुए जगह का दर्द उभर आया. मैं समझ नहीं पा रहा कि यह आदमी यहाँ किस काम के लिए आया? किस बात की शिकायत है इसे? शिकायत करेगा तो हर बात की शिकायत कर सकता है? लेकिन करना चाहता नहीं. क्या चाहता है ये आदमी? सोचते-सोचते ही सवाल किया मैंने ‘‘क्या नाम है तुम्हारा भिया?’’
‘‘भाउ साहेब इंगले’’
‘‘तुम यहाँ किसलिए आये हो, मतलब क्या काम है?’’
‘‘शिकायत देने’’
... किसकी?
हमारी बातों ने क्लर्क को परेशान कर दिया, मैं अपने वक्त को बांट रहा. मेरा काम हो या न हो, लेकिन क्लर्क से अभद्रता का बदला लेने की हसरत ने मुस्कुराहट बढ़ा दी. गोया कोई यंत्र लगा हो कि क्लर्क की परेशानी उसके चेहरे को बदरंग करती जा रही, उतनी ही मात्रा में मेरे चेहरे को रंगीन बना रही. खेल अपने चरम पर आ गया. उपेक्षा और उपहास क्लर्क को परेशान कर रहा था.धैर्य रखना है मुझे, इस आदमी की बातों को सुनने का.
   ‘‘किसकी शिकायत करोगे?’’ वह सुन नहीं पाया मुझे. वह अपने घर के भीतर चला गया होगा. अपने नवजात बच्चे की हंसी और सद्य प्रसूता पत्नी के कष्ट की डोर पर खड़ा दिखा, यही इसी गलियारे में मेरे सामने वह अपने शरीर को रखकर जा चूका. मैं अन्दाज लगा रहा हूं कि क्या  उसकी नवजात बच्ची पहचानने की क्षमता हासिल कर चुकी होगी कि इसे पिता के रूप में सत्यापित कर दे. ये मरियल उस बच्ची की मुस्कान के लिए ही खड़ा होगा. क्या इसे इतना भी नहीं पता कि नवजात शिशु हल्की-सी मुस्कान देता है.भाऊ साहेब, बिना पहचाने ही कि तुम ही हो उसके बाप, बावजूद वह मुस्कान देती है सत्यापित कर देती है. अगर वह मुस्कान दे तो मत समझना कि वह एक बेटी की अपने पिता के लिए मुस्कान है. वह एक जीव की दूसरे जीव के लिए मुस्कान होती है. चार वर्णों की हजारों रस्सीयों के भीतर उलझने वाले धर्मशास्त्रों के ठेकेदारों, यह आदमी मुझे मुस्कान क्यों नहीं लौटा रहा है.
जब उसने सिर से टोपी हटाकर सिर का पसीना पोंछा, तो सिर पर उग आये छोटे-छोटे बालों में से बेहद नन्हीं पसीने की बून्दें खेलने लगी. मरने की बात न कहनी न सुननी चाही. उसे स्थगित कर दिया. हम लोग घरवालों के मरने के बाद बाल नहीं देते. ये लोग भी बाल नहीं देते होंगे तो मरने का सवाल फिजूल होगा और उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे गलियारे में लाया और अनुत्तरित सवाल फिर दोहराया, ‘‘किसकी शिकायत करोगे? गाड़ी की, मालिक की, डॉक्टर की..... किससे है शिकायत?’’
डिलेवरी अस्पताल में नहीं हुई, इस बात की करेगा ये शिकायत ? समझने के लिए खुद को समझा रहा हूँ .
‘‘वो नरस है न, शिस्टर, वो है न हम लोगों के साथ ऐसा ही बोलती वह सीधे मूँह बोलती नहीं. बात ही नहीं करती. खाने को दौड़ती. डिलेवरी के टेम नरस बोली ऐन टाइम पर लाया है, पैसे के लिए. वरना तुम लोग कोई अस्पताल में डिलेवरी करवाते हो ?”
रोंगटे दिखने लगे उस पर जैसे अभी-अभी उस नर्स ने उससे बात की हो. वह बोल रहा, उबल रहा, अपमान और प्रताड़ना में.
अस्पताल से पैसे नहीं मिलने की शिकायत करोगे ?”
पैसों की बात नहीं है.नी मिले तो नी मिले.
फिर ?”
वो क्या है जब डिलेवरी के वास्ते हस्पताल गये तब वो नरस है न, उसने नाम पता, उमर, पहले कितने बच्चे है, सब लिखवाने का बोला. मैं बोला ये हमारी पेली डिलेवरी है, तो नरस बोली झूठ बोलते हो ?” मैं बोला, “नी सिस्टर, सच्ची बोलता , फिर बोली-गांव का नाम तो मैं बोला चापोरा. फिर बोली चापोरा में कहां रहते हो ? बौद्धवाड़ा बताने के बाद फिर बोली नरस कहां है बौद्धवाड़ा ? जब उसे बोला तो उसकी आंख में सवाल भी थे, पूछने का मतलब था ये तो होता ही नी. मैं बताता उसके पेले फिर बोली चापोरा में बौद्धवाड़ा नहीं है, वहां तो महारवाड़ा है. महारवाडे़ के हो ? मैं बोला महारवाड़ा नी है हमारे गांव में. पेले था अब नी है. अब तो बौद्धवाड़ा ही है. तो बोली नरस कि फिर झूठ बोला. महारवाड़ा क्या गुम गया. मैं उसे बोलता रहा कि मैं सच्ची बोल रहा लेकिन वो नी मानी तो नी मानी और वहां लिखा महारवाड़ा, चापोरा.
जैसे भरा हो भीतर लोहा जो गर्म होकर पिघल गया हो. निकल गया हो लेकिन शरीर पर घाव छोड़ गया. शरीर के अंगों को निकालकर ले गया हो. भाउ साहेब इंगले नाम के इस आदमी की बात क्यों नहीं मानती नर्स ? सब जानते है डॉ अम्बेडकर के धर्मातंरण के बाद महारवाड़े को बौद्धवाड़ा कहा जाता है. जानने के बाद भी कि बौद्धवाड़ा है, फिर भी उसके अस्तित्व को लेकर उठाते है सवाल और उसे सत्यापित करते है.
जो हमें नहीं जानता, नहीं पहचानता, वही हमें सत्यापित करता है. उसी न जानने वाले के दस्तखत से हमें जाना जाता है. कभी कभी लगता है कि ये कौन है ? कहां से आये है ? जिनके पेन से ही तय होती है हमारी पहचान ?” वह मुझे देखता ही रहा और मैं बोलता रहा,'' मालुम है, मैं दस-बारह दिन से भटक रहा हूं, दौड़ रहा हूँ  कि मुझे पहचानों, ये सर्टिफिकेट, ये कार्ड है. मेरे फोटो पर साइन कर दो. साइन. किससे कहु कहॉं जाऊॅं ..?”मैं बोलता रहा और सोचता रहा कि तभी वह लड़की उम्मीद लेकर बाहर आई. आते ही बोली क्लर्क को, ‘‘काका मेरा काम जल्दी करवाना. पापा की कसम है आपकेा.’’ लड़की की मुस्कुराहट क्लर्क के चेहरे पर गई और परफ्यूम की तरह उड़ गई. जैसे उस लड़की की मुस्कान, क्लर्क के चेहरे पर रहना नहीं चाहती.
लड़की के जाने बाद भाऊ साहेब इंगले नाम का यह आदमी खड़ा हो गया. उसे देखते ही क्लर्क ने कहा, ‘‘तुम क्या भाड़ झोंकने आए हो?’’ साहब की डॉट थी, लड़की के जाने की हताशा या फिर हमारी एकजुटता या मुस्कुराहट, क्या था कि वह काटने दौड़ा. मुझे उसमें वह नर्स दिखी जो भाऊ साहेब इंगले को काटने दौड़ती थी.
‘‘मैं शिकायत करने आया हूँ, शिकायत.’’ उसने कहा.
‘‘तो शिकायत पेटी में डाल. यहाँ क्यों टाईम बरबाद कर रहा है हमारा ?’’ वह लगातार पिट रहे मोहरे में तब्दिल हो गया.
‘‘साब से मिलना. बताना है?’’
‘‘अभी टाईम नहीं साब के पास. देखते नहीं हो, कितने लोग खड़े है, तुम कोई तुर्रम खां हो जो सीधे चले आ रहे हो ? वहां गेट से बाहर जाओ, वहीं पे रखी है पेटी, डिब्बा.. बक्सा...समझे उसमें डालो अपनी शिकायत ... पता नहीं कहां कहां से आ जाते है.. शिकायत करनी है ? यहां हर आदमी तैयार बैठा है शिकायत करने. उसे बस मौका चाहिए.भाऊ साहेब इंगले को डॉटते हुए मुझे देख रहा है क्लर्क. बुरी तरह से भाऊ साहेब इंगले को झटका लगा. शिकायत करने आया और ये सुनने को मिल गया. वह पीछे हटा. समझ में नहीं आ रहा उसे कि वह कहाँ खड़ा है.
मैं अभी सोच में ही डूबा हुआ था कि भाउ साहेब इंगले ने मेरे कंधे को हाथ से नहीं दो छोटी उंगलियों से हिलाया. हिल गया मैं. उसकी बात पूरी नहीं हुई. वो बोला, “मेरको ये बोलना है कि वो नरस क्यों नहीं मानती हमारी  बात ! जो हम कहते वो क्यों नी लिखती ? क्यों नी मानती हमारी बात को सच्ची ? वो तय करती है कि क्या लिखना है किसने दिया  ये हक किसने . उसके खिलाफ़ करनी है शिकायत मेरको..''
मैं पूरी तरह से समझ चुका कि भाऊ साहेब इंगले को चेहरे से और मुझे, आवेदन पत्र के शब्दों के आधार पर सत्यापित किया जा चुका है. नर्स और क्लर्क जानते है कि कौन है हम.
मेरी मुस्कुराहट मेरे चेहरे से पूरे शरीर में दौड़ गई. मैंने भाऊ साहेब इंगले का हाथ पकड़ा. भाऊ साहेब का हाथ गर्म था और गुस्सा फटने के इंतजार में. दरवाजे के सामने हम दोनों खड़े हो गये.
‘‘सुनाई नही देता क्या? क्लर्क चिल्लाया और मैंने मुस्कुराते हुए कहा’’, हमें अन्दर जाने दो.’’
‘‘अभी टाईम नहीं साब के पास बताया न.’’
‘‘ अब टेम हमारे पास भी नहीं है’’ भाऊ साहेब इंगले ने जोर से बोला तो क्लर्क चौंका. जो लोग आ जा रहे थे, वे रुक गये. भाऊ साहेब ने रुके हुए एक आदमी को रूकने को कहा. मैंने लोगों की तरफ मुस्कुराहट भेजी. जिसमें आमंत्रण था, आग्रह था. हाथ बढ़ाने का.
                               
1.महारवाडा-यह माना जाता है,जहाँ गाँव वहां महारवाडा.महार ,अनुसूचित जाति की बस्ती गाँव से बाहर होती .
2.बौध्दवाडा –डॉ.अम्बेडकर के सामूहिक धर्मान्तरण 14 अक्टूबर 1956 को बौद्ध धर्म स्वीकार किया.बाद महारो की बस्ती को अब बौद्धवाडा कहा जाता है.

....................................................................परिकथा युवा कहानी अंक-3,मार्च-अप्रैल-2011

6 comments:

md iqbal said...

a acchi kahani padhne ka mauqa dene ke liye dhnyawad

अशोक वानखडे said...

आपल्‍या शब्‍दात जबरदस्‍त ताकत आहे...
फार छान लिहलयं.... असचं वाचायला मिळावं ..
हार्दिक शुभेच्‍छासह
अशोक वानखेडे

Pradeep Solanki said...

Good..............its Amazing sir.

kailash said...

एक दलित युवक द्वारा अपनी फोटो सत्यापित करवाने के क्रम में उठाई गई जिल्लतों के बहाने लिखी गई कैलाश वानखेड़े की कहानी ‘सत्यापित’ दलित जीवन के समकालीन सच का रेशा-रेशा उघाड़ते हुये दलित उत्थान के तथाकथित सरकारी दावों की कलई तो उतारती ही है, दलित लेखन के लिये रूढ़ हो चली कुछ मान्यताओं का भी प्रतिलोम रचती हैं. अपनी फोटो सत्यापित करवाने के लिये सरकारी दफ्तर के चक्कर काटता एक युवक जिस तरह अपने उन पहचानों को बार-बार सत्यापित होते देखता है जो वर्षों से उसके समुदाय की पीठ पर अपमान की गठरी की तरह लाद दी गई है, उससे सत्यापन एक अजीब तरह की विडंबना के रूप में उभर कर आता है. सचमुच कितना दुखद और यंत्रणादायक है यह कि किसी की पहचान इस लिये सत्यापित नहीं हो रही कि कोई क्लर्क या नर्स उसकी जाति पहचानता है. लेकिन यह युवक एक आधुनिक और परिवर्तनकामी दलित है वह इंतजार तभी तक कर सकता है जब तक उसके धीरज से ‘सत्यापन’ की इस हकीकत का सामना नहीं होता. तभी तो कहानी के अंत में ‘अभी टाईम नहीं साब के पास’ के विरुद्ध ‘अब टेम हमारे पास भी नहीं’ की जो निर्णायक ललकार सुनाई पड़ती है वह देर तक हमारे कानों में गूंजती रहती है. दर असल पहचान के विरुद्ध पहचान की एक नई लड़ाई की शुरुआत है यह कहानी-----------आलोचक और कहानीकार राकेश बिहारी ,अपनी पुस्तक ''केंद्र में कहानी '' में .

Aashita Singh said...

सच्चाई...गर्म लोहे की तरह पिघल कर दिल में जा उतरी

Aashita Singh said...

सच्चाई...गर्म लोहे की तरह पिघल कर दिल में जा उतरी